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ये है इंदौर के विजनरी संस्थापक, ३०० साल पहले बसाया शहर, बनाया था टैक्स फ्री जोन

Dainik Bhaskar

Nov 03, 2015, 10:57 AM IST

ये है इंदौर के विजनरी संस्थापक, ३०० साल पहले बसाया शहर, बनाया था टैक्स फ्री जोन

ये है इंदौर के विजनरी संस्थापक, ३०० साल पहले बसाया शहर, बनाया था टैक्स फ्री जोन
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इंदौर। इंदौर आज ना सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि पूरे मध्य भारत में व्यापार और उद्योग का एक बड़ा केंद्र है लेकिन ये जानकर आपको  हैरानी होगी कि इंदौर आज से ही नहीं लगभग तीन सौ साल पहले से ही व्यापार का बड़ा केंद्र रहा है। इसकी शुरुआत इंदौर के तत्कालीन मनसबदार नन्दलाल मंडलोई ने की थी।
 
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार इंदौर के वास्तविक संस्थापक राव राजा नंदलाल मंडलोई ही थे।  3 नवंबर को राव नन्दलाल मंडलोई की 284वीं पुण्यतिथि है।  dainikbhaskar.com आपको बता रहा है इंदौर की इस  ऐतिहासिक शख्सियत के जीवन से जुड़े कुछ रोचक पहलू।

 300 साल पहले बनाया था टैक्स फ्री जोन
 आज देश-विदेश की सरकार अपने यहां व्यापार और उद्योग धंधों को बढ़ावा देने के लिए टैक्स फ्री कॉरीडोर, एसइजेड  और टैक्स हॉलीडे की बात कर रही है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि इंदौर के एक विजनरी शख्स ने आज से तीन सौ साल पहले इसकी शुरुआत कर दी थी।  ये शख्स थे राव राजा चौधरी नन्दलाल मंडलोई।
 
उनके वंशज श्रीकांत जमींदार अपने पास उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर बताते हैं कि नन्दलाल चौधरी ने सन 1716 में तत्कालीन मुगल बादशाह को एक पत्र लिखकर ये मांग की थी कि  मालवा के इंदौर और उज्जैन सूबे में  नन्दलालपुरा के नाम से बसाए गए नए बाजार में व्यापार करने वालों से कोई कर या शुल्क  नहीं लिया जाए।  उनकी इस मांग को तत्कालीन मुगल बादशाह ने स्वीकार कर फरमान जारी किया था।  ये उस समय का पहला टैक्स फ्री जोन था।   उनके इस विजनरी कदम से इंदौर में व्यापार भी बढ़ा और बसाहट भी बढ़ी।

 इंदौर के संस्थापक और पहले शासक थे राव नन्दलाल चौधरी
 राव नन्दलाल चौधरी को सन 1700 के आसपास तत्कालीन मुगल बादशाह के वजीर सैयद अब्दुल्ला खान ने एक परवाना लिखकर कम्पेल और इंदौर की मनसबदारी दी थी।  इसके पहले इस इलाके की मनसबदारी उनके पूर्वज के पास ही थी।  इस दस्तावेज के आधार पर ये साबित होता है कि इंदौर के पहले शासक राव नन्दलाल थे।  
 
बाद  में पेशवाओं ने अपने सूबेदार मल्हाराव होलकर की मदद लेकर रावराजा नंदलाल मंडलोई से मित्रता कर ली। पुरातत्व विभाग में उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक 1732 में मल्हारराव होलकर को इंदौर की जागीरदारी सौंपी गई, लेकिन तब भी शासक रावराज नंदलाल मंडलोई ही थे।
 राव से हुए रावला 
 रावला मंडलोई परिवार के निवास को गढ़ी कहा जाता था, इसे महल कचहरी भी कहते थे। होलकरों को जागीरदारी देने के पहले यहां राव चौधरी नन्दलाल का दरबार लगता था। किले नुमा यह गढ़ी एक ऊंचे टीले पर बसाई गई है।   इसका प्रवेश द्वारा दो मंजिला है।   गढ़ी में बेसाल्ट पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसके चारों कोनों पर बुर्ज सुरक्षा मोर्चे हैं। यह मंडलोई परिवार के निवास के लिए हुआ करता था जिसमें महल के साथ ही घुडसाल, हाथीखाने वगैरह बने हुए थे।
  
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