बचपन में देखा पायलट, इंजीनियर बनने का सपना, रंगमंच के जुनून से हुआ पूरा

News - वर्ल्ड थिएटर डे के मौके पर पढ़िए सिटी के तीन अलग-अलग प्रोफेशनल्स की कहानी। यह वो लोग हैं जो मुश्किल जॉब शैड्यूल को...

Mar 27, 2020, 07:27 AM IST
Raipur News - chhattisgarh news pilot seen in childhood dream of becoming engineer fulfilled with passion of theater

वर्ल्ड थिएटर डे के मौके पर पढ़िए सिटी के तीन अलग-अलग प्रोफेशनल्स की कहानी। यह वो लोग हैं जो मुश्किल जॉब शैड्यूल को जीते हुए भी अपना समय रंगमंच को दे रहे हैं। हर साल 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है। सन 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट ने इसकी शुरूआत की थी। शहर के अभिजीत मिश्रा एक बैंक में असिस्टेंट मैनेजर है, डॉ लेखेश्वर यादव एम्स में जूनियर डॉक्टर है और प्रकाश भारती पुलिस में हेड कांस्टेबल हैं। पढ़िए इनकी कहानी... कैसे थिएटर है इनके लिए लेसन ऑफ लाइफ।

एम्स में पढ़ाई के बीच निकाला रंगमंच के लिए समय

डॉ लेखेश्वर यादव एम्स में एमडी की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल टाइम से ही ड्रामा करने का शौक था, पहली बार 10वीं क्लास में ड्रामा किया। थिएटर मेरा पैशन रहा है। इसके बाद पीएमटी की तैयारी के लिए भिलाई आ गया, जिसके कारण थिएटर कुछ समय के लिए छूट गया, 2009 में रायपुर मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया, जब भी कॉलेज में फंक्शन होते थे तो थिएटर एक्टिविटी में जरुर भाग लेता था। सुबह से शाम 5 बजे तक क्लास अटैंड करने के तुरंम बाद मैं ड्रामा क्लास के लिए भाग जाता था। इससे दिक्कत तो होती थी मगर सुकून भी मिलता। यूजी की पढ़ाई पूरी होने के बाद एम्स में जॉब के लिए इंटरव्यू दिया, थिएटर में हमे सीखाया गया था कि ऑडियंस के आंख में झांककर बात करना चाहिए, मैंने यह टेक्नीक इंटरव्यू में इस्तेमाल की। मेरा कॉन्फीडेंस इसी वजह बढ़ा और मेरा सलेक्शन हो गया। थिएटर को मैंने अपना समय दिया और इसने मेरी पर्सनैल्टी को बेहतर बनाया है।

पुलिस की ड्यूटी के बीच मन की शांति देते हैं नाटक

रायपुरा निवासी 43 साल के प्रकाश भारती पुलिस महकमे में हेड कांस्टेबल हैं। साल 1999 में वह ड्रामा जुड़े । तब यह सुना था कि फिल्मों में जाना है तो ड्रामा करना सीखो, सिनेमा का तो जुनून था ही, इसलिए नाटकों से जुड़ गए। साल 2002 में रायपुर में हुए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के वर्कशॉप में देश के 30 लोगों के साथ प्रकाश को भी ड्रामा के बारे में और कुछ जानने को मिला। प्रकाश ने बताया कि साल 2007 में मेरी नौकरी लग गई। 2015 तक ड्यूटी के बीच मैं ड्रामा नहीं कर पाया। इसका हमेशा मलाल रहता था। छुटि्टयां नहीं लेता था मगर नाटक देखाने जरुर जाता था। 2015 में मुझे रायपुर में पोस्टिंग मिली। अब नाटक और पुलिस की नौकरी दोनों पूरी ईमानदारी से कर रहा हूं। 50 से ज्यादा नाटक कर चुका हूं। थिएटर से मुझे मेंटली फिट रहने में मदद मिलती है, इसे पुलिस और आर्मी में भी शामिल करना चाहिए।

बचपन में जब डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट, प्रोफेसर, सुपरहीरो को देखता था, तो सोचता था बड़ा होकर यही बनूंगा। जिंदगी ने मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा था। अब ये सारे कैरेक्टर जीने का मौका मुझे थिएटर देता है। ये कहना है आईडीबीआई बैंक में 33 साल के अस्सिटेंट मैनेजर अभिजीत मिश्रा का। अभिजीत ने बताया कि इंजीनियरिंग के पढ़ाई के दौरान कॉलेज में थिएटर करने का मौका मिला, करियर बनाने के कारण थिएटर से ब्रेक लेना पड़ा। बेंगलूरू में पहली पोस्टिंग मिली। बेंगलूरू में वीकेंड थिएटर का प्रचलन है, वहां जाने लगा, थिएटर करने लगा, बैंक भी नॉनप्राफिट एक्टिविटी के लिए मनाही नहीं होती। रायपुर ट्रांसफर होने के बाद यहां के थिएटर के बारे में पता किया। डेली 7:30 बजे से लेकर रात 9:30 बजे तक ड्रामा करने का रिहर्सल करते है। थिएटर पर्सनॉल्टी डेवलमेंट का सबसे बेहतरीन तरीका है।

पेशे से हैं बैंकर, नाटकों को देते हैं पूरा समय, जीते हैं हर किरदार

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