पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

भोपाल

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
भोपाल। देश भर में प्रसिद्ध भारत भवन का 34वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। इस समारोह की मुख्य अतिथि होंगी भील कलाकार भूरी बाई। भूरी बाई भले ही बहुत ज्यादा लोकप्रिय न हों, लेकिन भारत भवन में लगे पत्थर उनसे अच्छी तरह वाकिफ हैं। भारत भवन के निर्माण के दौरान भूरी बाई यहां मजदूरी कर चुकी हैं। अब बड़ी कलाकार बन गई हैं और उनकी बनाई पेंटिंग भी यहां प्रदर्शित की जाएगी। पढ़ें, कैसा रहा मजदूर से कलाकार बनने का सफर...
भूरी बाई ने बताया, '35 साल पहले की बात है। तब भोपाल में भारत भवन बन रहा था। मैं ईंटें ढोती थी। रोज 6 रुपए मिलते थे...मैं झाबुआ के पिटोल गांव से आई थी और तब ये 6 रुपए भी 600 के बराबर थे। एक दिन अचानक दाढ़ी वाले एक बाबा आए। हम लोगों से बातेें करने लगे। कहां रहते हो..? हमने बताया- सीएम बंगले के पास झोपड़ी में...। चित्र बनाना आता है...? हमने कहा- घर की दीवारों पर बनाए थे...। उन्होंने अपने झोले से एक कागज और पेंसिल निकाली... बोले इस पर बनाओ...। हमने वही उकेर दिया जो दीवारों पर बनाते थे। वे बोले- अब तुम ईंट मत ढोना... चित्र ही बनाना। हम बोलेे- फिर हमारा घर कैसे चलेगा? 6 रुपए कौन देगा। बाबा बोले- मैं तुम्हें हर रोज 10 रुपए दूंगा। तुम चित्र ही बनाओ। बाद में पता चला कि वे प्रसिद्ध चित्रकार जे. स्वामीनाथन थे।'

'सीएम साब के घर के सामने धूनी बाबा वाले मंदिर के चबूतरे पर बैठकर पहली बार कागज, ब्रश और रंग हाथ में लिए। बैलगाड़ी, चिड़िया, पशु, पेड़-पौधे बनाए। उस चबूतरे पर 10 दिन तक सिर्फ चित्र बनाए। हर रोज 10 रुपए मिले। मैं मजदूरी भी करती रही। एक दिन स्वामीनाथन सर, जया मैडम और युसूफ साहब मेरी झोपड़ी पर आए। हमारे साथ खाना खाया और कहा- भूरी, एक दिन तुम्हें पूरी दुनिया जानेगी... मैं बचपन में अपने घर में गोबर, मिट्टी, घास-फूस से बनीं दीवारों पर मिट्टी और कोयले से चित्र बनाती थी। पिता खेती करते थे। हम तीन बहनें और दो भाई थे। पिता की कमाई काफी नहीं थी। तब मैं अपनी बहन के साथ मजदूरी करने लगी। वहां काम खत्म कर जंगल से इकट्ठे किए पीपल के पत्ते या लकड़ियों, टहनियों के गट्ठर घर से चार किलोमीटर दूर पैदल स्टेशन ले जाते।'
दस पैंटिंग के 1500 मिले तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा
'साबरमती एक्सप्रेस से दाहोद जाते। दो रुपए किलो में बेचकर वापस आते। कभी-कभी लौटने में रात हो जाती थी। दोनों बहनें बहुत मेहनत करतीं। बाकी भाई-बहन छोटे जो थे। उन्हीं दिनों मेरे एक चाचा भोपाल में मजदूरी कर रहे थे। यहां 6 रुपए रोज मिलते हैं। मैं भी भोपाल आ गई। उन्हीं दिनों मेरी शादी जोहरसिंह से भगोरिया मेले में हुई। जोहरसिंह भोपाल पीडब्ल्यूडी में लेबर का काम करता था। शादी के बाद हम बड़े तालाब के किनारे झुग्गी बनाकर रहने लगे। कुछ दिनों बाद मुझे भारत भवन में चित्र बनाने के लिए बुलवाया गया। दस चित्र के मुझे 1500 रुपए मिले। मुझे यकीन नहीं आया। सिर्फ चित्र बनाने के इतने पैसे। मेरे रिश्तेदार और गांव के लोग मेरे पति को भड़काते भी थे, तरह-तरह की बातें करते थे, लेकिन पति ने कभी रोक-टोक नहीं की। फिर पेंटिंग बनाना छूट गया। उसके बाद मैंने पीडब्ल्यूडी में भी मजदूरी की, कईं सालों तक। एक दिन मेरे पति के पहचान वाले ने बताया कि तुम्हारी पत्नी भूरी का अखबार में फोटो आया है। सरकार उसे शिखर सम्मान देगी। तब मैंने कहा कि हमारे घर में सब सामान है फिर सरकार सामान क्यों देगी हमें?'
हवाई जहाज में बैठी तो डर गई थी
'सम्मान के बाद मैं बीमार पड़ गई। तब आदिवासी लोककला परिषद के निदेशक कपिल तिवारी से मिली। उन्होंने इलाज का बंदोबस्त भी कराया और बतौर कलाकार नौकरी भी दे दी। तनख्वाह थी दो हजार रुपए। मैं फिर चित्र बनाने लगी। मुझे दिल्ली पहली बार प्रदर्शनी के लिए बुलाया गया। वहां मुझे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौका मिला। वह दिन बहुत खास था। इसके बाद देशभर से बुलावा आने लगा। मुझे बैंगलोर प्रदर्शनी के लिए हवाई जहाज से बुलाया गया। मैं बचपन में आसमान में हवाई जहाज देखती थी लेकिन कभी सोचा नहीं था कि मैं उसमें बैठूंगी और उडूंगी। बहुत डर लगा हवाई जहाज में।'
अमेरिका के फोक आर्ट मार्केट से बुलावा
'कोलकाता के एक कलाप्रेमी ने मेरी एक पेंटिंग डेढ़ लाख में खरीदी। फिर मुझे अमेरिका में फोकआर्ट मार्केट के लिए बुलाया गया, जहां दुनियाभर के कलाकार आए थे। सब लोग मेरे चित्र को बहुत पसंद कर रहे थे। मेरे पति ने भी मुझसे भीली चित्र बनाना सीखा और मेरा हाथ बंटाना शुरु कर दिया। मेरे पति का चार साल पहले निधन हो गया। आज मेरा अपना घर है। छह बच्चे हैं। चार लड़के, दो लड़कियां सबकी शादी हो चुकी है। बड़ी बेटी शांताबाई, छोटा बेटा अनिल और बहू सविता ने मुझसे भील चित्रकारी सीखी है। वे चित्र बनाते हैं।'
आगे की स्लाइड्स में देखें photos...
खबरें और भी हैं...