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विशेष लेख: जब टंकी हादसे से दु:खी हरवंश सिंह ने भोज स्थगित कर दिया था

8 वर्ष पहले
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कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह का बुधवार देर रात 2.30 बजे निधन हो गया है। पढिय़े उनकी यादों को तरोताजा करता लेख...

भोपाल। विधानसभा उपाध्यक्ष हर वंश सिंह का असामयिक निधन न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि मध्यप्रदेश की संसदीय विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है। वे न केवल दो दशक से सिवनी जिले के केवलारी से मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य थे, बल्कि कई महकमों के मंत्री और फिर विधानसभा उपाध्यक्ष के रूप में अपनी भूमिका के लिए भी याद किए जाएंगे। मैंने इन दो दशकों में उन्हें विधायक, मंत्री और उपाध्यक्ष तीनों भूमिकाओं में सदन के भीतर और बाहर देखा। एक भी वाकया ऐसा नहीं है जब उन्होंने संसदीय परंपरा को गरिमा प्रदान न की हो। बतौर विधायक सदैव शालीन शैली में अपने क्षेत्र के मुद्दों को सदन में रखा।


जब वे मंत्री बने तो परिवहन, वन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग उनके जिम्मे रहे। उन्होंने कभी भी विधायकों के प्रश्नों को नहीं टाला और न ही सत्ता या विपक्षी सदस्यों में कोई भेद किया। यही भूमिका उनकी उपाध्यक्ष के रूप में भी रही। वे कई दफा विधायकों की समस्याओं के मामले में आसंदी की भूमिका से ऊपर उठकर व्यवहार करते थे। जैसे कोई पंचायतीराज की समस्या उठाए तो वे उससे जुड़ी वे समस्याएं भी अपनी तरफ से सरकार को बता देते थे, जो समूचे प्रदेश में सामान्य जन को झेलना पड़ रही होती थीं। वे अपने अनुभव से सदस्यों की मदद करते थे, खासकर नए सदस्यों का तो वे विशेष ध्यान रखते थे।


कांग्रेस के शासन में उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का सबसे विश्वस्त मंत्री माना जाता था। वे बड़े आयोजनों की कुशल व्यवस्था के सूत्रधार की भूमिका में रहते थे। वे अंतिम दिनों में भी कांग्रेस की राजनीति में दिग्विजय सिंह के सबसे विश्वस्त और करीबी सिपहसालार माने जाते थे।


मुझे हरवंश सिंह के दो प्रसंग याद आ रहे हैं, जिनका जिक्र करना समीचीन होगा। एक पहले का जब वे मंत्री थे और एक इसी वर्ष का जब वे विधानसभा उपाध्यक्ष थे। जब वे वन मंत्री थे उन्होंने प्रदेश के वैद्यों और हकीमों को सरकार की तरफ से मंच और सहूलियतें देने की योजना बनाई। पचमढ़ी में प्रदेश के सुदूर अंचलों से बुलाए गए वैद्यों हकीमों का तीन दिन का सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस आयोजन के कुछ ही दिन पहले वे गंभीर रूप से बीमार पड़े। बल्कि मुश्किलों से उनका जीवन बचाया जा सका था। लेकिन अस्वस्थ होने के बावजूद वे पचमढ़ी में इस सम्मेलन के दौरान मौजूद रहे। यह सम्मेलन बीते 13 बरसों में स्थापित हो चुका है। भोपाल में हर साल वन मेला लगता है, जिसकी बुनियाद हरवंश सिंह ने ही डाली थी।



दूसरा वाकया इसी साल का है, वे मप्र विधानसभा की पत्रकार दीर्घा सलाहकार समिति के सभापति थे। मैं भी इस समिति का सदस्य हूं। परंपरा है कि समिति की पहली बैठक के बाद सभापति की तरफ से सदस्यों को दोपहर भोज दिया जाता है। हरवंश सिंह ने इसका आयोजन किया था। इस बैठक के एक दिन पहले ही भोपाल में अरेरा कालोनी में पानी की टंकी ढहने से कई लोग काल कवलित हो गए थे।

मैंने उन्हें फोन किया, शहर में इतनी बड़ी त्रासदी हुई है, हम लोग भोज आयोजित करें, अच्छा नहीं लगेगा। उन्होंने तत्काल कहा कि हम भोज रद्द कर रहे हैं। चंद क्षणों बाद ही विधानसभा सचिवालय के एक अधिकारी का फोन आ गया कि बैठक तो है, भोज नहीं होगा। समिति की बैठक में दो मिनिट का मौन भी रखा गया। हरवंश सिंह के निधन से न केवल कांग्रेस बल्कि मध्यप्रदेश की समन्वयवादी राजनीति और संसदीय परंपरा को अपूरणीय क्षति हुई है।