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बैजू

7 वर्ष पहले
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एक बार बादशाह अकबर ने एलान किया, जो गायन में तानसेन से मुकाबला करेगा, वो दरबारी संगीतकार होगा। अगर हारा, तो उसे मृत्युदंड मिलेगा। बैजू बावरा ने यह शर्त मंजूर की और तानसेन को झुकने पर विवश कर दिया। बैजू ने अपनी तान से पत्थर को भी मोम-सा पिघला दिया था।

भोपाल। तानसेन का ज़िक्र होते ही एक नाम और उभर कर आता है, बैजू बावरा का। बैजू भले किसी शहंशाह का नवरत्न नहीं बन सका, लेकिन उसके भारतीय संगीत को दिए योगदान को संगीत जगत कभी भुला नहीं सकेगा।

ऐसे थे बैजू बावरा...
मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक संगीत सम्राट तानसेन को सुरों में मात देना किसी के बस की बात नहीं थी, लेकिन यह काम किया सुरों के दूसरे जादूगर बैजू बावरा ने। बैजू ने अपने सुरों से तानसेन को भी सिर झुकाने पर मजबूर कर दिया। बैजू बावरा के संगीत की प्रेरणास्रोत थीं चंदेरी की एक युवती, जिसके प्यार में डूबकर वे ऐसे सुर छेड़ते, जिससे लोग मदहोश हो जाते थे।

ग्वालियर के राजा मानसिंह के दरबार के गायक और उनकी संगीत नर्सरी के माली के जीवन के बारे में बहुत सी किंवदंतियां हैं। बैजू बावरा इसी नर्सरी में संगीत के सुरों में पारंगत हुए थे। बैजू बावरा का जन्म गुजरात के चांपानेर गांव के एक ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनका असली नाम बैजनाथ मिश्र था। तानसेन के गुरुभाई पंडित बैजनाथ की बाल्यकाल से ही गायन एवं संगीत में काफी रुचि थी। उनके गले की मधुरता और गायन की चतुराई प्रभावशाली थी। पंडित बैजनाथ को बचपन में लोग प्यार से 'बैजू' कहकर पुकारते थे।

प्यार में बावले हुए, तो बावरा कहलाए
बैजू युवा हुए तो चंदेरी की कलावती नामक युवती से उनको प्रेम हो गया। वे उसके प्रेम में पागल हो गए। हालांकि बैजू की प्रेयसी उनके लिए प्रेरणास्रोत बन गई। बाद में, लोग उन्हें उन्हें बैजू बावरा कहने लगे।

अंदर पढ़ें पत्थर भी मोम की तरह पिघल जाते थे बैजू के गायन की तड़प से