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इस लैंप की रोशनी में पढ़कर सत्यार्थी ने पाया नोबेल पुरस्कार

7 वर्ष पहले
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(फोटो- यह है कैलाश सत्यार्थी का विदिशा स्थित घर का वह कमरा, जहां वे घंटों काम किया करते थे।)
भोपाल। शांति के लिए इस साल के संयुक्त नोबेल पुरस्कार विजेता मध्य प्रदेश के विदिशा के सत्यार्थी को बुधवार को नॉर्वे के ओस्लो शहर में शांति के लिए 2015 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। विदेशी मूल की मदर टेरेसा के बाद भारत की किसी शख्सियत को शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में जन्मे कैलाश सत्यार्थी बचपन से ही कुरीति विरोधी रहे हैं। उनको मिले इस सम्मान को लेकर विदिशा में उनके परिजन एवं पड़ोसियों में जश्न का माहौल है।

इस लैंप की रोशनी में करते थे लगातार काम
जमीन से जुड़े कैलाश सत्यार्थी का बचपन बेहद साधारण रहा है। विदिशा स्थित उनके कच्चे-पक्के से बने घर में उनका बचपन बिता है। इस पुराने से कमरे और इस लैंप की रोशनी में घंटों काम कर के सत्यार्थी ने नोबेल पुरस्कार तक पहुंचने का रास्ता बनाया है। इस कमरे और इस लैंप से उनके सैकड़ों यादें जुड़ी है। वे और उनके दोस्त यहां बैठकर घंटों अपने काम एवं इनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा किया करते थे।

यह है सत्यार्थी का अचीवमेंट
11 जनवरी 1954 को जन्मे कैलाश सत्यार्थी को भोपाल गैस त्रासदी के राहत अभियान और बच्चों के लिए काम करने को लेकर दुनिया का ये सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं।
यह भारतीयों का सम्मान है
कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि ये सम्मान सवा सौ करोड़ भारतीयों का सम्मान है। ये भारत के लोकतंत्र की जीत है जिसकी वजह से भारत से ये लड़ाई आरंभ हुई और आज दुनिया में हम जीत रहे हैं। ये उन बच्चों की भी जीत है जो अपनी जिंदगी बदलने के कड़े संघर्ष में जुटे हैं।

मेरी नहीं उन बच्चों की जीत हैः सत्यार्थी

कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, 'यह सम्मान उन तमाम बच्चों काे जाता है, जिनके लिए मैं और मेरी टीम काम कर रही है। यह उन बच्चों की मांओं की दुआओं का फल भी है, जिन्हें हमारी टीम ने बाल मजदूरी और चाइल्ड ट्रैफिकिंग से छुड़ाकर मां की गोद तक वापस पहुंचाया। यह उन बच्चों की भी जीत है, जो कड़े संघर्षों के बाद अपनी जिंदगी बदलने में जुटे हैं।'

