भोपाल। बैतूल जिले के रहने वाले रिटायर्ड प्राचार्य महेश पचौरी के पिता की शादी इन दिनों चर्चाओं में है। मूलतः होशंगाबाद जिले के मछेरा गांव में होने वाली इस अनोखी शादी में दूल्हा 95 और दुल्हन की उम्र 93 है। उनकी शादी को 75 साल पूरे हो जाने की खुशी में उनके बच्चों ने एक बार फिर भव्य शादी समारोह का आयोजन किया। रविवार को करीब 12 बजे पूरे विधि-विधान से दूल्हा बनकर 95 साल के शंकरलाल पचौरी घोड़े पर सवार हुए। बाजे-गाजे के साथ बराती दुल्हन के घर पहुंचे। वहीं, दुल्हन के परिवार ने पूरे परम्परानुसार बारातियों का स्वागत किया।
स्टेज पर हुई फूलों की बारिश
इसके बाद परंपरानुसार बारात मंडप में पहुंची और वहां लाल चुनरी में सजी-धजी 93 साल की दुल्हन मीरा बाई हाथों में वरमाला लेकर हाजिर हुई। स्टेज पर फूलों की बारिश और मंत्रों के बीच वर-माला की विधि सम्पन्न हुई।
उपहार में दिया है प्रेम
सैकड़ों लोगों के बीच एक बार फिर शंकर और मीरा ने सात फेरे लिए। इस मौके पर शंकरलाल ने कहा कि 75 साल पहले उनके माता-पिता शादी की खुशियां मना रहे थे और आज उनके बच्चों ने उस पल को ताजा कर दिया। उनसे जब दुल्हन को उपहार देने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि 75 साल से हम दोनों ने एक-दूसरे को उपहार में सिर्फ प्रेम ही दिया है आगे भी वही देंगे। 93 साल की दुल्हन मीरा बाई का भी कहना था कि, अपने नाती-पोतों के साथ दुल्हन बनना एक अनोखा अनुभव रहा, ईश्वर की कृपा से वे सभी के साथ इस खुशी को महसूस कर पा रही हैं।
मेहमानों से भरा था पूरा घर
शंकरलाल की शादी आज से 75 साल पहले 8 फरवरी को ही हुई थी। इस बार फिर 8 फरवरी को उनके आंगन में संगीत बजेगा और फूलों से उनका मंडप सजा। मेहमानों की चहल-पहल से पूरा घर रोशन था। उनके पूरे परिवार ने 8 फरवरी को धूमधाम से उनकी शादी की डायमंड जुबली मनाई।
पीले चावल भेजकर दिया निमंत्रण
विवाह की सारी रस्मे हिंदू रीति-रिवाजों के माध्यम से ही निभाई गई। इसके लिए रिश्तेदारों को पीले-चावल भेजकर निमंत्रण भी दिया गया था। शंकरलाल और मीरा दोनों मछेरा के ही रहने वाले हैं और शादी भी यही हुई थी। 1940 में वे साइकिल पर बैठकर अपनी दुल्हन को लेने गए थे। लेकिन, 75 साल बाद वे कार में अपनी दुल्हन को लेकर घर आए। बारातियों के साथ नाचते-गाते हुए एक बार फिर उस लम्हे को महसूस किया, जो सालों पहले किया था।
बारात लेकर निकले शंकरलाल
उम्र के इतने पड़ाव पार कर चुके शंकरलाल और मीरा अभी भी न केवल स्वस्थ हैं, बल्कि खुशमिजाज भी हैं। उन्हीं की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उनके बच्चों ने धूमधाम से उनकी शादी रचाई। 8 फरवरी रविवार को 12 बजे से पिपरिया के पास पैतृक गांव मछेरा में गाजे-बाजे के साथ बरात निकाली गई। उनके बेटे अरुण ने बताया कि एक बार फिर मां ने दुल्हन बनकर अपने पुराने दिनों को याद किया।
80 साल के भाई ने किया कन्यादान
अपनी बहन के जीवन में आने वाले इस पल को खास बनाने के लिए भाई ने भी खासी तैयारियां कर रखी थी। उस समय (1940 में) परिजनों ने मीरा का कन्यादान किया था। लेकिन इस बार मीरा के छोटे भाई 80 वर्षीय गोपाल शुक्ला कन्यादान की जिम्मेदारी निभाई।
शादी की रस्मों पर एक नजर...
- करीबी रिश्तेदारों को घर-घर जाकर पीले चावल देकर आमंत्रण दिया गया।
- शुक्रवार को मंडप और विशेष कार्यक्रम हुआ।
- शनिवार हल्दी और माता पूजन हुआ।
- रविवार को बरात निकासी, वरमाला और फेरे का कार्यक्रम हुआ, जिसमें गांव के ही पं. अशोक भार्गव ने विवाह कराया।
- सोमवार सुबह दुल्हन की विदाई हुई।
शंकर-मीरा की वंशबेल
- बेटी और दामाद कुसुम यशवंत उपाध्याय: 3 बेटियां, 1 बेटा। 2 नाती, 1 नातिन।
- शारदा प्रकाश लामनिया: इनकी 3 बेटियां और 2 बेटे। 3 नाती, 2 नातिन।
- निर्मला अरूण तिवारी: 3 बेटियां और 1 बेटा। 3 नातिन, 2 नातिन।
- पुत्र और पुत्रवधु महेश-शकुंतला: इनकी 4 बेटियां हैं और 5 पोते-पोतियां।
- राजेंद्र-राजाबाई: इनकी 4 बेटियां, 1 बेटा है। 2 पोते, 3 पोतियां।
- मोहन-लताबाई: 1 बेटा। 1 पोता, 1 पोती।
- संजय-ऊषा बाई: 1 बेटा।
अभी तक मिलती है पेंशन
बैतूल में रहने वाले उनके बड़े बेटे और रिटायर्ड प्राचार्य महेश पचौरी बताते हैं कि उनके पिता पहले किसानी करते थे। कुछ सालों बाद वे शिक्षक बने, जिसकी पेंशन उन्हें अब तक मिलती है। महेश बताते हैं कि मेरी मां और पिता का आपसी प्रेम इतना सुंदर है कि हमें कभी किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा।
अगली स्लाइड्स पर देखें शादी की तस्वीरें....