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चेतन भगत का कॉलम: महानगरों पर दबाव घटाने का यही वक्त है

संदर्भ: प्रत्यक्ष करों को केंद्र व राज्य के हिस्से में बांटकर राज्यों को दरें तय करने की रियायत से निकलेगा हल

चेतन भगत | Last Modified - Jul 12, 2018, 11:50 PM IST

चेतन भगत का कॉलम: महानगरों पर दबाव घटाने का यही वक्त है

भारत की फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से अधिकांश के कॉर्पोरेट हेडक्वार्टर दिल्ली और मुंबई में हैं। कुछ बेंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में भी हैं। करीब आधा दर्जन भारतीय शहरों में हमारी लगभग सभी शीर्ष कंपनियां स्थित हैं। यही हालत विदेशी कंपनियों के भारतीय मुख्यालयों की है। दूसरी तरफ अमेरिका में फार्चुन 500 कंपनियां समान रूप से पूरे देश में फैली हुई हैं। न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस, सीएटल और सैन फ्रांसिस्को जैसे मुख्य महानगर होने के बावजूद बड़ी वैश्विक कंपनियों के मुख्यालय कई दर्जन अमेरिकी शहरों जैसे अटलांटा, ह्यूस्टन, ओमहा, रोचेस्टर और डेट्रॉइट में स्थित हैं। इसके विपरीत आपको शायद ही कोई देशी या विदेशी कंपनी ऐसी मिलेगी, जिसका मुख्यालय इंदौर, जयपुर, भुवनेश्वर अथवा गुवाहाटी में हो। कॉर्पोरेट मुखिया ऐसे शहरों में न जाने के कई कारण गिना देंगे। कनेक्टिविटी का अभाव, प्रतिभाओं का उपलब्ध न होना (या वहां जाने में प्रतिभाशाली लोगों की उदासीनता), बच्चों के लिए अच्छे स्कूलों का अभाव और एक्शन की दुनिया से दूर होने का आम अहसास।

जहां पर सारी गहमागहमी हो वहां होने की इस इच्छा और गहमागहमी सिर्फ मुट्‌ठीभर शहरों तक सीमित होने का मतलब है हमारे महानगरों का दम घुटना। पिछले दिनों मुंबई के अंधेरी में पुल ध्वस्त होने से पूरा महानगर ठप पड़ गया। यदि आप मानसून में मुंबई जाएं तो यह ऐसा महानगर लगता है, जैसे विश्वयुद्ध हाल ही में समाप्त हुआ है। दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक अराजक है। घर से दफ्तर जाने में अक्सर दो घंटे से ज्यादा लग जाते हैं। तुलनात्मक रूप से नया मुंबई एयरपोर्ट खचाखच भर चुका है। महानगरों में किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश लेना एवरेस्ट चढ़ने जैसा है। दिल्ली का प्रदूषण तो आपकी जान भी ले सकता है। मुंबई में रियल एस्टेट की कीमतें घातक हो सकती हैं। बुनियादी नागरिक सुविधाएं, रियल एस्टेट की उपलब्धता, शिक्षा और ट्रैफिक सब एक ही कहानी कहते हैं- शहरों का दम घुट रहा है। वक्त आ गया है कि हमें वाकई इसके बारे में कुछ करना होगा। इस समस्या का समाधान तो यही है कि 10, 20 या 50 ऐसे शहर सामने आएं, जो इन फट पड़ रहे महानगरों का सच्चा विकल्प दे सकें।

यह कैसे होगा? इन शहरों में जो भी चीज नदारद है- कनेक्टिविटी, शिक्षा के विकल्प या एक्शन न होना वह सब आखिरकार एक ही तथ्य से निकलते हैं और वह है नौकरियों का गुलजार माहौल न होना। जब किसी शहर में उच्च स्तर से लेकर निम्न स्तर तक के ढेर सारे जॉब हों और लोगों के जेब में पैसा आ रहा हो तो शहर अपने आप ऊपर उठने लगता है। 1990 के दशक के उनींदे से बेंगलुरू का उदय संयोगवश कुछ आईटी कंपनियों के शुरू होने से हुआ, जो तेजी से बढ़कर विशालकाय कंपनियां बन गईं। बेशक, बेंगलुरू जैसे संयोग बार-बार नहीं होते। हमें ऐसे प्रयास करने होंगे कि रोजगार पैदा करने वाली दिग्गज कंपनियां खुद ही अन्य छोटे शहरों का रुख करें। हमें बड़ी भारतीय कंपनियों को अपने मुख्यालय अन्य जगहों पर ले जाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देना होगा। इसी तरह स्टार्टअप या नई आने वाली विदेशी कंपनियों को भी प्रोत्साहित करना होगा कि वे किसी अन्य शहर को भी आजमाए।

