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रांची में महफूज नहीं है बेटियों की आबरू, नहीं हो पाता जघन्य कांडों का खुलासा

3 वर्ष पहले
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रांची.  छोटे-बड़े अपराधियों के बढ़ते हौसले राजधानी की शांत फिजा में जहर घोल रहे हैं। रांची पुलिस अपराधियों पर लगाम लगाने में विफल रही है। राजधानी में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। राजधानी में अपराध का नया ट्रेंड शुरू हुआ है। पहले आबरू लूटी जाती है, फिर हत्या कर शव जला दिया जाता है, ताकि मृतका की पहचान नहीं हो। ताजा मामला है पुंदाग बस्ती में रहनेवाली कॉलेज छात्रा अफसाना परवीन का। छह अप्रैल से गायब अफसाना का जला शव लोहरदगा के कैरो में पाया जाता है। पुलिस रोज दावा करती है, कुकर्मियों के नजदीक पहुंचने का। एसआईटी का गठन होता है, पर नतीजा सिफर। अब लोगों का आक्रोश उबाल पर है।


वर्ष 2017 के जनवरी माह से लेकर इस साल अब तक 189 दुष्कर्म की वारदात हुई। यह आंकड़ा पुलिस फाइल में दर्ज है। दुष्कर्म के कई ऐसे मामले हैं, जिसमें पीड़िता लोकलाज के कारण खामोश हो जाती है।

 

वहीं कुछ मामले में पुलिस पीड़िता को थाने से भगा देती है। कुछ मामले महिला थाने में काउंसलिंग चल रहे हैं। कहने को स्कूल-कॉलेज के पास 40 महिला शक्ति कमांडो को तैनात किया गया है। 30 पीसीआर और 40 टाईगर मोबाइल धूल उड़ाती रहती हैं। छेड़खानी तो आम बात हो गई है। राजधानी में ऐसे कई रेस्टोरेंट खुल गए हैं, जहां छात्राओं को नशा का सेवन करते खुलेआम देखा जा सकता है।  


 अफसाना परवीन समेत शहर की अन्य बेटियों के साथ हुए हादसे को लेकर रोज सड़क पर कैंडल मार्च निकाला जा रहा है। 11 अप्रैल को रातू में 17 साल के एक नाबालिग दुष्कर्म के बाद नृशंस हत्या कर दी गई। उसकी लाश उसके घर के पास ही एक खंडहरनुमा मकान में मिली। चेहरा बड़ी बेदर्दी से पत्थर से कूच दिया गया था।

 

इससे पहले 23 मार्च को जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र में 18 साल की खुशबू केरकेट्टा को मौत के घाट उतार दिया गया। खुशबू कोकर तिरिल बस्ती की थी। इसी तरह बीते साल जो मामले चर्चित हुए थे, उसमें डोरंडा रहमत कालोनी में शाइस्ता हशमत की हत्या का था। यह घटना 12 जुलाई 2017 को घटी थी। वहीं 2 दिसंबर को डोरंडा मेंं ही जानकी देवी की गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। 

 

वर्कलोड के कारण शहर में नहीं रहना चाहते ज्यादातर थानेदार 
नाम नहीं छापने की शर्त पर शहर के कुछ थानेदारों ने बताया कि राजधानी में वर्क लोड बहुत है। इसलिए वे यहां पोस्टिंग नहीं चाहते हैं। काम करने का मौका नहीं मिल पाता। घर में भी ज्यादा समय नहीं दे पाते। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और देखभाल में पड़ता है। ज्यादातर थानेदार 1989 और 1994 बैच के हैं।

 

इस बैच के कुछ अफसर वर्तमान में सीआईडी, स्पेशल ब्रांच या फिर एसीबी में तैनात हैं। कुछ एसटीएफ में हैं। वहीं रोज रोज धरना, जुलूस, प्रदर्शन और वीवीआईपी मूवमेंट में ही दिन भर उलझी रहती है रांची पुलिस। अपराध रोकथाम को लेकर कोई गंभीर और ठोस पहल नहीं। पहले अपराधियों से निपटने के लिए टास्क फोर्स काम करती थी, अब कोई बड़ी वारदात के बाद बनाई जाती है एसआईटी। एसआईटी में भी दमखम नहीं है।

 

 

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