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न जलवायु बेहतर, न मिट्टी फिर भी आठ साल में उगाया सागवान का जंगल

7 वर्ष पहले
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गरोठ के किसान महेंद्र पिता सुरेशचंद्र अग्रवाल
इंदौर, गरोठ। जलवायु मिट्टी उपयुक्त नहीं होने के बावजूद उन्होंने खेत में 200 से अधिक सागवान के पौधे सहेज रखे हैं। अाठ साल से इन पौधों पर मेहनत की जा रही है।
यह किसान हैं गरोठ के महेंद्र पिता सुरेशचंद्र अग्रवाल। इनके शामगढ़ रोड स्थित दो बीघे खेत में दो सौ से अधिक सागवान के पेड़ इनकी मेहनत की कहानी बता रहे हैं। हालांकि अभी और करीब 20 साल ये पेड़ इमारती लकड़ी के काम नहीं आ सकते बावजूद इसके उन्होंने इनको सहेजा और बड़ा कर मिसाल कायम की। महेंद्र कहते हैं बारिश के अलावा यदि जरूरत पड़ती है तो सिंचाई करते हैं।

इसलिए महत्वपूर्ण है सागवान
सागवान की लकड़ी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं श्रेष्ठ इमारती लकड़ी है। यह मजबूत एवं टिकाऊ होती है। दिन पर दिन इसकी चमक बढ़ती है। साथ ही दीमक से यह प्रभावित नहीं होती। यही कारण है कि यह सबसे अधिक महंगी है।

सिंचाई की जरूरत ज्यादा
सागवान के लिए उपयुक्त जलवायु नहीं होने के कारण किसान इससे कतराते हैं। सागवान के पौधे को पेड़ बनने में 30 से 40 साल लग जाते हैं। इसके चलते किसान सागवान की ओर उदासीन रहते हैं। बहरहाल यदि इस पर मेहनत कर ली जाए तो यह काफी फायदे की खेती साबित हो सकती है। कृषि एवं वन विभाग के अधिकारियों की माने तो भले ही यहां की जलवायु इस लायक नहीं हो लेकिन समय-समय पर सिंचाई कर ली जाए तो उत्पादन किया जा सकता है।

पानी वाले क्षेत्रों में लगाएं
पानी वाले क्षेत्रों में किसान सागवान के पौधे लगा सकते हैं। हालांकि यहां की मिट्टी और जलवायु सागवान के पेड़ों के लायक नहीं है। फिर भी प्रयास करने पर किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं।
दिनेश कुमार भाना, वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी

वन विभाग ने भी लगाए
यहां की जलवायु उपयुक्त नहीं होने के कारण सागवान की ग्रोथ बहुत धीमी है। वन विभाग ने यहां पौधे लगाए हैं। इसके अलावा कुछ किसानों ने भी सागवान के पौधे लगा रखे हैं।
प्रतापलाल गेहलोद, डिप्टी रेंजर, वन विभाग
फैक्ट फाइल
सागवान के पौधे को पेड़ बनने में 30 से 40 साल लगते हैं।
वर्तमान भाव करीब1000 से 1200 रु. घन फीट
शामगढ़ रोड पर महेंद्र अग्रवाल के खेत पर लगे सागवान के पेड़।
आगे की स्लाइड पर क्लिक कर सिर्फ तस्वीरों में देखिए कैसा है दो बीघा में फैला सागवान का जंगल.....