(गारबेज, जिससे गैस बनाई जाएगी।)
इंदौर. सीवरेज वाटर और कचरे कर प्रोसेसिंग से गैस बनाने और इसे उपयोग करने की कोशिशें पहले भले ही अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी हों, लेकिन पहली बार किचन गारबेज (बचा हुआ खाना) से मीथेन गैस बनाने की शुरुआत रंग ला रही है। इस प्रक्रिया में बचा हुआ खाना अब खाना पकाने के काम में लिया जाएगा। आईपीएस एकेडमी ने शहर में पहली बार किचन गारबेज से गैस बनाने का संयत्र लगाया है और इसकी सफलता के बाद 15 स्कूलों में इसे अपनाया जाएगा। पचास किलोग्राम क्षमता वाली इस मशीन से अगले पांच दिनों में रोजाना 9 किलो गैस बनना शुरू हो जाएगी।
रेबोबिन से दोबारा उपयोग हो सकेगा बचा हुआ खाना : नागपुर के हेमंत अठलावकर और विनोद वर्मा ने दो साल की मेहनत के बाद यह मशीन बनाई है। पहले बनाई गई मशीन बड़ी थी, जिसमें हर तरह का कचरा प्रोसेस कर कई तरह की चीजें बनाई जा सकती थीं, लेकिन मशीन यह बड़ी और महंगी होने से इसका उपयोग छोटे स्तर पर नहीं किया जा सकता था। इसके बाद उन्होंने वापस रिसर्च कर छोटी और सिर्फ किचन गारबेज को प्रोसेस करने वाली मशीन बनाई। चूंकि यह मशीन सिर्फ किचन गारबेज से गैस बनाने के काम आती है, इसलिए इसका नाम रेवोशनली डस्ट बिन रखा और इसे छोटा कर रेबोबिन नाम दिया गया। 50 से 500 किलोग्राम क्षमता वाली मशीन में रोज का बचा हुआ खाना डालना होता है। शुरुआत में मशीन पूरी भरने के 15 दिन बाद मीथेन गैस बनना शुरू होती है। इसके बाद रोजाना गैस उत्पादन किया जा सकता है। इससे बनी गैस को किचन में ही खाना बनाने, जनरेटर चलाने, गीजर चलाने इत्यादि के उपयोग में लिया जा सकता है।
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