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राजनीति अब \'गंदा धंधा\' जैसा नहीं लगता!

6 वर्ष पहले
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ज़ुबैर अहमद

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

पिछले हफ़्ते फ़िल्म अभिनेत्री गुल पनाग दिल्ली में आम आदमी पार्टी के लिए दक्षिण दिल्ली के एक भीड़भाड़ वाले इलाक़े में मोटर साइकिल पर प्रचार कर रही थीं.

वह मुझे इंटरव्यू देने के लिए ठहर गईं. पनाग मिलनसार लग रही थीं, साफ़ बोलने वाली थीं और उनमें उत्साह था. लोगों की प्रतिक्रिया से लबरेज़ गुल पनाग ने कुछ संकोच के साथ लगभग चहकते हुए कहा, \"लोगों ने मुझे \'नेता\' तक कहा.\"

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उनकी प्रतिक्रिया दिलचस्प थी. शायद उनकी झेंप की वजह भारतीय समाज में एक \'नेता\' की छवि थी जो अक्सर कुर्ता पहनता है, भ्रष्ट और चालाक है और जिसे हिंदी फ़िल्मों में उपहास के पात्र के तौर पर दिखाया जाता है.

पढ़ें विस्तार से

जिस तरह से भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल रही है, उसी तरह से इसके लोग भी बदल रहे हैं. गुल पनाग इस बदलाव की सजीव उदाहरण हैं. पिछले साल उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर को हाशिये पर रख कर राजनीति की कहीं मुश्किल दुनिया में क़दम रखा.

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पिछले लोकसभा चुनाव में वह चंडीगढ़ से चुनाव हार गईं लेकिन उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी. गुल पनाग भारत की उस नई नस्ल का हिस्सा हैं जो राजनीति की कथित गंदी दुनिया में अपनी जगह तलाश रही हैं.

हक़ीकत में देखें तो आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल और उनके साथी भी भारतीय राजनीति के नए चेहरे हैं. राजनीति में अब तक उम्र गुज़ार देने वाले चेहरों की भीड़ में ये नए लोग ताज़ा हवा के झोंके की तरह लगते हैं.

मध्य वर्ग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी टेक्नॉलॉजी, कारोबार, नौकरशाही और धार्मिक उपदेश देने वालों की दुनिया से कई चेहरों के लिए सत्ता के गलियारे में जगह बनाई है.

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इन नए नामवर चेहरों के अलावा हज़ारों पढ़े लिखे और कामयाब पुरुष और महिलाएं पर्दे के पीछे रह कर बीजेपी और \'आप\' जैसी राजनीतिक पार्टियों के लिए काम कर रही हैं. इनमें दुनिया के दूसरे हिस्सों में रह रहे प्रभावशाली भारतीय भी हैं.

एक वक़्त ऐसा भी था जब भारत में राजनीति को एक \'गंदा\' शब्द माना जाता था. मध्य वर्ग के भारतीय माता-पिता चाहते थे कि उनके बच्चे नौकरशाही, कारोबार और फ़िल्मों में करियर बनाएं.

नई नस्ल

लेकिन अब गुल पनाग की तरह नौजवान लड़के-लड़कियां अपने कामयाब करियर को छोड़कर राजनीति की दुनिया में आ रही हैं. आशुतोष और शाज़िया इल्मी ने टेलीविज़न पत्रकारिता की दुनिया में नाम कमाया है.

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वे राजनीति में बड़ी सहजता के साथ आ गए. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी कत्थक की एक लोकप्रिया नृत्यांगना हैं. आज वह राजनीति में अपनी पारी को लेकर बेहद उत्साहित हैं और कहती हैं, \"राजनीति मेरे डीएनए में है.\"

भारतीय राजनीति का ये युवा चेहरा नेहरू के ज़माने से हटकर है. तब विचारधारा और लोगों की सेवा की चाह रखने वाले लोग राजनीति में आया करते थे.

दिल्ली में सरकार

कहा जाता है कि राजनीति में आने का यह दोहरा मक़सद आज भी मौजूद है लेकिन अब जो लोग आ रहे हैं, वे समाज में बदलाव लाने की बात करते हैं, इसकी गंदगी साफ़ करना चाहते हैं और राजनीति को समाज के आख़िरी तबक़े के क़रीब लाना चाहते हैं.

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इसे समझने के लिए अरविंद केजरीवाल का उदाहरण लिया जा सकता है. पिछले साल हमने देखा कि दिल्ली में सरकार बनाने की इजाज़त लेने के लिए वह लोगों के बीच गए. हमने देखा कि वह कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले किस तरह से आम लोगों से बेहिचक मशविरा करते हैं.

कांग्रेस ने दशकों तक जिस तरह से भाई भतीजावाद और सत्ता के आसपास रहने वाले लोगों के हितों का संरक्षण करने वाली व्यवस्था खड़ी की उससे राजनीति में बदलाव लाने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस की जाने लगी.

मंडल की राजनीति

ये देश इस तरह की राजनीति से थक चुका था. आज़ादी के बाद के भारत में दो बड़ी घटनाओं को राजनीति में बदलाव की शुरुआत माना जाता है. पहली घटना थी मंडल आयोग की सिफ़ारिशों का लागू किया जाना.

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1989-90 में जब मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने लागू करने की कोशिश की थी तो देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे.

नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने जब इसे लागू कर दिया तो ख़ास कर पिछड़ी जातियों से उभरने वाले नए नेतृत्व को हमने देखा.

सोशल मीडिया

दूसरी बड़ी घटना थी, साल 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक उदारीकरण. तेज़ी से हो रहे आर्थिक विकास ने मध्य वर्ग में एक नया, आत्मविश्वास से भरा और प्रभावशाली तबक़ा उभरा जो राजनीति में दख़ल चाहता था.

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आज की भारतीय राजनीति के कई ऐसे चेहरे हैं जो उस वक़्त या तो बहुत छोटे थे या फिर नवजात ही थे. ये वो वक़्त था जब प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाज़े विदेशी निवेश के लिए खोले ही थे.

सोशल मीडिया के उदय और डिजिटल क्रांति के बारे में भी कहा जाता है कि इनकी वजह से सामान्य लोगों की राजनीति में जाने की चाहत पनपी.

मोदी की सफलता

अब उनके पास एक ऐसा मंच है जो मुफ़्त में उपलब्ध है, जिस तक लोगों की आसानी से पहुंच है, वहां वे अपनी बात सहजता के साथ रह सकते हैं.

आज स्थिति यह है लालू यादव जैसे मंझे हुए राजनेता भी राजनीति में प्रासंगिक बने रहने और अपने समर्थकों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया के गुर सीख रहे हैं.

सभी लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल मंचों का अपने फ़ायदे के लिए बख़ूबी इस्तेमाल किया है.

ये चलन एक नए तरह की राजनीति को जन्म दे रहा है और नए चेहरों के लिए जगह बना रहा है. राजनीति को पहले की तरह गंदी चीज़ के तौर पर नहीं देखा जाता है.

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