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पांच याचिकाएं बनी है निगम चुनाव में बाधा, कैसे निपटेगा निगम और प्रशासन

7 वर्ष पहले
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सांकेतिक फोटो।
 
इंदौर. नगर निगम चुनाव के लिए शुक्रवार को होने वाला वार्ड आरक्षण टल चुका है अब यह 22 दिसंबर को होगा। साफ है नगर निगम चुनाव कब होंगे या फिर आगे बढ़ेंगे इसे लेकर संशय बरकरार है। प्रशासन व निगम के सामने चुनौतियां कम नहीं है। नगर निगम परिसीमन के बाद पंचायत चुनाव के लिए इन्हीं 29 गांवों को डि-नोटिफाई करने पर भी याचिकाकर्ता अनिल त्रिवेदी ने याचिका लगाई है, जिसका जवाब चार सप्ताह में देना है। नगर निगम अभी यह जवाब भी अभी तय नहीं करवा पा रहा है। प्रशासन की मुश्किल यह है कि गांवों को पंचायत चुनाव से बाहर करने की वहीं प्रक्रिया अपनाई जो उसने निगम चुनाव में की थी।  त्रिवेदी के अलावा तीन और याचिकाएं कोर्ट में है, जिसमें किशोर कोडवानी की याचिका भी जटिल है। कोर्ट ने इसे अभी निर्णय के लिए छोड़ रखा है।
 
निगम को डर यह है कि 29 गांवों को ही शामिल करने का तर्क ही नहीं दे पाए तो इस याचिका पर भी पीटना तय है। एक अन्य याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता चंपालाल यादव की है, जिसमें समय पर चुनाव करवाने की बात कहीं गई है। इधर सरकार और निगम सुप्रीम कोर्ट जरूर जा चुके है। अफसर भी दबी जुबां से स्वीकारते है कि अब निगम चुनाव का पूरा दारोमदार सुप्रीम कोर्ट पर टिका है। वहां से स्टे मिलता है तो ही चुनाव संभव होंगे। इसी संभावना को देखते हुए फिलहाल वार्ड आरक्षण को टाला है ताकि एक बार फिर प्रशासनिक अफसरों की किरकिरी न हो।  

 1. याचिका- एडवोकेट अनिल त्रिवेदी (तीसरी बार लगाई याचिका)  
 आधार- शासन ने धारा 405(1) का प्रारंभिक नोटिफिकेशन भी गलत जारी किया। इसके पहले धारा 7(2) की कार्रवाई करना थी। इसमें पंचायतों को डी-नोटिफाई करना, ग्राम सभा से अनुमोदन लेना सहित कई गतिविधियां करना थी। धारा 405(3) का फाइनल नोटिफिकेशन भी गलत है। इस तरह पूरी प्रक्रिया ही अवैध है।  

 मायने- इस याचिका का निराकरण होने से पहले नगर निगम चुनाव हो गए और उसके बाद हाई कोर्ट त्रिवेदी के पक्ष में फैसला दे देगी तो निगम के साथ चुनाव से बाहर किए गए 29 गांवों में भी संवैधानिक संकट आ जाएगा। कोर्ट इस नोटिफिकेशन को भी रद्द करता है तो चुनौती और बढ़ जाएगी।  

 2. याचिका- वरिष्ठ अधिवक्ता चंपालाल यादव, मनीष यादव  
 आधार- 74 वे संविधान संशोधन में यह व्यवस्था कर दी गई है कि नगर निगम में महापौर परिषद एक दिन के लिए भी निरंक नहीं रह सकती। जब तक प्राकृतिक आपदा ना हो, पूरी परिषद को भ्रष्टाचार में भंग ना कर दिया गया हो तब तक प्रशासक की नियुक्ति नहीं की जा सकती। चुनाव हर हाल में 10 जनवरी से पहले करवाना ही होंगे।  

 मायने-  शासन को हर हाल में हाई कोर्ट में चुनाव कार्यक्रम बताना होगा। याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला आया तो 10 जनवरी से पहले चुनाव करवाने की बाध्यता बढ़ जाएगी।  

 3. याचिका- सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी  
 आधार- मास्टर प्लान 2021 में पूरे 90 गांव शामिल करने की व्यवस्था की गई है। केवल 29 गांव शामिल करने से विकास अव्यवस्थित होगा। शासन ने सर्वे या बिना किसी ठोस आधार के इन गांवों को शामिल किया, इसलिए सभी 90 गांव को शामिल किया जाए।  

 मायने- इस याचिका पर अब 2 जनवरी को सुनवाई होना है। चुनाव होने के बाद अगर याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला आया। कोर्ट ने निगम को पूरे 90 गांव शामिल करने का कह दिया तो संवैधानिक संकट रहेगा। शेष गांव निगम दायरे में शामिल नहीं होंगे, यहां क्या और कैसे प्लानिंग की जाएगी तय करना मुश्किल होगा?   

 4. याचिका- कांग्रेस नेता केवल यादव   
 आधार- संविधान में पंचायत व नगरीय निकाय के लिए नियम समान है। यदि पंचायत की सीमा कम-ज्यादा की जाती है तो नोटिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी अपनाई जानी चाहिए। संदर्भ 2004 में शामिल किए गए टिगरिया बादशाह गांव का है, जहां याचिका लगने पर शासन ने पूरी प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा है।  

 मायने- अन्य याचिकाओं की तरह कोर्ट ने इसे पर भी गौर किया तो निगम और प्रशासन की कार्रवाई या निगम चुनाव पर असर हो सकता है।  

 (नोटिफिकेशन की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए एक अन्य याचिका छोटा बांगड़दा के धनसिंह ने भी लगाई है)