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बेसुरे हुए ध्रुपद के सुर, भोपाल की यादों में बसे रहेंगे उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर

8 वर्ष पहले
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भोपाल। मध्यप्रदेश के लिए यह खबर निश्चय ही बेसुरी है कि इस सरजमीं पर ध्रुपद की स्वर धाराओं को नई पीढ़ी में प्रवाहित करने वाले डागर घराने के मूर्धन्य गायक उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर की सांसों का सिलसिला बुधवार को थम गया। मध्यप्रदेश को इस बात का गर्व रहेगा कि आज से लगभग 35 साल पहले आकार ले रहे संस्कृति विभाग के आग्रह पर उस्तादों के उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने गुरू शिष्य परंपरा का जो पौधा रोपा था, आज वो हरा भरा होकर देश -दुनिया में अपनी चमक बिखेर रहे हैं।


उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर, डागर घराने ध्रुपद संगीत अपने पुरखों से अर्जित कर संगीत के कई शागिर्द तैयार किए। उस्ताद को 1981 में मध्यप्रदेश शासन उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी शुरू की। तब गुरू ने ध्रुपद जैसी दुर्लभ शैली के प्रचार-प्रसार के लिए परंपरा को नई पीढ़ी को पल्लवित और पुष्पित किया।


गुरू पद स्थापना से लेकर अब तक ध्रुपद गायन की विधिवत शैली का घोर अभाव है। उस्ताद ने गुरू शिष्य परंपरा के तहत ध्रुपद शैली की पारंपरिक गायन का सिलसिला जारी रखा। उस्ताद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने संगीत के दामन में सबसे ज्यादा सितारे जड़े। उनके शागिर्द पं. उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा, पं.ऋतिक सान्याल, उदय भवालकर, पुष्पराज कोष्ठी आज ध्रुपद के ऐसे बेनजीर हीरे हैं, जिनकी चमक ने दुनियाभर में ध्रुपद को रोशन किया है।

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