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अब तो निजी बैंकिंग क्षेत्र भी संदेह के घेरे में

पीएनबी घोटाला हुआ तो निजीकरण को समाधान बताया गया पर आईसीआईसीआई मामले ने इसे गलत सिद्ध किया।

चेतन भगत | Last Modified - Apr 12, 2018, 09:04 AM IST

अब तो निजी बैंकिंग क्षेत्र भी संदेह के घेरे में

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या भ्रष्टाचार हमारे ओहदेदारों के डीएनए में ही है, जो हर संभव अवसर पर उन्हें भ्रष्ट होने पर मजबूर कर देता है? वरना क्यों पद्म अलंकरण से सम्मानित, बिज़नेस व प्रभावशाली वर्ग की शीर्ष महिलाओं की सूची की स्थायी चरित्र आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ चंदा कोचर ऐसी कोई संदिग्ध डील करेंगी। उनके पति और देवर ने वीडियोकॉन के साथ बिज़नेस किया (और प्रबल संभावना है कि पैसा लिया), वह कंपनी जिसने आईसीआईसीआई से पैसा लिया और अब सबसे बड़ी डिफॉल्टर में से एक है। जब यह फैमिली पार्टी चल रही थी तो सीईओ ने बैंक को यह नहीं बताया।
कोई भी अचरज करेगा कि उन्हें यह करने की क्या पड़ी थी? इस स्तर पर पहुंचने के बाद भी खास भारतीय शैली के पति-पत्नी-देवर-भाभी कंपनी जैसा व्यवहार क्यों? यदि चंदा कोचर अधिक पैसा कमाना चाहती थीं तो वे विदेशी बैंक ज्वॉइन कर सकती थीं। वे उन्हें खुशी से ले लेते, वह भी कई गुना वेतन पर, वे स्टार सीईओ जो हैं। सौदे के भीतर हुए लेन-देन जटिल हैं (क्योंकि जब शिक्षित बैंकर चोरी करता है तो वह नोटों के बंडल चुराने वाले सरकारी क्लर्क से बेहतर ढंग से छिपाता है)। हालांकि, खबरों में आने वाली शुरुआती जानकारियां चिंता में डालती हैं। वीडियोकॉन ने आईसीआईसीआई बैंक से जो भी लिया हो, कथित रूप से इसने 10 फीसदी पति और 5 फीसदी देवर को दिए। अभी वीडियोकॉन-कोचर्स-आईसीआईसीआई गठजोड़ की आपराधिकता साबित होना है। बेशक, यदि ऐसा है तो सीईओ, पति, देवर और अन्य का लंबा पारिवारिक मिलन जेल में होगा। आपराधिकता सिद्ध करने में वक्त लगेगा। इस बीच हितों का टकराव तो स्पष्ट है ही। उसका तो यह पाठ्यपुस्तकों में देने लायक उदाहरण है। वीडियोकॉन ने सीईओ के परिवार से बिज़नेस किया और सीईओ ने आंतरिक रूप से यह कभी जाहिर नहीं किया। सिर्फ इसी आधार पर पेशवर ढंग से संचालित कोई भी कंपनी (जो होने का आईसीआईसीआई दावा करती है) सीईओ को कुछ घंटों में बर्खास्त कर देती।
यहां ऐसा नहीं होता। जब आईसीआईसीआई मामला जाहिर हुआ तो निवेशकों, जमाकर्ताओं और शेयरधारकों की हितों की रक्षा करने के लिए बना बोर्ड दौड़कर अपने सीईओ के लिए ‘क्लीन चिट’ वाला बयान देता है। यह दिमाग चकराने वाली बात है कि बोर्ड ने सबसे पहले जांच का आदेश क्यों नहीं दिया। ऐसी दुनिया में जहां स्टीव जॉब्स को पद छोड़ना पड़ा और उबर संस्थापक को जाना पड़ा, यारी-दोस्ती वाला आईसीआईसीआई बोर्ड एक कर्मचारी सीईओ के बचाव के प्रयास में लग गया। ऐसा करके इस बोर्ड ने खुद को प्रमुख भारतीय कॉर्पोरेट का सबसे कायर, मूर्ख और निर्लज्ज कंपनी बोर्ड साबित किया है। इस अक्षम बोर्ड को जरा भी यह अहसास नहीं हुआ कि भारतीय कंपनियों में निवेश करने वाले दुनिया के निवेशकों में यह कैसी सिहरन दौड़ा देगा। उन्होंने ऐसा क्यों किया? आईसीआईसीआई बोर्ड के दर्जनभर लोगों में आधे भीतर के हैं (चेअरमैन सहित)। हो सकता है कि वे उनकी ‘सबसे प्रभावशाली महिला’ सीईओ के आभा मंडल के प्रभाव में आ गए हों। ज्यादा संभावना यह है कि वे मैडम के चहेते बने रहना चाहते हों, चाहते हों कि उनकी पार्टियों में उन्हें बुलाया जाता रहे और इस प्रभावशाली सर्कल को मक्खन लगाते रहना चाहते हों, जो सही चीजें करने की बजाय आपको जीवन में ऊपर उठने में ज्यादा मदद कर सकता है।
