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रंग-गुलाल में कैमिकल जांचना जिला प्रशासन व निगमकी जिम्मेदारी, 20 साल में नहीं लिया एक भी सैंपल
राजधानी में मिलावट वाले रंग और गुलाल को जांचने के नाम पर लापरवाही उजागर हुई है। मिलावट जांचने के लिए तीन विभाग हैं, फिर भी तीनों में न कोई तालमेल है, न ही जांचने के लिए कोई मशीन है। इसलिए हर साल होली के बाद 25 प्रतिशत लोगों को त्वचा के रोग होते हैं।
डीबी स्टार टीम ने मिलावट वाले रंगों की जांच-पड़ताल नहीं होने की जानकारी मिलने पर पड़ताल की। इस दौरान खुलासा हुआ कि शहरी क्षेत्रों में कैमिकल और मिलावटी वाले रंगों को जांचने के लिए खाद्य विभाग, जिला प्रशासन और नगर निगम की जिम्मेदारी होती है, लेकिन तीनों ही विभाग केमिकल वाले रंगों की जांच नहीं करता। इतना ही नहीं, रायपुर जिले में कैमिकल वाले रंगों की जांच करने के लिए मशीन भी नहीं है। इसके अलावा छापेमारी करते हुए न ही कलर की सैंपलिंग होती है। पिछले 20 वर्षाें से एक भी रंग की सैंपलिंग नहीं हो पाई है। यही वजह है कि होली त्योहार के बाद शहरी क्षेत्रों में त्वचा रोग संबंधी शिकायतें पहुंच रही हैं। अंबेडकर अस्पताल में ही 15 से 20 मामले होली के बाद पहुंचते हैं। हालांकि इनमें महिलाओं और बच्चों के केस ज्यादा होते हैं। क्योंकि दोनों की त्वचा बहुत ही सेंसिटिव होती है और लाल चकते और स्कीन में जलन जैसी शिकायतें होती हैं।
जानिए, कैसे होती है रंगों में मिलावट और कितने प्रतिशत बढ़ जाते हैं त्वचा रोगी
ऐसे तैयार किया जाता है घातक मिलावटी रंग-गुलाल
वारनिस पेंट में डिफरेंट टाइप्स कैमिकल रंगों में मिक्स किया जाता है। इसमें रेत, मिट्टी मिलाया जाता है। वहीं गुलाल में मैदा, सेलकड़ी की मिलावट होती है। वहीं रंग के गीले पाउच भी बाजार में बिक रहे हैं। पाउच में तेजाबी पानी और रंग का मिश्रण होता है। साथ ही गुलाल बनाने के लिए डीजल, इंजन ऑयल और कॉपर सल्फेट का इस्तेमाल करते हैं। सूखे गुलाल में एस्बेस्टस और सिलिका मिलाई जाती है।
शहर के अस्पतालों में ही त्योहार के बाद 200 से 250 मरीज
अंबेडकर अस्पताल में त्वचा रोग डिपार्टमेंट की रिपोर्ट बताती है कि होली त्यौहार के बाद से त्वचा संबंधी रोगी इलाज के लिए पहुंचते हैं। यानी एक हजार में करीब 200 से 250 लोगों को ऐसी शिकायतें होती हैं रंग लगने की वजह से शरीर में जलन और लाल धब्बे जैसी परेशानियां होती हैं। धूप में रंग सूखने के बाद इसका प्रभाव त्वचा पर दिखने लग जाता है।
ऐसे समझें, किस तरह बचें घातक रंग-गुलाल से
{ रेड कलर में मरक्यूरिक ऑक्साइड होता है। इससे एलर्जी और स्कीन कैंसर होता है।
{ ग्रीन कलर में कॉपर सल्फेट होता है। इससे आंख की बीमारी और अंधत्व का कारण बनता है।
{ ब्लैक कलर में लेड होता है। इससे एलर्जी होता है और स्कीन को नुकसान होता है।
{ सिल्वर रंग में एल्युमिनियम ब्रोमाइड
होता है, इससे स्कीन कैंसर की बीमारी होती है।
{ पीले रंग में क्रोमियम आपोडाइड मिला
होता है, इससे एलर्जी और सांस की बीमारी होती है।
{ चमकीले रंगों से बचें, उसमें पिसा
हुआ शीशा मिला रहता है इससे
एलर्जी होती है।
{ ब्लू कलर में लेड कैमिकल का इस्तेमाल होता है। इससे लाल चकते होते हैं।
कैमिकल वाले कलर घातक
होली के बाद केमिकल वाले रंगों से इंफेक्शन होता है। 20% से ज्यादा मरीज त्योहार के बाद त्वचा संबंधी संक्रमण के ही पहुंचते हैं। महिलाओं और बच्चों की त्वचा ज्यादा संवेदनशील होती है, इन्हें थोड़ा प्रोटेक्शन देने की जरूरत होती है। होली के बाद रोज 10 से 15 फीसदी ऐसे केस आते ही हैं।
- मृत्युंजय सिंह, स्किन स्पेशलिस्ट, अंबेडकर अस्पताल
हमारे यहां से नहीं की जाती जांच
कलर की जांच हम नहीं करते हैं। स्वास्थ्य से संबंधित मामले हैं, लेकिन इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग से बात करके बताता हूं।
- एके हलधर, स्वास्थ्य अधिकारी, नगर निगम
हर्बल कलर को लेकर जागरुकता आई, शिकायत पर करते हैं जांच
हर्बल कलर को लेकर लोगों में जागरुकता आई है। फिर भी पर्यावरण विभाग की तरफ से जांच की जाती है। जहां भी इस तरह की शिकायतें आती हैं, वहां से सामग्री जब्त की जाती है।
- डॉ. एस. भारतीदासन, कलेक्टर, रायपुर
एक्सपर्ट व्यू
होली के बाद हर साल अस्पतालों में पहुंचते हैं 20% से ज्यादा त्वचा संक्रमण के पीड़ित
इस वजह से होती है एलर्जी की शिकायतें
रंग में एल्युमिनियम ब्रोमाइड से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। वहीं लाल गुलाल में मरकरी सल्फाइड त्वचा कैंसर को बढ़ावा देता है। इसी तरह नीले गुलाल में प्रूशियन ब्लू होता है, जो त्वचा पर एलर्जी और संक्रमण पैदा करता है। गर्भवती महिलाओं के लिए ऐसे रंग सबसे घातक होते हैं। कुछ रंगों में गंध होने पर उसे किसी के शरीर में लगाने से बचना चाहिए।
investigation
DB Star