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5जी सेवाओं के लिए ज्यादा और सस्ता स्पेक्ट्रम उपलब्ध हो, समिति ने दूरसंचार मंत्रालय को सिफारिश सौंपी

कमेटी ने कहा- 6,000 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की तत्काल नीलामी संभव

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jun 18, 2018, 10:58 AM IST

5जी सेवाओं के लिए ज्यादा और सस्ता स्पेक्ट्रम उपलब्ध हो, समिति ने दूरसंचार मंत्रालय को सिफारिश सौंपी
  • समिति ने कहा- ज्यादा फ्रीक्वेंसी पर खर्च ज्यादा आता है, इसलिए स्पेक्ट्रम सस्ता हो
  • 2016 में ज्यादा कीमत की वजह से स्पेक्ट्रम नीलामी विफल रही थी

नई दिल्ली. 5जी सेवाओं पर बनी दूरसंचार मंत्रालय की समिति ने इस नई सेवा के लिए ज्यादा और सस्ता स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराने की सिफारिश की है। इसका मानना है कि 5जी के लिए तत्काल 6,000 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराया जा सकता है। समिति अपनी सिफारिशें मंत्रालय को सौंप चुकी है। अगर इसे माना गया तो यह अब तक का सबसे बड़ा स्पेक्ट्रम आवंटन होगा।


2020 तक 5जी सेवाएं शुरू करने का लक्ष्य
दूरसंचार मंत्रालय की समिति के सदस्य आरोग्यस्वामी पॉलराज ने सरकार इस लक्ष्य के बारे में जानकारी दी। पद्मभूषण से सम्मानित पॉलराज स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमिरेटस हैं। उन्हें बेहतर वायरलेस परफॉर्मेंस देने वाली 'मीमो वायरलेस' टेक्नोलॉजी का प्रणेता भी माना जाता है। उन्होंने कहा कि 5जी की तैयारी में भारत बहुत से देशों से आगे है। 3जी और 4जी की तरह 5जी टेक्नोलॉजी मोबाइल फोन तक सीमित नहीं होगी। इसका इस्तेमाल पावर ग्रिड, स्मार्ट सिटी, एग्रीकल्चर, बैंकिंग, रेलवे, हेल्थकेयर जैसी सेवाओं में हो सकता है।

2016 में स्पेक्ट्रम नीलामी विफल रही
अभी देश में मोबाइल फोन के सिग्नल 800 से 2,600 मेगाहर्ट्ज बैंड में हैं। 2016 में सरकार ने अलग-अलग बैंड के 2,354.55 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम नीलामी के लिए रखे थे। इससे 5.63 लाख करोड़ मिलने का अनुमान था। लेकिन यह नीलामी फ्लॉप रही थी। 700 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम की एक यूनिट के लिए बेस प्राइस 11,000 करोड़ रु. रखी थी। कंपनियों को कम से कम 5 यूनिट के लिए बोली लगानी थी। ज्यादा कीमत का हवाला देते हुए किसी कंपनी ने बोली नहीं लगाई।

समिति ने 11 स्पेक्ट्रम बैंड चुने
5जी सेवा के लिए समिति ने 11 स्पेक्ट्रम बैंड चुने हैं। इनमें से 700 मेगाहर्ट्ज, 3.5 गीगाहर्ट्ज, 24 गीगाहर्ट्ज और 28 गीगाहर्ट्ज बैंड तत्काल उपलब्ध कराए जा सकते हैं। 700 मेगाहर्ट्ज को प्रीमियम माना जाता है। ऊंची फ्रीक्वेंसी वाले बैंड में 5,250 मेगाहर्ट्ज, 3.5 गीगाहर्ट्ज बैंड में 300 मेगाहर्ट्ज और 1,000 मेगाहर्ट्ज से कम वाले बैंड में 405 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम दिया जा सकता है। ई और वी बैंड भी होंगे। ई बैंड (71-76 गीगाहर्ट्ज) और वी बैंड (57-64 गीगाहर्ट्ज) में 1,000 एमबीपीएस की डेटा स्पीड मिल सकती है। समिति ने 600 मेगाहर्ट्ज, 1.4, 30, 31 और 37 गीगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम बैंड की भी सिफारिश की है।

सभी फ्रीक्वेंसी बैंड के लिए स्पेक्ट्रम की कीमत एक नहीं हो सकती
ज्यादा फ्रीक्वेंसी पर खर्च भी ज्यादा आता है इसलिए स्पेक्ट्रम की कीमत कम होनी चाहिए। 700 मेगाहर्ट्ज जैसे कम फ्रीक्वेंसी बैंड में मोबाइल सिग्नल दूर तक जाता है। फ्रीक्वेंसी बढ़ने के साथ सिग्नल कमजोर पड़ता जाता है। ऊंचे फ्रीक्वेंसी बैंड में 5जी के लिए हर 50 मीटर पर बेस स्टेशन स्थापित करना पड़ेगा। ज्यादा फ्रीक्वेंसी बैंड में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च होता है। इसलिए स्पेक्ट्रम की कीमत कम होनी चाहिए।

ज्यादा स्पेक्ट्रम उपलब्ध होने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर की लागत कम आएगी
पॉलराज ने कहा कि समिति ने कंपनियों को कम कीमत पर स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराने की बात कही है। कम और ज्यादा फ्रीक्वेंसी बैंड में स्पेक्ट्रम की कीमत एक नहीं हो सकती। दूरसंचार विभाग 5जी के लिए ज्यादा से ज्यादा स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराने पर विचार कर रहा है। इससे कंपनियों का इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च कम होगा।

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