एक अच्छा तरीका तो डायरेक्ट टैक्स (आयकर एवं कॉर्पोरेट कर) में सुधार करके उन्हें अधिक संघीय प्रकृति का बनाना होगा। अभी तो केंद्र सरकार व्यक्तियों से आयकर और कंपनियों से कॉर्पोरेट टैक्स वसूलती है। केंद्र सरकार की इस आमदनी का एक हिस्सा फिर राज्यों को बांटा जाता है। यदि आप आयकर और कॉर्पोरेट कर को केंद्र और राज्यों के भाग में बांट लें (काफी कुछ मौजूदा सीजीएसटी और एसजीएसटी की तरह) और राज्यों को यह छूट दें कि वे करों के राज्य के हिस्से की दरें खुद तय करें। यह भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। न सिर्फ इससे हमारे महानगरों पर दबाव घट सकता है बल्कि रोजगार भी बेहतर तरीके से देशभर में फैल सकता है। उदाहरण के लिए मान लें कि कॉर्पोरेट टैक्स की दर 30 फीसदी है। आइए, इसे 15 फीसदी सेंट्रल कॉर्पोरेट टैक्स और 15 फीसदी राज्य कॉर्पोरेट टैक्स में विभाजित करें। फिर मान लें कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा अपने यहां कंपनियों को आमंत्रित करना चाहते हैं। वे 5 फीसदी स्टेट कॉर्पोरेट टैक्स का प्रस्ताव रख सकते हैं, जिससे कंपनी के लिए कर की दर 20 फीसदी हो जाएगी (15 फीसदी केंद्र, 5 फीसदी राज्य)।

इस तरह 10,000 करोड़ रुपए मुनाफे वाली कंपनी हर साल 3,000 करोड़ रुपए टैक्स देती थी, वह यदि इन शहरों में जाने का फैसला करते है तो 2,000 करोड़ रुपए टैक्स देगी। सालाना 1,000 करोड़ रुपए की यह बचत किसी कंपनी को अन्य स्थान पर जाने को प्रोत्साहित करेगी। एक बार कंपनी वहां चली जाए तो उसके साथ हजारों जॉब वहां जाएंगे। इन नए आने वाले लोगों को सेवा देने के लिए कई और जॉब निर्मित होंगे जैसे मनोरंजन, शिक्षा, रियल एस्टेट और अन्य सेवाएं। जिस महानगर से कंपनी आएगी, उसे राहत मिलेगी। नए शहर की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। हां राज्य को कर की कुछ आमदनी खोनी पड़ेगी लेकिन, राज्य की अर्थव्यवस्था में जो उछाल आएगा उससे इस घाटे का औचित्य सिद्ध हो जाएगा।

सच तो यह है कि कुछ स्थानों के लिए तो केंद्र भी करों की अपनी हिस्सेदारी में डिस्काउंट दे सकता है। कल्पना कीजिए कि यदि कंपनियां जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में जाएं और 30 फीसदी की बजाय सिर्फ कुल 5 फीसदी टैक्स ही दें। शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद कंपनियां वहां जाएंगी, क्योंकि उनकी स्प्रेडशीट एक दशक में बचत की विशाल राशि दिखाएगी। क्या इससे इन क्षेत्रों को बहुत बड़ा बूस्ट नहीं मिलेगा? क्या इससे कश्मीर में स्थिति सुधारने में मदद नहीं मिलेगी, जब पत्थर फेंकने वालों को अपने ही क्षेत्र में अच्छे जॉब मिल जाएंगे? आमदनी पैदा करने के अलावा सरकार के पास टैक्स नीति भी ढेर सारी समस्याएं सुलझाने के लिए अच्छा औजार है- महानगरों का खचाखच भर जाना, भीतरी क्षेत्रों में रोजगार ले जाना और उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों को मदद पहुंचाने जैसी समस्याएं। यदि हम अपने प्रत्यक्ष करों की प्रकृति अधिक संघीय बना दें और राज्यों को कॉर्पोरेट गतिविधियां आमंत्रित करने के लिए टैक्स घटाने की अनुमति दें तो हमारे महानगरों पर से दबाव कम करने और नए चमकते महानगर बनाने में बहुत मदद मिल सकती है।

(लेखक के अपने विचार हैं।)

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