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इस संत के जीवत रहते स्टूडेंट कर रहे हैं इन पर पीएचडी, जानें क्या है खूबी

इस संत के जीवत रहते स्टूडेंट कर रहे हैं इन पर पीएचडी, जानें क्या है खूबी

Dainik Bhaskar

Oct 16, 2016, 04:33 PM IST
इस संत के जीवत रहते स्टूडेंट कर रहे हैं इन पर पीएचडी, जानें क्या है खूबी
भोपाल। जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर जी के 71 वें जन्मोत्सव के अवसर पर रविवार को शहर में कई जगहों पर विशेष आयोजन किए गए। इस मौके पर सैकड़ों की संख्या में भक्त उनका आशीर्वाद लेने के लिए भोपाल पहुंचे थे।
22 साल की उम्र में संन्यास लेकर दुनिया को सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले आचार्यश्री विद्यासागर महाराज की एक झलक पाने लाखों लोग मीलों पैदल दौड़ पड़ते हैं। उनके प्रवचनों में धार्मिक व्याख्यान कम और ऐसे सूत्र ज्यादा होते हैं जो किसी भी व्यक्ति के जीवन को सफल बना सकते हैं। वे अकेले ऐसे संत है जिनके जीवत रहते हुए उन पर अब तक 55 पीएचडी हो चुकी हैं।

ये है उनका जीवन वृत्त..
हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला, कन्नड़, मराठी आदि भाषाओं के जानकार विद्यासागरजी का बचपन भी आम बच्चों की तरह बीता। गिल्ली-डंडा, शतरंज आदि खेलना, चित्रकारी स्वीमिंग आदि का इन्हें भी बहुत शौक रहा। लेकिन जैसे-जैसे बड़े हुए आचार्यश्री का आध्यात्म की ओर रुझान बढ़ता गया। आचार्यश्री का बाल्यकाल का नाम विद्याधर था। कर्नाटक, बेलगांव के ग्राम सदलगा में 10 अक्टूबर 1946 को जन्मे आचार्यश्री ने कन्नड़ के माध्यम से हाई स्कूल तक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे वैराग्य की दिशा में आगे बढ़े और 30 जून 1968 को मुनि दीक्षा ली। आचार्य का पद उन्हें 22 नवंबर 1972 को मिला।

शोध के लिए छात्र पढ़ते हैं मूक माटी
जैन दर्शन पर कई पुस्तकें लिखने के साथ ही वे कविता लेखन भी करते रहे। उन्होंने माटी को अपने महाकाव्य का विषय बनाया और मूक माटी नाम से एक खंडकाव्य की रचना की। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित उनकी यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। विचारकों ने इसे एक दार्शनिक संत की आत्मा का संगीत कहा। इससे कई छात्र अपने शोध के लिए बतौर संदर्भ इसे उपयोग में ला रहे हैं। उनकी अन्य रचनाएं नर्मदा का नरम कंकर, डूबो मत लगाओ डुबकी आदि हैं।
-आचार्य विद्यासागर संस्कृत सहित हिन्दी, मराठी और कन्नड़ सहित अन्य भाषाओं का भी ज्ञान रखते हैं।
-गांव के स्कूल में मातृभाषा कन्नड़ में उन्होंने पढ़ाई शुरू की और कक्षा नवमी तक की शिक्षा प्राप्त की।
-गणित के सूत्र हो या भूगोल के नक्शे विद्यासागर पलभर में सबकुछ याद कर लिया करते थे।
-बचपन में विद्यासागर शतरंज और गिल्ली-डंडा खेलना पसंद करते थे। इसके साथ ही उन्हें शिक्षाप्रद फिल्में देखना व मंदिर जाना भी बेहद पसंद था।
-विद्यासागर 20 वर्ष की उम्र में आचार्य देशभूषण महाराज से मिलने जयपुर पहुंचे थे।
- 22 वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने साधारण से दिखने वाले विद्यासागर को संत होने की दीक्षा दी।
- सैकड़ों शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है।
-उनके कार्य में निरंजना शतक, भावना शतक, परिषद जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक शामिल हैं।
चातुर्मास के लिए भोपाल पहुंचे आचार्य श्री के सूत्र वाक्य और उनकी दुर्लभ फोटो आगे देखिए...
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