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झील महोत्सव

6 वर्ष पहले
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भोपाल। 20 फरवरी से बड़े तालाब पर झील महोत्सव की शुरुआत हुई है। झील महोत्सव का आगाज खुद बड़ा तालाब अपनी कहानी सुनाकर करेगा। तालाब के बीच में 'मैं भोजताल हूं' कहानी का वर्णन करने वाली बारह मिनट की शॉर्ट फिल्म दिखाई जाएगी। इस मौके पर DAINIKBHASKAR.COM अापको दिखा रहा है सर्दी-गर्मी, सूखा-बारिश हर मौसम की तस्वीरें। इनमें कुछ 19वीं सदी की तस्वीरें भी शामिल हैं। इसके साथ ही झील का एरियल व्यू भी दिखेगा।
विश्व में पहली बार होगा 'नौका डांस'
इस साल झील महोत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण नौका डांस होगा। महोत्सव में म्युजिक पर रोइंग, कयाक, सेलिंग बोट्स डांस करेंगी। इस तरह का नौका डांस विश्व में पहली बार आयोजित किया जा रहा है। इसे लेकर बड़ी तैयारी चल रही है। गुरुवार शाम इसकी रिहर्सल भी होगी। इसके अलावा झील महोत्सव के दौरान दीपदान भी किया जाएगा। झील महोत्सव 22 फरवरी तक चलेगा।
बड़े तालाब के बनने की कहानी
कहावत है 'तालों में भोपाल ताल, बाकी सब तलैया।' तालाबों की नगरी भोपाल की इसी खासियत को ध्यान में रखते हुए 20 फरवरी से भोपाल में झील महोत्सव मनाया जाएगा। एशिया की सबसे बड़ी कृत्रिम झील को चर्म रोग दूर करने के लिए बनाया गया था। डेढ़ हजार साल पहले राजा भोज ने इसे बनवाया था। भोपाल का सबसे बड़ा तालाब होने के कारण अब इसे बड़ा तालाब कहा जाता है।
भोपाल के इतिहासकार सैयद अख्तर हुसैन बताते हैं, 'लगभग 1450 साल पहले की बात है। धार राज्य के परमार राजा भोज को चर्म रोग था। उनके शरीर से मवाद और खून निकलता था। मरहम-पट्टी में भी उन्हें काफी तकलीफ होती थी। राजा भोज एक साधु से मिले। उन साधु के नाम का अब तक कहीं जिक्र नहीं पढ़ा गया है। उस साधु ने राजा भोज से कहा कि 9 नदी और 99 नालों के पानी को जमा कराे और रोज नहाओ। उससे यह रोग दूर होगा। इस पर राजा ने अपने वजीर कल्याण सिंह को यह काम सौंपा। कल्याण सिंह अपने समय के महानतम आर्किटेक्ट थे। '
एक नदी खोदकर निकाला गया पानी
हुसैन बताते हैं, 'कल्याण सिंह ने तालाब बनवाने का काम शुरू किया। श्यामला हिल्स से लेकर मंडीदीप, दाहोद डेम, औबेदुल्लागंज, दिवटिया और भीमबैठका के पहाड़ों के बीच कई जल स्त्रोत थे। इन जलस्त्रोताें से पानी इकट्ठा किया गया। लेकिन नौ नदी की संख्या पूरी नहीं हो पा रही थी। फिर भदभदा के पास से एक नदी खोदी गई और उसे बेतवा से जोड़ा गया। इस नदी काे कलियासोत नाम दिया गया। बेतवा नदी के जल स्त्रोतों को बेतवा से बड़े तालाब तक पहुंचाने के लिए भोजपुर में डैम बनाया गया। इसके साथ ही श्यामला हिल्स और फतेहगढ़ की पहाडी के बीच में कई फीट का गेप था, यहां भी पानी रोकने के लिए डेम बनाया गया, जिसे आज कमला पार्क के नाम से जाना जाता है। परमार वंश के राजा भोज यहां रोज नहाते थे, जिससे उनका चर्म रोग दूर हो गया। '
सबसे पहले नाम पड़ा भीम कुंड
इतिहासकार सैयद अख्तर हुसैन बताते हैं, 'भारतीय परंपरा में बड़े काम अपने पुरखों के नाम पर होते हैं। राजा भोज ने भी यही किया और सबसे पहले इसका नाम भीमकुंड रखा गया। कमला पार्क पर बने डेम की वजह से इसका नाम भोजपाल भी पड़ा।
चर्म रोग मिटाने वाले ये तत्व थे यहां के पानी में
9 नदी और 99 नालों के पानी से मिलकर बने इस मानव निर्मित तालाब के पानी ने राजा भोज का असाध्य चर्म रोग दूर कर दिया था। हुसैन बताते हैं कि उस समय इसके पानी में सल्फर, गंधक, जिंक ऑक्साइड, मुर्दार संघ सहित कई खनिज तत्व थे, जिस वजह से राजा का चर्म रोग ठीक हो गया।
अगली स्लाइड में देखें, भोपाल के तालाबों की चुनिंदा तस्वीरें
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