मैं अहंकार से आजाद हो रहा हूं...
कैलाश सत्यार्थी ने कहा, जितनी आजादी मुझे बाहर की दिख्र रही है, उससे ज्यादा अंदर की आजादी महसूस कर रहा हूं। हर बार जब हम किसी बच्चे को आजाद कराते हैं, तो मैं भीतर से भी खुद आजाद होता हूं। बहुत सारी बुराई अौर अहंकार से आजाद हो रहा हूं। समाज के लिए कुछ कर पाना जीवन में कुछ कर पाने जैसा है। बाल बंधुआ मजदूरी जैसे शब्द जब हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर दुनिय में ले गए, तो ये शब्द दूसरे देशों के लिए नए थे।
लड़ाई लंबी है...
हमें पता था कि यह लड़ाई लंबी है। इसके राहें भी कांटो भरी। इसके लिए बड़े-बड़े से बलिदान देने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार रहना होगा। कहा गया है कि,'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग आते गया और कारवां बनता गया।' मेरी छोटी सी मुहिम, जिसे मैंने विदिशा अपने घर से शुरू किया था, मेरे साथियों ने मेरे साथ कंधे से कंधे मिलाकर सारी दुनिया को इससे जोड़ दिया।
हमें लड़ना होगा, चाहे कितना कष्ट हो...
यह बात करते हुए कैलाश सत्यर्थी थोड़े से भावुक हुए और कहा कि यह लड़ाई अभी जारी है। जब तक समाज देश और दुनिया से बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी और चाइल्ड ट्रैफिकंग जैसे शब्द समाप्त न हो जाएं, तब तक हमें लड़ते रहना है। हमें इस मुहिम में बहुत चोंटे आईं। मानसिक, शारीरिक प्रताड़नाएं और विरोध भी सहने पड़े। इस लड़ाई में दो साथियों को खोना पड़ा। जब सामाजिक लड़ाई होती है, तो वह आपका प्रतिरोध करती है, यही तो चैलेंज है कि, उसमें अपाच्युनिटी ढूंढना और उसे मुकाम पर पहुंचाना है।
सवा सौ करोड़ लोगों का सम्मान...
शांति नोबेल पुरस्कार सवा सौ करोड़ भारतीयों का सम्मान है। ये भारत के लोकतंत्र की जीत है, जिसकी वजह से भारत से ये लड़ाई आरंभ हुई और आज दुनिया में हम जीत रहे हैं। यह 80,000 से ज्यादा उन बच्चों का और मेरे शहीद हुए साथी और जो इस मुहिम में अपरोक्ष और अपरोक्ष रूप से जुडे हैं, ये उन सबकी जीत और उन सबका सम्मान है।
विदिशा, भोपाल और फिर दुनिया का सफर...
कैलाश सत्यार्थी विदिशा, भोपाल फिर मध्यप्रदेश के अन्य जिलों और शहरों में बाल मजदूरी के खिलाफ अभियान का शंखनाद करते हुए दिल्ली पहुंचे। वहां बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से दुनियाभर में इस मुहिम को पहुंचाया और अनेक अंतरराष्ट्रीय आर्गेनाइजेशन को इससे जोड़ा। इस आंदोलन को राष्ट्रव्यापी बनाया। समाज में फैली बाल मजदूरी की कुरीति को समाज से दूर करने के लिए तमाम विरोध अौर अवरोध सहते हुए बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यर्थी ने हार नहीं मानी। सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद इस आंदोलन से जुड़े देश और विदेश में रह रहे वॉलेंटियर्स में खुशी की लहर है।
पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे हैं सत्यार्थी
पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे कैलाश सत्यार्थी ने 26 वर्ष की उम्र में ही करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। उन्हें बाल श्रम के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर हज़ारों बच्चों की ज़िंदग़ियां बचाने का श्रेय दिया जाता है। इस समय वे 'ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर' (बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान) के अध्यक्ष भी हैं।

सत्यार्थी के बारे में कुछ विशेष बातें...

  • अनेक उद्योगों, संस्थाओं, प्रतिष्ठानों में अंधे-गूंगे, बहरे, निर्बल, मासूम बच्चों को अगवाकर बंधुआ बनाकर उनके शोषण की पराकाष्ठा की जा रही है। उन शोषित बच्चों को मुक्त कराकर जीवन की मुख्य धाराओं से जोड़ना ही इन्होने अपना मिशन माना है।
  • प्रत्येक संकट एवं संघर्ष के समय मां बेतवा, बुजुर्गो, परिवारजनों एवं विदिशा के साथियों के स्मरण ने ही मुझे संबल दिया।
  • 1953 में विदिशा से जन्मे, वहीं पले-बढ़े, सम्राट अशोक कालेज से इन्जीनियरिंग की। वैवाहिक जीवन से एक पुत्र और एक पुत्री।
  • मंदसौर से काम शुरू किया। मूल काम बाल मजदूरी पर केंद्रित स्लेट पेंसिल उद्योग में लगे बच्चों को सबसे पहले छुडवाया। वहीं पर मुक्ति आश्रम की स्थापना की।
  • सागर में भी काम किया, यहां भी मुक्ति आश्रम की स्थापना।
  • कुछ सालों बाद स्वामी अग्निवेश के साथ काम किया। 1993 में अशोका फैलोशिप मिली और उसके बाद स्वतंत्र रूप से काम किया|
  • इसके बाद ग्लोबल मार्च किया, जिससे इनकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी। दक्षिण एशिया स्तर पर बहुत सारे संगठनों के साथ सक्रिय।
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