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बिगड़ी बातें सुधारने की राह पर चले भाजपा

गठबंधन का गणित खिलाफ हो गया है तो ‘मोदी प्रयोग’ के लिए जुटे नए वोटरों को भी कायम रखना होगा

Danik Bhaskar | Apr 25, 2018, 11:32 PM IST
चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन् चेतन भगत अंग्रेजी के युवा उपन्

पिछले हफ्ते मैंने सरकार के प्रदर्शन को लेकर टि्वटर पर जनमत संग्रह किया तो रोचक नतीजे आए (40 हजार जवाब आए, जिनके साथ ट्विटर पोल से जुड़ीं सावधानियां लागू हैं)। 42 फीसदी ने सरकार के प्रदर्शन को अपेक्षा से अधिक पाया है (18 फीसदी जरा ऊपर थे तो 24 फीसदी काफी ऊपर)। 58 फीसदी ने सरकार का प्रदर्शन अपेक्षा से नीचे पाया (19 फीसदी थोड़े नीचे थे तो 39 फीसदी काफी नीचे थे)। प्रतिक्रिया देने वाले दस में से चार को लगता है कि सरकार ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है। दुनियाभर में सत्ता में बैठी पार्टी की रेटिंग साल बढ़ने के साथ गिरती जाती है। इसे देखते हुए यह प्रदर्शन खराब नहीं है। लेकिन, चिंता के लिए पर्याप्त कारण हैं। सोशल मीडिया में आमतौर पर भाजपा हर जनमत संग्रह में हावी रहती है। ऐसे माहौल में जवाब देने वाले दस में से छह कहते हैं कि उन्हें सरकार का प्रदर्शन अपेक्षा से नीचे लगता है और उन छह में से भी चार अपेक्षा से बहुत नीचे मानते हैं तो भाजपा के लिए चिंता का कारण है। सरकार को खारिज न किया गया हो पर धारणा कुछ ऐसी है: मजा नहीं आ रहा।
ऐसा क्यों हुआ? इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह सवाल है कि क्या इसका 2019 पर असर होगा? किसी सरकार के बारे में बनने वाली धारणा दो तत्वों पर निर्भर होती है- शुरुआती अपेक्षाएं और वास्तविक प्रदर्शन। सरकार से शुरुआती अपेक्षाएं तो बहुत ज्यादा थीं। एक तरह से मोदी एक प्रयोग थे। भारत में पहली बार देश ने मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद के लिए वोट दिए। वंशवादी राजनीित और भाजपा के भीतर नेताओं के पदानुक्रम को दरकिनार कर दिया गया। लोगों ने मोदी को ऊपर उठाया क्योंकि एक, वे यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार से तंग आ गए थे। दो, उन्होंने उम्मीद की किरण देखी कि कोई आएगा और भारत में वाकई चीजें बदल देगा। ऐसे बहुत सारे लोग थे, जिन्होंने मोदी को सिर्फ इसलिए वोट दिया कि वे इस प्रयोग को आजमाना चाहते थे और उनकी विशाल अपेक्षाएं थीं। उस हद तक कुछ निराशा अपरिहार्य थी।
लेकिन दूसरा पहलू यानी सरकार का वास्तविक प्रदर्शन भी चिंता का कारण है। देखिए हाल की खबरों का चक्र, जिससे भाजपा को कोई गर्व नहीं हुआ होगा। गोरखपुर के चुनाव में हार, नीरव मोदी, आईसीआईसीआई बैंक घोटाला, फर्जी खबरों संबंधी आदेश, अजा-जजा अधिनियम संबंधी संशोधन, उन्नाव व कठुआ दुष्कर्म मामले, एटीएम से नकदी का गायब होना और न्यायपालिका संबंधी सवालिया निशान। इनमें से हर घटना ने भाजपा की छवि को छोटा झटका दिया है। सरकार को श्रेय है कि उसने नकारात्मक असर को खत्म करने के लिए जरूरी कदम उठाए। उदाहरण के लिए, दुष्कर्म संबंधी कानून कड़े बनाए गए, देश से पलायन करने वालों से संबंधित कानून में संशोधन किया गया और फेक न्यूज़ संबंधी आदेश वापस लिया गया।
