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चेतन भगत का काॅलम: जीडीपी को भी गाय जैसा महत्व मिलने लगा है!

प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने अच्छी आर्थिक वृद्धि दी है पर वह लोगों की अपेक्षाओं से कम है

Danik Bhaskar | Aug 29, 2018, 11:20 PM IST

इस हफ्ते खबरों में भारत के विभिन्न प्रधानमंत्रियों के तहत हुई जीडीपी वृद्धि की रोचक तुलना की गई थी। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ने जीडीपी आकलन के तरीके में संशोधन के ठीक बाद यह तुलना आई। इससे यूपीए शासन में हुई जीडीपी वृद्धि में ऊपर की ओर संशोधन हुआ।उसके बाद कुछ आश्चर्यजनक हुआ। आधुनिक भारत में जहां गायें सुर्खियों में अग्रणी रही हैं शायद पहली बार जीडीपी वृद्धि भी तीखी बहस का राजनीतिक मुद्‌दा बन गई। यह निश्चित ही उन कुछ लोगों के लिए ताज़गी देने वाली बात है, जिनके लिए अर्थव्यवस्था अन्य सब चीजों से ऊपर है। फिर सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया। कांग्रेस और भाजपा के प्रशंसक गुत्थमगुत्था हो गए, इस बार वे गाय जैसे विषयों पर नहीं, जीडीपी पर बहस कर रहे थे! मेरे लिए राष्ट्र की यह बहुत बड़ी प्रगति है।


जीडीपी बहस की दलीलों के कई रंग थे। मेरी जीडीपी आपसे बेहतर, आपका डेटा संदिग्ध है, आप तो बस लकी हैं, हमने उस वृद्धि की नींव रखी, जिसका आप लुत्फ ले रहे हैं और आखिर में ‘वैसे भी जीडीपी की किसे परवाह है?’ आइए, आखिरी दलील पर बात करें कि क्या जीडीपी अथवा जीडीपी वृद्धि का महत्व है? इसका जवाब बहुत बड़ा ‘हां’ है! हालांकि आकलन में बहुत टेक्नीकल होने के बाद भी यह देश में उत्पादित माल और दी जा रही सारी सेवाओं का पैमाना है। यह देश की आर्थिक गतिविधियों और कुल आय का पैमाना है। यह परफेक्ट पैमाना नहीं है जैसे यह असमानता का आकलन नहीं करता। लेकिन, जीडीपी का उपयोग प्रतिव्यक्ति आय की गणना करने में होता है, जो समाज में जीवनस्तर का मजबूत संकेतक है। जिस दिन हमारा प्रतिव्यक्ति जीडीपी यूरोप के देशों और अमेरिका के बराबर हो जाएगा, हमें भी विकसित राष्ट्र माना जाएगा। इसलिए इसकी सीमाओं और इससे नफरत करने वालों के बावजूद जीडीपी और जीडीपी वृद्धि अत्यधिक महत्वपूर्ण पैमाने हैं। उतने ही महत्वपूर्ण जितनी गायें (ठीक है दोस्त, यह जोक था)।


खैर, विभिन्न प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में हुई जीडीपी वृद्धि का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है? खेद की बात है कि उदारीकरण के पूर्व के प्रधानमंत्री नेहरू और इंदिरा गांधी के वक्त केवल 4.1 फीसदी की औसत जीडीपी वृद्धि दर देखी गई। जिन नरसिंह राव के तहत 1991 के आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी, वे भी 5.1 फीसदी वृद्धि ही ला सके। अटल बिहारी वाजपेयी को कई लोग महान प्रशासक मानते हैं पर उनका औसत भी केवल 5.7 फीसदी ही रहा। उच्च वृद्धि दर के संदर्भ में दो ही प्रधानमंत्री ठहरते हैं। एक मनमोहन सिंह, जिन्होंने एक दशक तक 8 फीसदी की ऊंची औसत वृद्धि दी- यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। दूसरे मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी हैं, जिनका पांच साल में औसत करीब 7.3 फीसदी रहा। यह वाजिब आंकड़ा है, चाहे यह मनमोहन सिंह और 2014 की अपेक्षाओं से कम क्यों न हो। विशेषज्ञों ने कारणों की व्याख्या की है।


