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फिल्म वीर में पिंडारियों की कहानी थी सच, ४०० साल पहले यहां रहते थे पिंडारी

Dainik Bhaskar

Sep 24, 2014, 02:16 PM IST

फिल्म वीर में पिंडारियों की कहानी थी सच, ४०० साल पहले यहां रहते थे पिंडारी

फिल्म वीर में पिंडारियों की कहानी थी सच, ४०० साल पहले यहां रहते थे पिंडारी
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कुशलगढ़ किले का मुख्य प्रवेश द्वार, पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित स्मारक की श्रेणी में रखा है।
वर्ल्ड हेरिटेज वीक के मौके पर भास्कर डॉट कॉम आपको बता रहा है इंदौर से 50 किलोमीटर दूर कुशलगढ़ के बारे में...

इंदौर। सलमान खान की फिल्म वीर में हमने पिंडारियों का नाम सुना था। फिल्म में बताया गया था कि पिंडारी काफी शक्तिशाली होते हैं और अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं। कुछ इसी प्रकार की कहानी शहर से 50 किलोमीटर दूर स्थित कुशलगढ़ दुर्ग की भी है। यहां भी पिंडारियों का राज था। कुशलगढ़ का दुर्ग शहर से करीब 50 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
पुरातत्व विभाग के पास कुशलगढ़ दुर्ग के निर्माण को लेकर जो दस्तावेज मौजूद हैं, उनसे पता चलता है कि यह किला और गांव स्थानीय जागीरदार कुशलसिंह राजपूत द्वारा 16वीं शताब्दी में बनवाया गया था। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम कुशलगढ़ पड़ा।
1730 के आसपास पिंडारियों (लुटेरे योद्धाओं का एक प्रमुख समूह) ने इस पर कब्जा कर लिया था। वे यहां रहते थे और यहां से गुजरने वाले लोगों को लूटा करते थे। 1766 में होलकर राज की बागडोर अहिल्याबाई ने संभाली। इसके बाद उन्होंने पिंडारियों से समझौता किया और किले को जेल का रूप दिया गया, जहां राज द्रोहियों को रखा जाता था। पिंडारियों को यहां से लगी होलकर राज की सीमाओं की रक्षा का जिम्मा दिया गया और लूटने के बजाए यहां से गुजरने वाले लोगों से राज्य की ओर से चुंगी वसूलने का अधिकार भी दिया गया, जिसका एक हिस्सा वे राज्य को भी देते थे।

पर्यटन के रूप में हो रहा विकसित : कुशलगढ़ का दुर्ग अब पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके लिए पुरातत्व विभाग इसे मूल रूप में लाने का प्रयास कर रहा है। साथ ही, पर्यटन स्थल बनाने के लिए वन विभाग और पर्यटन विकास निगम की सहायता लेने की भी योजना बनी है। जागीरदारों द्वारा बनाया गया यह किला कभी पिंडारियों के कब्जे में रहा तो कभी होलकर राज में राज द्रोहियों की जेल के रूप में भी उपयोग किया जाता रहा है।

हरियाली से भरी है राह : महू से करीब 25 किलोमीटर दूर घने जंगलों की बीच बसे कुशलगढ़ गांव की एक पहाड़ी पर स्थित करीब 400 साल पुराना यह किला जिले का एक मात्र शहर के बाहर स्थित संरक्षित स्मारक है। इसके अलावा चार अन्य स्मारक जिसमें राजबाड़ा, लालबाग और छत्रियां शामिल हैं जो शहर में ही स्थित हैं।
पुरातत्व विभाग ने इस 8 एकड़ में फैले किले को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कुछ समय पूर्व शासन को 50 लाख रुपए से विकास कार्य का प्रस्ताव भेजा है, जिसमें जर्जर हालत में खड़े इस किले के सुधार के साथ ही इसे मूल रूप में लाने और यहां पौधारोपण सहित अन्य विकास कार्य कराए जाने की योजना है।

इंदौर के पहले सम्राट को यहां बंद किया था : पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ मार्गदर्शक प्रकाश परांजपे ने बताया कि दस्तावेजों में उल्लेख है कि 1794 में अहिल्याबाई ने तुकोजीराव प्रथम के पुत्र मल्हार राव को विद्रोह करने पर यहां तीन माह बंदी बनाकर रखा था। इसके साथ ही इंदौर के प्रथम सम्राट कहलाने वाले यशवंतराव प्रथम के 1801 में सम्राट बनने से पूर्व भी उन्हें बंदी बनाकर रखा गया था। वे यहां से भाग निकले थे और अपने बल और साहस से राजा बने थे।

रास्ता भी रोमांच से कम नहीं : इंदौर से इस किले का रास्ता भी किसी रोमांच से कम नहीं है। महू से कोदरिया और मलेंडी होते हुए मांगलिया गांव से होते हुए कुशलगढ़ जाना होता है। मलेंडी के बाद घने जंगल और कच्चे रास्ते के बीच कई झरने, तालाब और छोटी नदियां और चारों और घने जंगल प्राकृतिक सौंदर्य से भरे हैं।
आगे की स्लाइड पर क्लिक कर केवल तस्वीरों में देखिए कुशलगढ़ किले की खूबसूरती ...

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