हालांकि, विशिष्ट घटनाओं के अलावा शायद बड़ी चिंता सरकार के व्यापक नीतिगत दृष्टिकोण की है। जब से सरकार ने सत्ता संभाली है, उसने परिवर्तन लाने का प्रयास तो किया। कई नए, व्यापक, अच्छे इरादों वाली योजनाएं और नीतियां लागू कीं। एक ऐसे देश में जहां किसी ने कभी कुछ भी बदलने का प्रयास न किया हो, यह स्वागतयोग्य पहल थी। हालांकि, इनमें से कोई भी योजना व्यापक रूप से हिट नहीं हुई। दो सबसे बड़े कदम नोटबंदी और जीएसटी का दायरा बहुत व्यापक था पर उन्हें अभी किसी बड़ी जीत के रूप में नहीं देखा जा सका है। दोनों के साथ अमल में लाने की समस्याएं हैं। जीएसटी भी अधूरा-जीएसटी ही है, क्योंकि इसकी अब भी एक दर नहीं है। दरें भी बहुत ऊंची हैं।
किसी कारण से करारोपण सरकार का एक तरह से जुनून हो गया है। जहां यह अच्छी बात हो सकती है, इसमें अति भी हो सकती है। करदाता जो प्रश्न पूछ रहा है वह यह है : यदि सरकार कह रही है कि भ्रष्टाचार घटा है, तो वह पहले की तुलना में बहुत बड़ी राशि बचा रही होगी। यदि ऐसी बात है तो क्यों पूर्ववर्ती अधिक भ्रष्टाचार वाली सरकारों की तुलना में कर अधिक है? नोटबंदी और जीएसटी के अलावा आधार जैसी योजनाओं ने भी लोगों में गुस्सा पैदा कर दिया है। एक सार्वत्रिक भारतीय पहचान के रूप में आधार बहुत अच्छा विचार है। लेकिन, अद्‌भुत योजनाएं भी जबर्दस्ती लोगों के गले उतारने पर अप्रिय हो जाती हैं। हर भारतीय पर धमकाने वाले संदेशों की बौछार हुई कि वह आधार को लिंक करे या अपना फोन कनेक्शन या बैंक खाता गंवा दे। इसे शायद ही लोकप्रिय होने का तरीका कहेंगे। ये उदाहरण बताते हैं कि सरकार कोई रियायत न देकर केवल डंडा दिखाने मंे भरोसा करती है। जहां यह भय आधारित विधि काम दे सकती है जैसे यह सख्त हैडमास्टरों को देती है वहीं, भारत जैसे जटिल देश में यह शायद ही लोगों के दिल तक पहुंचने का रास्ता हो।
अर्थव्यवस्था के अलावा सामाजिक मोर्चे पर भी आशंकाएं हैं। भाजपा में हमेशा से ही भगवा झुकाव रहा है, क्योंकि वही तो उसका मूल समर्थन आधार है। हालांकि, भगवे की किस छटा को यह चुनती है, वह महत्वपूर्ण है। अब तो ऐसा लगता है कि यह आडवाणी-भगवा छटा की ओर जा रही है। यह बहुत गहरी छटा है, जिसमें हिंदू कट्‌टरपंथियों को परोक्ष समर्थन दिया जाता है। गलत बातों की भी भाजपा अनदेखी कर देती है।
2014 में मोदी के प्रयोग को समर्थन देने वाले भाजपा के नए समर्थकों को अपेक्षा थी कि मोदी भाजपा को वाजपेयी वाली हल्की छटा देंगे। यह वह छटा है, जिसमें हिंदू गौरव का जश्न मनाया जाता है लेकिन, कट्‌टरपंथ और धर्म/राष्ट्रवाद थोपने से बचा जाता है। ऐसा हुआ नहीं। लंदन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वे सरकार की आलोचना का स्वागत करते हैं। हो सकता है कि यह वक्त इसी पर विचार करने का हो। गठबंधन का गणित तो पहले ही भाजपा के खिलाफ हो गया है। यदि भाजपा का वोट शेयर सिर्फ 5 फीसदी गिर जाए और विपक्ष एकजुट हो जाता है तो पार्टी की सीटें 275 से घटकर 200-225 तक पहुंच सकती है। इस परिदृश्य में एआरटी त्रयी (अखिलेश-राहुल-तेजस्वी) गैर-भाजपा सरकार को साकार कर सकते हैं। ‘मोदी प्रयोग’ अब भी जारी है। बेहतर होगा कि भाजपा सुधार की राह पर जाएं और न सिर्फ अपने प्रशंसकों को बल्कि देखने-समझने वाले वोटर को भी बरकरार रखे, जो 2019 में इस प्रयोग के अगले दौर को मंजूरी देने वाला है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)