परिस्थितियां बनती-बिगड़ती रहती हैं, पर इसके चलते दूसरों के लिए मन में द्वेष पालना ठीक नहीं: महेंद्र सागर

News - कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर परिस्थितियां बनती-बिगड़ती रहती हैं, लेकिन परिस्थितियों में डूबकर मन में राग-द्वेष...

Bhaskar News Network

Oct 12, 2019, 07:45 AM IST
Raipur News - chhattisgarh news circumstances continue to worsen but because of this it is not right for others to maintain malice in their minds mahendra sagar
कम्युनिटी रिपोर्टर | रायपुर

परिस्थितियां बनती-बिगड़ती रहती हैं, लेकिन परिस्थितियों में डूबकर मन में राग-द्वेष पाल लेना ठीक नहीं है। जितने भी संयोग मिले हैं, उन संयोगों को अच्छे से जानना, ऐसा जानना की उनसे राग-द्वेष न आए। यह बातें शुक्रवार को एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी में मुनि महेंद्र सागर ने कही।

उन्होंने आगे कहा कि सभी नव पदों की आराधना का सार यही है कि निरंतर हमारी आत्मा की शुद्धि होती चली जाए। हमें भी अपनी आत्मा को शुद्ध करके अरिहंत व सिद्ध अवस्था प्राप्त करनी है, उसके लिए आचार्य, उपाध्याय, साधु ये हमारे कल्याण मित्र हैं, इनसे हम आगे बढ़ने का मार्गदर्शन लेते रहें। पहले स्वयं के दर्शन को ठीक करें फिर सम्यक दर्शन के माध्यम से हम अपने ज्ञान को ठीक करें। दर्शन और ज्ञान के माध्यम से चारित्र्य की आराधना करें और आत्मोन्नति के मार्ग पर हम आगे बढ़ते जाएं। शांतचित्तता के साथ स्वयं को समझाएं की सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक चारित्र्य व तप की आराधना के माध्यम से हम अपने जीवन से अशुद्धियों को निकालते जाएं और आत्मा को शुद्ध बनाते जाएं। ऐसा निरंतर प्रय| चलता रहे और जल्दी से जल्दी हम लक्ष्य को प्राप्त करें। सम्यक ज्ञान, दर्शन व चारित्र्य के माध्यम से हम अपने राग-द्वेष, मोह को तोड़ें।

परिस्थितियों का सामना करने साधना करें : अरिहंत परमात्मा पूरे विश्व, पूरे ब्रह्मांड को जानते हैं। वे तीनों लोक और तीन काल को जानते हैं। जीवन जीते हुए हमारी साधना यही होनी चाहिए कि अनुकूल सामग्री मिलने पर राग नहीं करें और प्रतिकूल सामग्री मिलने पर द्वेष नहीं करें। इसी साधना को सामायिक की साधना कहते हैं। इसे ही समता भाव की साधना कहते हैं। यही साधना अरिहंत पद की साधना है। अक्सर परिस्थितियां धीरे-धीरे आती है लेकिन उन परिस्थितियों में हमारा मन कभी गद्गद् तो कभी दुखी शोक संतप्त हो जाता है। परिस्थितियों का सामना किस तरह हो, इसका अभ्यास करने ही सामायिक की साधना की जाती है। सामायिक करते हुए केवल शांति से बैठना ही नहीं है।

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