सरकार का फोकस आर्थिक वृद्धि पर नहीं, टैक्स सुधारों पर प्रतीत होता है। नोटबंदी और जीएसटी दोनों का इरादा लोगों को नियमों का पालन कराने से था पर दोनों आर्थिक वृद्धि में सुस्ती की कीमत पर हुए। यह ऐसी गली की तरह था, जिसमें अवैध फूड हॉकरों की भरमार हो। उनका बिज़नेस जोरदार चलता हो। अब अचानक आप नियम लागू करके उन्हें उचित लाइसेंस लेने को कहें तो कुल बिज़नेस कुछ समय के लिए थोड़ा धीमा पड़ जाएगा, नहीं? उस आधार पर 0.7 फीसदी कम वृद्धि (7.3 बनाम 8 फीसदी) कोई बुरी नहीं है। वित्तमंत्री ने कहा है कि यूपीए वृद्धि भी सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों द्वारा दिए गए अंधाधुंध कर्ज के कारण हुई थी। इन बैंकों ने खराब प्रोजेक्ट पर पैसा फूंक दिया। इसके कारण वृद्धि हुई, क्योंकि पैसा खर्च हुआ था। लेकिन, बदले में कुछ मिला नहीं। इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि अंधाधुंध कर्ज देना थमा है अथवा नहीं।


संभव है मौजूदा शासन की वृद्धि यूपीए की तुलना में उतनी बुरी नहीं हो- 0.7 फीसदी का फर्क ज्यादा नहीं है और वैसे भी इसे नापने के तौर-तरीकों पर सवाल उठे थे। मौजूदा सरकार ने इस मायने में कमजोर प्रदर्शन किया कि उससे वृद्धि में एकदम तेजी लाने की अपेक्षा थी- यूपीए की तुलना में कहीं ज्यादा। ये अपेक्षाएं अनूठी परिस्थितियों से पैदा हुई थीं- जबर्दस्त जनादेश, प्रधानमंत्री की गुजरात की उद्यमी मानसिकता, भ्रष्टाचार में कमी और ‘विकास’ का प्लेटफॉर्म जिसके बल पर भाजपा सत्ता में आई थी। इन अपेक्षाओं की कसौटी पर तो वृद्धि निश्चित ही कम हुई है। क्या वाकई राजनीतिक स्तर पर इसका महत्व है? कुछ हद तक हां। यह दो मुख्य कारणों से है। एक, जीडीपी वृद्धि अंतत: जमीन पर वास्तविक ज़िंदगी में दिखाई देती है। ऊंची वृद्धि दर अधिक नौकरियों और ऊंचे वेतन की ओर ले जाती है। मौजूदा शासन में जिन्हें यह दिखाई नहीं देता वे थोड़ा हताश हुए हैं। भाजपा को ऊंची वृद्धि दर देने का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण कारण बुद्धिजीवियों के एक वर्ग और उच्च स्तर के मीडिया का समर्थन हासिल करना है, जो परम्परागत रूप से इसे कभी नहीं मिलता। इसने भाजपा का तो लगभग बहिष्कार ही कर दिया है। अंग्रेजी के समाजवादी-उदार पक्षपाती मीडिया में मोदी की प्रशंसा करने से आप बहिष्कृत ही हो जाएंगे। इसलिए भाजपा इस छोटे लेकिन प्रभावशाली, स्मार्ट और अपेक्षाएं रखने वाले वर्ग का समर्थन तभी पा सकती है जब वह अर्थव्यवस्था के स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करे। इसलिए चाहे 7.4 फीसदी खराब नहीं है, यूपीए के 8 फीसदी की तुलना में स्पष्ट 9 फीसदी भाजपा को मजबूत बढ़त दे देती। यह अब भी किया जा सकता है।


भाजपा को निगरानी रखने से अपना ध्यान बदलकर चीजें अपने ढंग से होने देना चाहिए। कंट्रोल छोड़े और बिज़नेस करने के नियम सरल बनाएं। बिज़नेस नीतियों में निरंतरता हो और हस्तक्षेप बंद कर दिया जाए तो वृद्धि में उछाल आ सकता है। इससे नागरिकों को जीवन स्तर सुधारने में मदद मिलेगी। लोगों को भरोसा आएगा कि भाजपा का शासन बेहतर है और आखिर में भाजपा को अंग्रेजी मीडिया में भी थोड़ा समर्थन मिल जाएगा। इस बीच, जहां मनमोहन सिंह को सर्वाधिक जीडीपी वाले प्रधानमंत्री होने का जश्न मनाना चाहिए, हम भी किसी और चीज का जश्न मनाएं- वह यह कि जीडीपी को भी उतना ही महत्व मिलने लगा है, जितना गायों को।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)