ये कहानी है इंदौर की सेन्ट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे 24 वर्षीय वर्षीय कैदी अरमान की. बचपन से ही अरमान के मन में पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनने का अरमान था. माता पिता की गरीबी के कारण वह कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देख पाया था। हालात ने उसे 19 साल की उम्र में जेल की यात्रा करवा दी और अब जेल ने किताबों से उसका रिश्ता जोड़ दिया. अरमान ने जेल में चल रहे स्कूल से पढऩा-लिखना सीखा. अभी वो इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी इग्नू से बीपीपी की परीक्षा दे रहा है, जो बारहवीं के बराबर होती है. वो आगे चलकर खूब पढाई करना चाहता है और जेल से निकलकर बड़ा वकील बनाना चाहता है.
कौन है अरमान
बिहार के धीरम पट्टी शरीफ के रहने वाले अरमान के माता-पिता गांव में सब्जी का ठेला लगाते थे. अरमान के कुल 8 भाई बहन हैं. उसके पिता के लिए इनका पेट पालना ही मुश्किल था, पढ़ाना –लिखाना तो दूर की बात है. अरमान जब भी अपने गांव में किसी बच्चे को स्कूल जाते देखता था तो उसका दिल भी पढऩे के लिए मचलता था, मगर थोड़ा बड़ा होते ही उसके पिता ने काम पर लगा दिया और तकदीर उसे इंदौर और फिर जेल में ले आई.
कैसे पहुंचा जेल
इंदौर में अरमान अपने गांव के कुछ लड़कों के साथ एक कमरे में रहकर साडिय़ों पर एंब्रायडरी का काम करता था. एक दिन उसका अपने दोस्त से झगड़ा हो गया, गुस्से में आकर उसने कैंची से हमला कर दिया. इस मारपीट में दोस्त की मौत हो गयी. उस समय अरमान की उम्र सिर्फ 19 साल थी. कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा दी. तब से वो जेल में है. सेन्ट्रल जेल के अधीक्षक गोपाल ताम्रकर बताते हैं कि अरमान ने जब यहां पर कैदियों को पढ़ते देखा तो उसने भी पढऩे की इच्छा ज़ाहिर की. उस समय वो निरक्षर था, अक्षरों की पहचान नहीं थी. यहीं उसने अक्षरों को पहचाना और अब तो वो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस करता रहा। अब वह अच्छी तरह से अंग्रेजी बोलने लगा है। अरमान को अभी कई वर्ष जेल में ही बिताना है। ताम्रकार के मुताबिक उसकी लगन देखकर लगता है कि वो जब जेल से निकलेगा तब तक उसके हाथ में खूब सारी डिग्रियां होंगी.
जेल में चलता है स्कूल, कैदी हैं टीचर
अरमान को मिलाकर इस समय सेन्ट्रल जेल में लगभग 800 कैदी पढ़ाई कर रहे हैं. इन्हें पढ़़ाने की जवाबदारी जेल में ही बंद पढ़े-लिखे कैदियों को दी गई है. रोज दो घंटे चलने वाली क्लास में ये टीचर इन कैदियों को पढ़ाते हैं. बाद में अपनी बैरक में कैदी अभ्यास भी करते हैं. फिलहाल लगभग 250 कैदी बीपीपी की परीक्षा दे रहे हैं।
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