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जब पड़ा अकाल, तब माधवराव सिंधिया-प्रथम ने शुरू किया एक मेला

7 वर्ष पहले
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भोपाल। 16 दिसंबर सेग्वालियर में शुरू हुए 'व्यापार मेला' केवल ग्वालियर ही नहीं बल्कि देश भर में प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत का इतिहास 109 साल पुराना है। आज भले ही ये बड़े से बड़े सामान की खरीदी के लिए मशहूर है, लेकिन 1905 में किसानों को अन्नदाता पुकारने वाले तत्कालीन महाराजा माधवराव सिंधिया प्रथम ने पशु प्रदर्शनी के रूप में इसकी शुरुआत उस वक्त पड़े अकाल के दौरान की थी। मकसद था खेती के साथ पशुपालन को प्रोत्साहन देना।
पढ़िए मेले की कहानी ग्वालियर की जुबानी...
मैं हूं ग्वालियर का एक युवा। हर साल मेले में महज खाने-पीने और मौज करना ही मेरा मकसद रहता है। बुजुर्ग बताते हैं कि एक दौर वह भी था, जब शहर ही नहीं, प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से सैलानी छोटे-बड़े सामान की खरीदारी करने और कारोबारी जायजा लेने के लिए आते थे।
अब...
दो दशकों से हुकूमतों की सियासत में कुछ ऐसा हुआ कि इस मेले का रंग फीका पड़ गया। आज 400 करोड़ रुपए से भी ज्यादा के कारोबार के बावजूद व्यापारी और खरीदार मेले को बहुत बड़ा आकर्षण नहीं मानते।
पशु प्रदर्शनी के रूप में शुरू हुआ मेला
मेरे पूर्वज बताते हैं कि 1905 में शुरू हुआ यह मेला कालांतर में पशु मेले के साथ व्यापारी और खरीदारों की रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने के लिए लगने वाले बाजार का सुनियोजित रूप है। मेले के प्रति लोगों का उत्साह देखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने 1984 में इसे राज्य स्तरीय ट्रेड फेयर का दर्जा दे दिया। 1986 में ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण अधिनियम लागू हुआ। सबसे पहले माधव राव सिंधिया द्वितीय को अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया था। सिंधिया के बाद दैनिक भास्कर समूह के चेयरमैन रमेश अग्रवाल मेला प्राधिकरण के अध्यक्ष बनाए गए थे।
करोड़ों का होने लगा कारोबार
देश के दूर-दराज से लोग मेले में खरीदारी करने आते थे। हम ग्वालियरवासी रिश्तेदारों की आवभगत और मेहमानवाज़ी की तैयारी में जुट जाते थे। बच्चों को खुशी होती थी कि स्कूल से छुट्टियां मारने का मौका मिलेगा। नौकरीपेशा लोग रिश्तेदारों की आमद की तारीख तय होते होते ही काम से छुट्टी की दरख्वास्त दे देते थे। 1984 में राज्यस्तरीय ट्रेडफेयर का दर्जा मिलने के बाद प्रदेश सरकार ने बिक्री कर में 50 फीसदी की छूट शुरू कर दी। इस छूट से कारोबार बढ़ा, तो मेला प्राधिकरण की आय भी बढ़ी। शताब्दी वर्ष 2005 में मेले में करीब 500 करोड़ रुपए का कारोबार हुआ।
शिल्प मेला बन गया नया आकर्षण
दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले मेले से प्रेरणा ले ग्वालियर मेले में भी 1988 में हस्तशिल्प मेला एवं प्रदर्शनी शुरू की गई। दिल्ली से लौटते देशभर के कारोबारियों को महज 350 किलोमीटर दूर इकट्ठे लाखों सैलानियों का आकर्षण आसानी से ग्वालियर खींच लाया। नतीजतन 1988 में 5 लाख रुपए से शुरू हुई शिल्प मेले की आमदनी करोड़ों में पहुंच गई।
बाल-रेल की सैर ने लुभाया था बचपन
हमारे मेहमान मेले में जाकर खरीदारी में जुट जाते थे। सुबह से शाम हो जाती थी और हम बच्चे उनके साथ दिनभर बोर होते थे, लेकिन ऊंचे झूलों का रोमांच और उससे सबसे ज्यादा 1982 में शुरू की गई छुक-छुक करती नन्ही रेल की सैर हमारी सारी बोरियत दूर कर देती थी।
सांस्कृतिक मनोरंजन ने बनाई दिलों में जगह
मनोरंजन के लिए शुरू की गई लोकसंगीतों की परंपरा हमारे बचपन तक अखिल भारतीय स्तर के कवि-सम्मेलन, मुशायरा, रंगमंच तक जा पहुंची। साथ ही, दूसरे पारंपरिक मेलों की तरह सर्कस जैसे मनोरंजन भी मुहैया होने लगे। मुझे याद है कि हमारे यहां आने वाले मेहमान कवि सम्मेलन और मुशायरे की तारीखों के साथ अपना शेड्यूल तय करते थे।
मेले का स्वरूप
  1. इस वर्ष के मेले में एक हजार से ज्यादा छोटे-बड़े व्यापारी शिरकत कर रहे हैं।
  2. मेले में 50 लाख से अधिक सैलानियों के आने की उम्मीद है।
  3. मेला 104 एकड़ के विस्तृत भू-भाग में फैला है।
  4. मेला परिसर में पक्की सड़कें, 1400 दुकान, 1000 से अधिक प्लेटफॉर्मस की अधोसंरचना, आवश्यक सुविधाएं जैसे कि स्वतंत्र विद्युत, पानी, पोस्ट ऑफिस, पुलिस नियंत्रित सुरक्षा, चिकित्सा, अग्निशमन आदि उपलब्ध हैं।
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