बंद हो रहीं है हिंदी माध्यम की शालाएं क्योंकि परिजन चाहते हैं बच्चे अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई करें

News - जिले में खुलने वाली निजी शालाएं अब सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में ही बच्चों को शिक्षा दे रही हैं। पालकों का हिंदी...

Bhaskar News Network

Sep 14, 2019, 07:36 AM IST
Raipur News - chhattisgarh news schools of hindi medium are being closed because the family wants children to study only through english medium
जिले में खुलने वाली निजी शालाएं अब सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में ही बच्चों को शिक्षा दे रही हैं। पालकों का हिंदी माध्यम शालाओं की तरफ रुझान कम होता देख। निजी शालाओं के संचालक हिंदी मीडियम शाला शुरू करना तो दूर इसके बारे में सोच भी नहीं रहे। कई ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी माध्यम में शाला शुरू तो की, लेकिन जब बच्चों का प्रवेश ही नहीं मिला तो माध्यम बदलकर इसे अंग्रेजी कर दिया। भाषा के विकास और प्रचार के मकसद से हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। लेकिन हिंदी भाषा अब बच्चों के जीवन से गायब होती जा रही है। जिला शिक्षा अधिकारी जीआर चंद्राकर ने बताया कि नई निजी शालाओं की मान्यता के लिए आने वाले आवेदनों में अधिकांश अंग्रेजी माध्यम शाला के लिए ही होते हैं। जानकारी के मुताबिक जिले के धरसींवा शहर, आरंग, अभनपुर, तिल्दा विकासखंडों को मिलाकर 525 निजी शालाएं अंग्रेजी माध्यम की हैं। इन विकासखंडों में पिछले शिक्षण सत्र में केवल 4 नई निजी हिंदी शालाएं शुरू की गईं।

अभिभावकों का रुझान कम होता देख स्कूल संचालक भी हिंदी से अंग्रेजी की तरफ कर रहे रूख
केस-1

रायपुर के विजय चोपड़ा 4 निजी शालाओं के संचालन से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि मेरे स्कूल में कक्षा 1 से 8वीं तक शालाएं हिंदी माध्यम में लगा करती थीं। छात्रों के प्रवेश में आई गिरावट के चलते इसे बंद करना पड़ा। इसके बाद अंग्रेजी माध्यम में इन्हीं कक्षाओं में 4 गुना ज्यादा छात्र-छात्राओं का प्रवेश हुआ।

केस-2

एक कावेंट स्कूल चलाने वाले गोपाल खरे ने बताया कि निजी स्तर पर अब हिंदी माध्यम के नए स्कूल शुरू ही नहीं होते। हमारे यहां भी 8वीं तक हिंदी में पढ़ाई होती थी, लेकिन लोगों ने अपने बच्चों को प्रवेश दिलाना बंद कर दिया। हमसे परिजनों ने अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने की मांग की तो हमने भी उनकी सुनी।

केस-3

शासकीय शाला जेआर दानी के प्राचार्य विजय खंडेलवाल ने बताया कि यह एक अजीब सा चलन तेजी से बढ़ रहा है। हमारी भी समझ से परे है कि क्यों परिजन नहीं चाहते कि उनका बच्चा हिंदी माध्यम में पढ़ाई न करे। हमारे मिडिल स्कूल में छात्राओं की संख्या कभी 1300 हुई करती थी, यह घटकर अब 300 ही है।

अंग्रेजी में समझाना पड़ता है हिंदी शब्दों का मतलब

शिक्षाविद और स्कूल संचालक मुकेश शाह ने बताया कि परिजनों को लगता है उनका बच्चा यदि हिंदी माध्यम से पढ़ाई करेगा तो वक्त के साथ कदम मिलाकर शायद न चल पाए। भाषा के प्रति लगाव को इस उदाहरण से समझिए कि उनहत्तर, उन्यासी, नवासी जैसे हिंदी के अंकों का मतलब न सिर्फ बच्चों बल्कि बड़ों को भी अंग्रेजी में बताना पड़ता है। रायपुर शहर के ऐसे हिंदी माध्यम स्कूल जहां कभी बच्चों को पढ़ाना परिजनों का सपना हुआ करता था, आज उनमें से कई बंद हो चुके हैं या होने की कगार पर हैं।

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