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गर्मी में पानी बिना प्यासे मर रहे जंगली जानवर
भास्कर न्यूज . चंडीगढ़
हरियाणा के एकमात्र नैशनल पार्क कलेसर में गर्मियों के दौरान जगंली जानवरों के लिए पानी का संकट शुरू हो गया है। कलेसर नैशनल पार्क मेें बने 5 वाटर गजलरों में से तीन सुख चुके हैं। यहां बनाए गए तालाब भी आधे से ज्यादा सुखे पड़े हैं। जो जंगली जानवरों की प्यास बुझाने में फेल साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि पानी की तलाश में जंगल से बाहर आने वाले जंगली जानवर सड़क दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं। कलेसर नैशनल पार्क व वन्य प्राणी विहार में लंगूर, बंदर, सांभर, नील गाय,चीतल, कक्कड़, जंगली सूअर,आदि जानवरों को अपनी प्यास बुझाने के लिए नैशनल हाईवे पार कर यमुना में पानी पीने के लिए आना पड़ता है। 5 में से 3 वाटर गजलर सुखे: युं तो कलेसर नैशनल पार्क में जंगली जानवरों के पीने के पानी के लिए 5 वाटर गजलर, 2 पक्के तालाब 6 कच्चे तालाब तथा 6 छोटी-छोटी ओहदी बनाई गई हैं। विडंबना है कि इतना कुछ होते हुए भी अधिकांश जंगली जानवर जंगल से बाहर हाईवे पर आते हैं। जानकारी के अनुसार नैशनल पार्क में बने 5 वाटर गजलरों से पानी मात्र दो गजलरों में भरा है। शेष तीन वाटर गजलर आज तक सुखे पड़े हैं। छह कच्चे तालाब यहां बनाए गए हैं। मगर एक तो लंबे समय से सुखा पड़ा हैं। अन्य तालाबों में भी पानी कम मात्रा में ही हैं। जंगली जानवरों को अटखेलियां करने के लिए पानी कम पड़ता हैं। ऐसे में जंगली जानवर हाईवे पार कर यमुना में जाने के चक्कर में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। मगर संबधित विभाग कलेसर नैशनल पार्क में जंगली जानवरों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी का बंदोबस्त करने में ढि़लाई बरत रहा है। चिक्कन घाटी में लगे टयूबवेल: जिन तीन वाटर गजलरों में पानी का अभाव है। वहां तक पानी का प्रेशर नहीं पहुंच पाता। ऊचांई पर होने के कारण वाटर गजलर सुखे रह जाते हैं। प्राकृतिक प्रेमियों का कहना है कि अगर चिक्कन घाटी में बिजली का कनेकसन लग जाए और यहां टयूबवेल लगा दिया जाए। पानी की कोई कमी नहीं रहेगी। तीनों वाटर गजलरों में हमेशा पानी भरा रह सकता हैं। बताया जाता है कि चिक्कन घाटी ऊंचाई पर है। वहां से नीचे पानी का प्रेशर आ सकता है। स्टाफ का टोटा: वन्य प्राणी विहार के लिए स्टाफ का घोर अभाव हैं। लंबे समय से यहां मात्र एक निरीक्षक, एक उप निरीक्षक तथा एक रक्षक के भरोसे जंगली जानवरों की सुरक्षा हो रही है। वन्य प्राणी विभाग में लगभग 20 रक्षक चाहिए। उसके बाद ही सही मायने में 24570 एकड़ ऐरिया की देख-रेख की जा सकती हैं। पहले भी हो चुके है हादसे: गौरतलब है कि पिछली गर्मियों में भी पानी की तलाश में जंगल से सड़क पार कर यमुना में पानी पीने के लिए जाते समय एक सांभर गाड़ी की चपेट में आने से घायल हो गया था। एक सांभर तो बीते महीने ही गाडी की चपेट में आकर अपने प्राण गंवा चुका है। इस प्रकार की घटनाए जंगल में आम बात है। हालांकि वन विभाग व वन्य प्राणी विभाग ने जानवरों की प्यास के लिए वाटर गजलर बनाये हुए हैं। जहां आकर जानवर अपनी प्यास बुझा सकते हैं। मगर जंगली जानवर स्वतंत्र विचरण करने वाले होते हैं। उन्हें एक सीमा में बांध कर नहीं रखा जा सकता। जंगली जानवर अक्सर एनएच 73 ए पार करके यमुना नदी में अपनी प्यास बुझाने तथा अठखेलियां करने पहुुंच जाते हैं। ऐेसे में कई बार जंगली जानवरों की सड़क हादसे में मौत हो चुकी है। विभागीय अधिकारी भी दबी जुबान से जंगली जानवरों का पानी की तलाश में नैशनल हाईवे पार कर यमुना में आने की बात को मान रहे है। विभाग को चाहिए कि नैशनल हाईवे के साथ साथ जंगल की ओर पानी का इंतजाम कराया जाए ताकि जंगली जानवरों की जान को बचाया जा सके। इस बारे में वाइल्ड़ लाईफ निरीक्षक राजीव गर्ग का कहना है कि जंगल में पानी की कोई कमी नही है। सड़क के साथ रहने वाले कुछ जानवर पानी की तलाश में यमुना नदी में आते है। आते हुए कई बार दुर्घटना ग्रस्त भी हो जाते है। जानवरों को कोई हानि न हो इसलिए विभाग सड़क के साथ लगते क्षेत्र में पानी का इंतजाम करवा रहा है। लगभग तालाबों मेंं पानी भरा है। छोटी-छोटी ओहदियों में भी पर्याप्त पानी है। जिससे जंगली जानवर अपनी प्यास आसानी से बुझा सकते हैं।