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डाउनलोड करेंसामाजिक संस्था सरोकार के तत्वावधान में राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर बेटियों का सम्मान हो-स्कूलों में शौचालय हों विषय को लेकर शुक्रवार को एक परिचर्चा का आयोजन किया गया।
भोपाल। बेटियों के जीवन, रक्षा और सम्मान को लेकर कई वर्षों से लगातार कार्य कर रहे सरोकार समूह द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में यह तथ्य मुखरता से सामने आया कि राजधानी सहित प्रदेश के अधिकांश स्कूलों में छात्राओं के लिए पृथक से शौचालय की व्यवस्था नहीं होने के कारण बेटियों को बहुत ही असम्मानजनक व असुविधा की स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसके कारण लड़कियां न सिर्फ स्कूल जाने से कतराती हैं, बल्कि बड़ी संख्या में पढ़ाई भी छोड़ रही हैं।
इसके अलावा बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल है, जहां छात्राओं के लिए शौचालय तो हैं, लेकिन वह या तो अधूरे बने हैं या उनमें ताले लटके हैं। परिचर्चा में सागर मैनेजमेंट ग्रुप के एडवाइजर प्रो. व्हीपी सिंह ने कहा कि राज्य सरकार बेटियों की शिक्षा और सम्मान की बात तो करती है, लेकिन धरातल पर तस्वीर इसके उलट हैं। बेटियां पढऩा भी चाहती हैं, लेकिन स्कूलों में उनके लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। ऐसे में लाड़ली लक्ष्मी और स्वागतम लक्ष्मी जैसी योजनाओं की सफलता की बात बेमानी है।
वरिष्ठ समाजसेवी जी एस आसीवाल, शिक्षिका संतोष दुबे, पल्लवी मालवीय के अलावा विभिन्न सरकारी स्कूलों की छात्राओं पूजा, रोहणी आदि ने जानकारी दी विद्यालय में शौचालय न होने के कारण छात्राओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह छात्राओं के सम्मान और स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है, जिसपर राज्य सरकार को तुरंत कदम उठाना चाहिए।
सरोकार की सचिव कुमुद सिंह ने प्रथम संस्था द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर तैयार रिपोर्ट असर ( एनुअल स्टेटस एजुकेशन रिपोर्ट 2013 ) का उल्लेख करते हुए बताया कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार 2009 के तहत विद्यालयों के लिए तय मानकों का शौचालयों के मामले में भी पालन नहीं हो रहा है। जिसकी वजह से लड़कियां बड़ी संख्या में पढ़ाई छोड़ रही हैं। खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों की स्कूलों की यह तस्वीर चौंकाने वाली है कि प्रदेश के कुल सरकारी स्कूलों में से 34 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की सुविधा ही नहीं है। जहां शौचालय हैं, वहां 11.2 फीसदी स्कूलों के शौचालयों में ताले लटके हैं और इसके अलावा 15.7 फीसदी स्कूलों में शौचालय उपयोग के लायक ही नहीं हैं। इस प्रकार असुविधा का यह आंकड़ा 60 फीसदी से ऊपर चला जाता है।
राजधानी सहित शहरी स्कूलों की तस्वीर कुछ इससे अलग नहीं है। आजादी के 66 साल बाद भी राज्य के स्कूलों में बेटियों को उनकी बुनियादी सुविधा भी नहीं मिल सकी है। परिचर्चा में शामिल बुद्धिजीवियों ने इसके भयावह स्थिति के लिए सरकार की नीतियों और राजनैतिक अदूरदर्शिता को जिम्मेदार ठहराया है। परिचर्चा में एक स्वर से बेटियोंं के हितों की बात करने वाली राज्य की शिवराज सिंह सरकार से स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था किए जाने की मांग की गई, ताकि उनके सम्मान के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखा जा सके। राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर सरोकार ने बेटियो के लिए स्कूलों में शौचालय के मुद्दे पर अभियान चलाने का भी संकल्प व्यक्त किया।
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