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ऐसे खट्टे-मीठे पड़ावों से गुजरी है मप्र की राजनीति

8 वर्ष पहले
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मप्र की राजनीति आधी सदी के सफर में कई मोड़ों और पड़ावों से गुजरती हुई आज तीसरी पीढ़ी के हाथों में है। इस दौर में प्रदेश की राजनीति एक तरफ जहां हाईकमान से शासित होती रही, तो दूसरी ओर बहुदलीय से शुरू होकर दो दलों के बीच इतनी मजबूती से सिमट गई कि लाख कोशिशों के बाद भी तीसरे मोर्चे की उपस्थिति दो दलीय राजनीति को तोड़ नहीं सकी। पढ़िए गणतंत्र दिवस के मौके पर मप्र की राजनीति के बारे में विस्तार से...


भोपाल। विभाजन के बाद से अब तक मप्र में कई बड़े बदलाव हुए। बार-बार बनती-बिगड़ती सरकार ने प्रदेश को विकास दर में काफी पीछे और राजनीतिक षड्यंत्रों में काफी आगे ले गया। केंद्र ने दखल के बावजूद मप्र काफी सालों बाद अपने स्वतंत्र पहचान बना पाने में सफल रहा। इस आधी सदी में प्रदेश की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन इस उतार-चढ़ाव ने हाईकमान के दबदबे के सामने प्रादेशिक नेतृत्व को कभी इतना मुखर नहीं होने दिया कि उसकी आवाज राष्ट्रीय राजनीति में अलग से सुनाई दे।लोकतंत्र में किसी प्रदेश का विकास उसके राजनीतिक नेतृत्व के वजन से ही तय होता है।

मप्र की राजनीति का अनुभव यह बताता है कि कमजोर और अस्थिर प्रादेशिक नेतृत्व ने प्रदेश के विकास की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया था। यह माना जाना भी गलत नहीं होगा कि इतने बरसों में राजनीतिक दलों और नेताओं ने प्रदेश में राज कम किया और राजनीति अधिक की। समस्याओं पर मुख्यमंत्रियों और सत्ताधारी दलों के एजेंडे में प्रदेश का विकास सालों तक हाशिये में ही सिमटा रहा था।


अगली स्लाइड्स पर पढ़ें मप्र के राजनीति में आए कुछ बड़े बदलाव....

(नोट-यह लेख राजनीतिक विशेषज्ञ गिरिजाशंकर ने लिखा है।)