खंडवा जेल जहां से सिमी के आतंकी भागे थे।
इंदौर. यूपी के बिजनौर में 12 सितंबर को एक घर में हुए बम विस्फोट में 1 अक्टूबर 2013 को खंडवा जेल से भागे सिमी के फरार आतंकियों की शिनाख्त हुई है। विस्फोट के बाद यूपी एटीएस और आईबी की टीम सक्रिय हो गई। जांच के दौरान आतंकियों से कमरे से मिले आईडी व सीसीटीवी फुटेज से आरोपियों की शिनाख्त खंडवा जेल से भागे आतंकी एजाजुद्दीन, असलम अय्यूब, जाकिर बदरुल, अमजद रमजान, मेहबूब और सलीक के रूप में हुई है। बिजनौर एसपी सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कमरे से मिली आईडी के आधार पर हुई जांच में यह स्पष्ट है कि आरोपी खंडवा जेल से फरार सिमी के आतंकी हैं। वह यूपी में बड़ा बम धमाका करने की तैयारी में थे।
( 1 अक्टूबर 2013 को खंड़वा जेल से छह आतंकियों के भागने की सच्चाई खंडवा जेल के एक अफसर ने भास्कर से साझा की थी। इसमें सिमी आतंकियों का जेल में किस कदर खौफ था, उनके आगे जेल सुपरिटेंडेंट तक कैसे नतमस्तक हो गए थे, इसकी हकीकत उजागर हुई। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ संशोधित अंश -)
खंडवा जेल की स्थिति बाहर से जितनी खराब है, उससे बदतर अंदर की है। दीवारें मिट्टी की तरह, हाथ मारो तो टूट जाए। हमने जेल डीजी को कई बार पत्र लिखे कि ये जेल सिमी आतंकियों को रखने के लिए नहीं है। खुफिया एजेंसियों को भी यह बात पता थी कि सिमी आतंकी खंडवा जेल से आसानी से भाग सकते हैं। उनके लिए यह सबसे आराम की जगह थी। वे यहां जैसा चाहते वैसा कर लेते थे। जेल से भागने की प्लानिंग आज-कल में नहीं बनी होगी, इसके लिए फुलप्रूफ प्लानिंग की होगी। इसमें अधिकारियों की बड़ी लापरवाही है। तत्कालीन जेल अधीक्षक को नए जेल अधीक्षक के आने तक रीलिव होना नहीं था। जेल में लापरवाही का यह आलम डेढ़ साल से चल रहा था। सिमी के आतंकी जेल अधीक्षक से खुश थे। अधीक्षक सिमी के लोगों से डरते थे। कुछ समय पहले एक सिपाही ने सिमी आतंकी को चांटा मार दिया था। तब अधीक्षक ने सिपाही से कहा था जाओ उससे माफी मांगो, हालांकि सिपाही ने ऐसा नहीं किया।
अधीक्षक को दबा लिया था : सिमी आतंकियों की यहां हिम्मत खुल गई थी। हमारे यहां उन्होंने जेल अधीक्षक को दबा लिया था। फिर बाकी की क्या मजाल जो उनसे पंगा लेता। जेल में कहीं भी घूमना-फिरना आम हो गया था। सिपाहियों व कैदियों से भी बदतमीजी करते थे। इनकी हरकतों से ही लगता था कि ये लोग खंडवा जेल में ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएंगे। इंदौर, भोपाल और जबलपुर की सेंट्रल जेल से पेशी के लिए ये लोग खंडवा आते थे। पहले दो-चार दिन जेल में रहने के बाद चले जाते थे। लेकिन इस बार ज्यादा दिन रुक गए। एक ही बैरक में रुके हुए थे, इसलिए इस बार प्लानिंग में सफल हो गए। खंडवा से शिफ्ट करने के लिए जेल डीजी को कई बार पत्र लिखा।
आते ही दो नंबर बैरक खाली हो जाता था : खंडवा जेल में सिमी आतंकियों के आते ही दो नंबर बैरक खाली करा ली जाती थी। खाना बनते समय अलग से निकाल लेते थे, इसमें मसाला अलग से डालते थे। अपने बैरक से निकलकर मेन गेट तक आ जाते थे, इन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। जेल में चार गेट हैं। तीसरे गेट तक कोई भी आ जा सकता है, लेकिन चार नंबर गेट (रेड गेट) पर बगैर अनुमति के कोई आ नहीं सकता। सिमी वालों को कोई रोके तो उन्हें नागवार लगता था, उससे नाराज हो जाते थे। जेल में किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे। इनसे मिलने के लिए इनके घर की महिलाएं मुलाकात के समय आती थीं। कई बार तो उनकी मुलाकात गेट के अंदर करवाई गई।
डीजी ने कहा था इतनी बड़ी लापरवाही हुई या तुम लोगों ने भगाया : बैरक में रखे टीवी के प्लेटफार्म के नीचे लगी लोहे की रॉड निकालकर आसानी से दीवार तोड़ दी। आधा घंटा भी नहीं लगा होगा। दीवार की हाइट 15 फीट है। हमने छह आदमियों को लेकर एक पिरामिड बनाया, सिपाही ४० सेकंड में चढ़ गए। डीजी आए तब हमने रिटेक कर दिखाया। डीजी का एक ही सवाल था इतनी बड़ी लापरवाही हो गई या तुम लोगों ने भगाया है। दो घंटे तक किसी को पता नहीं चला कि सिमी के आतंकवादी भाग गए। हमने डीजी के सामने ४० मिनट का क्राइम सीन करके दिखाया।
आतंकियों के भागने के समय कैदी जाग रहे थे पर किसी कि मजाल कि कोई हरकत करता : भागने की घटना के समय बैरक के कैदी जाग रहे थे, किसी की मजाल जो चिल्ला देता। मरना था क्या, ये मार देते हमें कैदियों ने ऐसा कहा, उनका टेरर था। घटना के समय बैरक में 47 कैदी थे। आबिद ही मास्टमाइंड है। रात दो बजे तक ड्यूटी पर जो सिपाही था, वह तेज था। उन्होंने देख लिया था कि इसकी ड्यूटी बदलने के बाद ही मूवमेंट करेंगे। दो बजे के बाद दूसरा सिपाही आया जो आलसी था। पहले देखा और फिर काम दिखा दिया। सिपाही की ड्यूटी दो से छह बजे तक की थी। वह एक जगह जाकर बैठ गया। आबिद की निगरानी में सारा काम हुआ। सिपाही को आवाज नहीं आई, मुश्किल से 40 मिनट के अंदर दीवार गिरा दी होगी। दीवार गिराने के लिए ताकत की जरूरत नहीं लग रही थी। आबिद ने सिमी से जुडऩे की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन उसे केवल इस प्लान में शामिल किया, चूंकि उन्हें पता था कि यह ज्यादा काम का नहीं है। उसे ले जाने की कोशिश भी की, लेकिन कामयाब नहीं हुए।
(इनपुट : सदाकत पठान)
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