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सुनीता

7 वर्ष पहले
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(PIC: अपने विकलांग पिता रम्मू और मां पुताई के साथ अनिता)
भोपाल। कुछ असंभव है नहीं; बस थोड़ी आग दिल में चाहिए। ऐसी ही आग है मप्र के बैतूल जिले में मौजूद एक आदिवासी बाहुल्य गांव झापल की रहने वालीं अनिता बारस्कर के मन में। गाय-बैल चराने वालीं अनिता का चयन मप्र सरकार की आदिवासी विदेश अध्ययन योजना के अंतर्गत हुआ है। अनिता इंग्लैंड से न्यूक्लियर इंजीनियरिंग में पीएचडी करेंगी।

12 किलोमीटर पैदल जाती थीं पढ़ने
अनीता बताती हैं, 'मैं तो जंगल में गाय-बैल चराने जाती थी। हमारे गांव के स्कूल के मास्टर मन्नूलाल ने कहा कि तुम पढ़ाई करो। तब मुझे 6 किमी दूर गोहटी गांव में पढ़ने जाना पड़ा। 5 वीं तक वहां पढ़ी। इसके बाद 8वीं की पढ़ाई अपने ही गांव से पूरी की। लेकिन 9वीं की पढ़ाई के लिए फिर 12 किमी दूर रतनपुर गांव जाना पड़ा। वहां से 10 वीं पास की। 11 और 12वीं हरदा जिले के टिमरनी कस्बे के स्कूल से पास की।'

अनिता बताती हैं, मैं जब हरदा के सरकारी कॉलेज से बीएसएसी और एमएससी(केमिस्ट्री) की पढ़ाई कर रही थी, तब अपना खर्चा उठाने के लिए समय निकालकर खेतों में काम भी करती थी।' अनिता ने बीएससी 67 प्रतिशत और एमएससी 64 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया।

परिवार में सभी अनपढ़.
अनिता के पिता सम्मू विकलांग हैं। मां पुताई खेतों में मजदूरी करती है। अनिता के अलावा उसके दो भाई और तीन बहनें और हैं। अनिता इनमें सबसे छोटी है। इस परिवार के सभी लोग अनपढ़ हैं। अनिता के अलावा गांव में भी कोई उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाया है। फिलहाल अनिता अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन देती हैं, ताकि घरवालाें की कुछ आर्थिक मदद हो सके।

ऐसे मिला प्रोत्साहन...
अनिता बताती हैं, 'एक दिन हमारे प्रोफेसर देवेंद्र रोडगे ने दैनिक भास्कर में पढ़ा कि आदिवासी विभाग की तरफ से विदेश जाने के लिए स्कॉलरशिप निकली है। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं फॉर्म भर दूं। मैंने 30 सितंबर को फॉर्म भरा और 22 नवंबर को मंत्रालय में इंटरव्यू हुआ। इंटरव्यू के लिए मेरे अलावा 27 स्टूडेंट्स और पहुंचे थे। अगले दिन मालूम चला कि मेरा सिलेक्शन हो गया है। मैं हरदा में हॉस्टल में रहकर अंग्रेजी की कोचिंग कर रही हूं। अनिता बताती हैं, मैंने सोचा था कि मैं अपने जीवन में इतिहास बनाऊंगी और मैंने इस दिशा में एक कदम बढ़ा दिया है।



यह है योजना
पिछले दिनों मंत्रालय में प्रमुख सचिव आदिम जाति कल्याण पीसी मीना ने 28 आदिवासी छात्र-छात्राओं को इंटरव्यू लिया था। इसमें 20 बच्चों का चयन हुआ था, इसमें अनिता भी शामिल है। विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना के तहत सरकार गरीब बच्चों को चयन प्रक्रिया के बाद अपने खर्चे पर पढऩे विदेश भेजती है।

यह मिलेगी सरकारी मदद
  1. रहने-खाने का खर्चा करीब 10 हजार अमेरिकी डॉलर।
  2. आकस्मिक भत्ता एक हजार अमेरिकी डॉलर।
  3. उपकरण भत्ता 1500 भारतीय मुद्रा।
  4. प्रवेश शुल्क, शिक्षण शुल्क, बीमा प्रीमियम, एयर टिकट, वीजा शुल्क आदि।
कहते हैं अधिकारी
हमारा तो यही प्रयास है कि अनिता हरदा का रोल मॉडल बने। वह आदिवासी गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करे।
वीके बाथम, संभाग आयुक्त नर्मदापुरम
अनिता अभी इंग्लिश की कोचिंग कर रही है। गांवों में ऐसी लड़कियां मिलना बहुत मुश्किल है, जो पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहती हाें।
रजनीश श्रीवास्तव, कलेक्टर, हरदा
अंदर देखें अनिता कैसे माहौल में पढ़ी-बढ़ी...