आप पूछ सकते हैं कि इस आईसीआईसीआई के मामले का मुझसे क्या संबंध है? मैं तो एक साधारण छात्र हूं या कहीं काम कर रहा कोई कर्मचारी हूं। जब ये सीईओ और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर टाइप के लोग कुछ भी करते हैं तो इसका क्या महत्व है? महत्व है। यदि आप भारत में रोजगार के संकट के बारे में सुनते हैं या आपको लगता है कि यहां पर्याप्त अवसर नहीं हैं या घोर प्रतिस्पर्धा है तो ऐसा आईसीआईसीआई सीईओ और उनके बोर्ड के जैसे लोगों के कारण। यही लोग दुनियाभर में भारतीय कंपनियों के बारे में अविश्वास को जन्म देते हैं। उनके कारण निवेशक भारत में या भारतीय कंपनियों में निवेश करने से पहले दस बार सोचते हैं। इनके जैसे लोग ही सच्ची उद्यमशीलता और स्टार्टअप का गला घोंटते हैं, जो सच में पूंजी के हकदार हैं पर ये उनकी बजाय संदिग्ध कंपनियों को पूंजी दे देते हैं। कम निवेश, कम आंत्रप्रेन्योर और स्टार्टअप होने के कारण जॉब भी थोड़े हैं। यही कारण है कि आपको उतना वेतन नहीं मिलता या आपके बेटे या भाई के लिए अच्छा जॉब पाना इतना कठिन क्यों है। यह कॉर्पोरेट गंदगी भारत को सड़ा रही है। जब नीरव मोदी घोटाला हुआ तो सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक पीएनबी को कोसना आसान था। तब निजीकरण को समाधान बताया गया। लेकिन, आईसीआईसीआई नाकामी ने बता दिया है कि सार्वजनिक क्षेत्र हो या निजी, गड़बड़ी हर जगह संभव है। यह लेख लिखा जा रहा था तब आईसीआईसीआई बोर्ड सीईओ को कायम रखने के लिए ही उठापटक में लगा था। यस-मैन बोर्ड को समझना होगा कि वे भारतीय कॉर्पोरेट छवि को दुनियाभर में कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह एक बात है जब कोई भूखा व्यक्ति केला चुरा लेता है। यह बिल्कुल अक्षम्य है जब महिमामंडित सीईओ संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होती है।
लोग एक-दूसरे के रिश्तेदारों को आगे बढ़ाना भी पसंद करते हैं, नहीं? लेकिन, किसी रिश्तेदार यहां तक कि जीवनसाथी के लिए भी उन लाखों लोगों के भरोसे से समझौता नहीं किया जा सकता, जिन्होंने आप पर विश्वास किया है। एक भारतीय महिला के रूप में उनका आईसीआईसीआई सीईओ के पद पर पहुंचना वाकई प्रशंसीय है। किंतु कई भारतीयों की तरह उन्होंने भी रिश्तेदारों के लिए समझौता कर लिया। यह जानना निराशाजनक है पर उम्मीद है कि इससे दूसरे सबक लेंगे। यह लेख पढ़ रही भारतीय महिलाओं को खुद से संकल्प करना चाहिए कि वे कभी गलत काम करने के लिए पुरुषों द्वारा डाले गए दबाव के आगे नहीं झुकेंगी। फिर वह व्यक्ति आपकी ज़िंदगी में कितना ही महत्व क्यों न रखता हो।
संभव है इसकी वजह यह हो कि हम सब अभाव की मानसिकता में पले-बढ़े हैं। लेकिन, सीईओ, बोर्ड सदस्य या साधारण भारतीय, जो भी हों हमें इन सहज वृत्तियों की जांच करके सही कदम ही उठाना चाहिए, क्योंकि हमारा भविष्य दांव पर लगा है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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