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कृषि महोत्सव २०१४ : मप्र के किसान, बने देश की शान

7 वर्ष पहले
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(DEMO PIC:)
  • जय किसान! मप्र के किसान इस नारे को लगातार सार्थक करते आ रहे हैं। मप्र ने बीते कुछ वर्षों में ऊंची कृषि विकास दर हासिल कर देश में पहला मुकाम हासिल किया है। वहीं तीसरी बार फिर से मध्यप्रदेश कृषि कर्मण अवार्ड 2013-14 के लिए शार्ट लिस्टेड हुआ है।
भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लाल परेड मैदान पर कृषि महोत्सव कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने की। विशिष्ट अतिथि किसान-कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री गौरीशंकर बिसेन। इस मौके पर पूर्व सांसद कैलाश जोशी, पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव, मप्र कृषक आयोग के चेयरमेन कैलाश पाटीदार, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार चौहान आदि मौजूद।
उत्सव के बारे में...
प्रदेश में कृषि महोत्सव के आयोजन का मुख्य उद्देश्य किसानों की तरक्की और खेती-किसानी की उपलब्धियों का उत्सव मनाना है। साथ ही महोत्सव के दौरान कृषि एवं सम्बद्ध विषयों जैसे पशुपालन, उद्यानिकी, मछली पालन आदि पर किसानों एवं कृषि वैज्ञानिकों के मध्य सीधा संपर्क कायम कर दोनों के मध्य नवीन एवं वैज्ञानिक तकनीकी सुधार से वर्तमान फसलों की उत्पादकता बढ़ाना एवं नवीन फसल किस्मों की संभावनाओं के आधार पर भविष्य में प्रदेश के फसल चक्र को परिवर्तन कर कृषि को लाभ का धंधा बनाने के लिये विभिन्न कार्यक्रम जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर आयोजित हो रहे हैं। कृषि महोत्सव प्रदेश के सभी जिलों में 25 सितम्बर से 20 अक्टूबर की अवधि में मनाया जा रहा है।

मध्यप्रदेश कृषि कर्मण अवार्ड 2013-14 के लिए शार्ट लिस्टेड:
  • दो साल से लगातार मिल चुका है प्रदेश को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार: कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियों के फलस्वरूप पिछले दो साल तक भारत सरकार का प्रतिष्ठित कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त करने वाले मध्यप्रदेश को वर्ष 2013-14 के लिए भी शार्ट लिस्ट किया गया है। मध्यप्रदेश शॉर्ट लिस्टेड होने वाले पांच बड़े राज्यों में शामिल है। अन्य राज्य हैं आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पंजाब।
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने 14 अक्टूबर को नई दिल्ली में स्क्रीनिंग कमेटी के सामने प्रेजेंटेशन के लिए मप्र को बुलाया गया है। समिति के अध्यक्ष भारत सरकार के कृषि सचिव हैं। प्रेजेंटेशन में वर्ष 2013-14 में खाद्यान्न, तिलहन उत्पादन और राज्य सरकार द्वारा इन उपलब्धियों के लिए अपनाई गई रणनीति एवं उपायों को शामिल करने के लिए कहा गया है। प्रेजेंटेशन में ऊर्जा, सिंचाई, खाद्य, साख इत्यादि से जुड़े विभागों के बीच समन्वय के लिये किए गए उपायों पर भी जानकारी देने को कहा गया है।

2 करोड़ रुपए का है पुरस्कार...
मध्यप्रदेश को दो वर्ष से लगातार कृषि कर्मण अवार्ड मिल रहा है। राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाला यह पुरस्कार 2 करोड़ रुपए का होता है। इस वर्ष ओला-पाला आदि प्राकृतिक आपदा से फसल को हुए भारी नुकसान के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार की कृषि और कृषक हितैषी नीतियों के चलते मध्यप्रदेश की कृषि की स्थिति बहुत अच्छी है।

देश में पहला मुकाम
मध्यप्रदेश ने बीते कुछ वर्षों में ऊंची कृषि विकास दर हासिल कर देश में पहला मुकाम हासिल किया है। साल 2012-13 में प्रदेश की कृषि विकास दर 20.16 और साल 2011-12 में 19.85 फीसदी रही। साल 2013-14 के अग्रिम अनुमान के अनुसार यह 24.99 फीसदी है।

एक बड़ी उपलब्धि यह है कि मध्यप्रदेश में 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-11) में कृषि विकास दर का लक्ष्य 2.5 फीसदी तय किया गया था। इसके बरक्स इस दौरान 9.04 फीसदी विकास दर हासिल की गई। इसकी तुलना में देश में सकल कृषि विकास दर का लक्ष्य 4 फीसदी था, जबकि हासिल सिर्फ 2.5 फीसदी की जा सकी।

दलहन, तिलहन और चना उत्पादन में तो मध्यप्रदेश पहले से ही अगुवा है। बीते तीन साल में किसानी में बड़ी उपलब्धियों के चलते देश में हरित क्रांति के जनक कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर प्रदेश को सर्वश्रेष्ठ कृषि राज्य श्रेणी में एग्रीकल्चर लीडरशिप अवार्ड भी मिला है।

खेती के लिए भरपूर बिजली
राज्य सरकार ने खेती के लिए ब्याज रहित ऋण देने की व्यवस्था की है। पिछले पांच साल में 39 हजार 820 करोड़ रुपए ऋण के रूप उपलब्ध करवाए गए। गेहूं उत्पादन के लिए 34 हजार करोड़ बोनस के रूप में दिए गए। खेती के लिए सहकारिता कर्ज वर्ष 2013-14 में बढ़कर 11 हजार 209 करोड़ रुपए हो गया है। यह वर्ष 2003-04 में मात्र 1213 करोड़ रुपए था। किसानों को गेहूं, मक्का और धान की खरीदी पर बोनस भुगतान की व्यवस्था की गई।
सिंचाई व्यवस्था में लगातार सुधार
पिछले दस साल में प्रदेश ने सिंचाई क्षमता बढ़ाने में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया है। वर्ष 2003 में जहां मात्र साढ़े सात लाख हेक्टेयर में सिंचाई होती थी, आज 27.5 लाख हेक्टेयर में सिंचाई हो रही है। अब खेती के लिए दस घंटे बिजली मिल रही है। किसानों को फ्लेट दर पर साल में दो बार बिजली का बिल भरने की सुविधा दी गई है। उत्पादन में बढ़ोतरी को देखते हुए प्रदेश ने अपनी भण्डारण क्षमता में भी वृद्धि की है। वर्ष 2010-11 में यह क्षमता 79 लाख मीट्रिक टन थी, जो 2013-14 में बढ़कर 115 लाख मीट्रिक टन हो गई है।
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