पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • इस बच्चे का ६ सेंस गजब का, आंख पर पट्टी बांधकर पढ़ लेता है

इस बच्चे का ६ सेंस गजब का, आंख पर पट्टी बांधकर पढ़ लेता है

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
(PIC: आंख बंद करके अखबार पढ़ता रिधांग)
भोपाल। अहमदाबाद का रहने वाला 9 साल का रिधांग जैन आंखों पर पट्टी बांधकर किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छू कर, सूंघ कर उसके बारे में सटीक बता देता है, मानो उसे खुली आंखों से देख रहा हो। अगर आप समझ रहे हैं कि रिधांग को ये चमत्कारी ताकत जन्म से नहीं मिली है, तो ऐसा नहीं है। रिधांग को यह वरदान योग और विज्ञान के मिलेजुले चमत्कार से मिला है। रिधांग ने ग्वालियर स्थित दैनिक भास्कर के कार्यालय में इस तकनीक का प्रदर्शन किया।
चमत्कार नहीं; योग और विज्ञान का मिलाजुला प्रयोग...

यह 'मिड ब्रेन एक्टिवेशन टेक्निक' के जरिये होता है। इसमें लगातार अभ्यास, जिसमें बच्चों को ब्रेन-एक्सरसाइज, ब्रेन-जिम, मेडिटेशन और विशेष तौर पर कंपोज किए गए स्प्रिचुअल-म्यूजिक पर डांस कराया जाता है। भारतीय योग और जापानी तकनीक के मिलेजुले अभ्यास से बच्चों की इंद्रियों को अति संवेदनशील बना दिया जाता है। इस अभ्यास के बाद बच्चा अपने आसपास के संसार को सभी इंद्रियों से महसूस कर पाता है।

रिधांग की स्पर्श-इंद्रियां हो गई हैं अति-सूक्ष्मग्राही
'मिड ब्रेन एक्टिवेशन टेक्निक' के लगातार अभ्यास से रिधांग की सूंघने और स्पर्श से चीजों को पहचानने की क्षमता बढ़ गई है। रिधांग आंखों पर पट्टी बांध देने के बावजूद छू कर या सूंघ कर लिखे हुए को पढ़ लेता है। रिधांग की सूंघने की क्षमता और उंगलियां के स्पर्श से ऑब्जेक्ट (वस्तु) का सटीक अक्श उसके मिड ब्रेन पर उभर उठता है। नतीजतन वह ऑब्जेक्ट के बारे में सब कुछ बयां कर आम आदमी को अचंभे में डाल देता है।

मेडिटेशन के अभ्यास से मिड-ब्रेन को शून्य पर करते हैं केंद्रित
हमारे मस्तिष्क के तीन भाग होते हैं। राइट ब्रेन, लेफ्ट ब्रेन (कंशियस, अन-कंशियस) एवं मिड ब्रेन। योग और विज्ञान के संयोग से विकसित इस विशेष तकनीक का अभ्यास कराकर बच्चे के दिमाग को अल्फा या शून्य की स्टेज में लाया जाता है। इस स्थिति में मिड-ब्रेन 'कंशियस- अनकंशियस' के बीच बीच ब्रिज का काम करने लगता है। नतीजतन सभी इंद्रियां एक साथ ऑब्जेक्ट को महसूस कर मस्तिष्क को सूचना देने लगती हैं।

म्यूजिक, डांस, जिमिंग, पजल्स व गेम्स बनाते हैं अभ्यास को आसान और रोचक
पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक प्रणाली पर आधारित है। इसमें बच्चों के कंफर्ट जोन में जाकर उन्हें ब्रेन एक्सरसाइज, ब्रेन जिम, डांस, पजल्स,गेम्स तथा योग व ध्यान क्रियाएं सिखाई जाती हैं। पहले और दूसरे दिन 6 घंटे अभ्यास के बाद इसका फॉलोअप दो घंटे हर हफ्ते करवाया जाता है।
इनके लिए कारगर ..
करीब डेढ़ माह के अभ्यास में बच्चों की इंद्रियां संवेदनशील होने लगती हैं। जन्मांध, जन्म से गूंगे-बहरे या इंद्रीय संबंधी किसी दूसरी जन्मजात विकृति से पीड़ित बच्चों के लिए यह तकनीक प्रभावी नहीं है। लेकिन मेंटली-रिटायर्ड, सेरेब्रल पाल्सी व प्रोजेरिया जैसे मानसिक रोगों से पीड़ित बच्चों के लिये ये तकनीक थैरेपी का काम भी कर सकती है।
यह भी है फायदा...
बीते 4-5 सालों से दिल्ली और अहमदाबाद में मिड ब्रेन मास्टर्स एकेडमी चला रहे संजीव जैन के मुताबिक यह तकनीक 5 से लेकर 15 वर्ष तक के बच्चों के लिए बेहद कारगर है।
  1. बच्चे का आई-क्यू बढ़ जाता है।
  2. उसकी ग्रेस्पिंग पावर में वृद्धि हो जाती है।
  3. आंखें बंद रख कर भी किसी भी दृश्य, वस्तु या व्यक्ति को विवरण पेश कर सकता है। नतीजतन स्मरण-शक्ति बढ़ जाती है।
  4. बच्चे में एनालिटिकल एप्रोच उत्पन्न होने लगती है, नतीजतन निर्णय-भमता बढ़ती है।
  5. प्रतिदिन 15 मिनट के अभ्यास से जीवन भर इस टेक्निक का लाभ लिया जा सकता है।
  6. दिमागी रूप से कमजोर बच्चों के विकास के लिए यह तकनीक काफी फायदेमंद है।
  7. आज के दौर के तनाव भरे कम्पिटीशन से बच्चों को डिप्रेशन पैदा होने लगा है, इस तकनीक के अभ्यास से बच्चे में तनावजनित आत्महत्या की प्रवृत्ति विकसित होने से रोका जा सकता है।
  8. इसके अभ्यास से बच्चों के अंदर कई तरह के पॉजिटिव चेंजेज आ जाते हैं।
Photo: Vikram Prajapati
अंदर देखें कुछ तस्वीरें....