शेखर गुप्ता

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शेखर गुप्ता का कॉलम: शहरी नक्सलवादी भाजपा के लिए उपयोगी मूर्ख

कोई नहीं जानता कि ‘उपयोगी मूर्ख’ यह जुमला किसने गढ़ा।

Danik Bhaskar

Sep 04, 2018, 08:50 AM IST

कोई नहीं जानता कि ‘उपयोगी मूर्ख’ यह जुमला किसने गढ़ा। लेनिन को इसका श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने उदारवादी गैर-साम्यवादियों के लिए इसका इस्तेमाल किया था, जो उनके प्रवक्ता बन गए थे। अमेरिकी लेखक विलियम सफायर ने कहा कि उन्हें इससे लेनिन का कोई संबंध नहीं मिला। भारत में हिंदुत्व मुहिम के समर्थक बुद्धिजीवी दो दशकों से इसका इस्तेमाल वामपंथी रुझान वाले उदार शहरी बुद्धिजीवियों के लिए कर रहे हैं। इन्हें ‘शहरी नक्सली’ नाम देने के मौजूदा प्रोजेक्ट को सीमित सफलता ही मिली है।


वे शहरी नक्सली है या नहीं लेकिन, सबूत यही उभर रहे हैं कि भाजपा/ आरएसएस शायद उन्हें उपयोगी मूर्ख ठीक ही कह रहे हैं। शहरी या ग्रामीण जैसी कोई बात नहीं होती। नक्सली, नक्सली होता है और माओवादी भी। दोनों में से कुछ भी होना आपराधिक नहीं है। आप कह सकते हैं कि भारत ने कश्मीर पर अवैध कब्जा कर रखा है या यह कि लोकतंत्र एक सवर्ण षड्यंत्र है। क्या सरकार आपको जेल में बंद कर सकती है? नहीं। भाजपा की समस्या अलग है। वह दावा चाहे जो करे पर ‘ग्रोथ एंड ग्लोरी’ के एजेंडे पर उसे बी प्लस ग्रेड ही मिलेगी। अब उसे ‘कोई’ चाहिए, वाकई खतरनाक ताकि लोग नाकामियां भूलकर राष्ट्र की खातिर उसे वोट दें। राजीव गांधी के 1984 के इस नारे की तरह, ‘राजीव गांधी का एलान, नहीं बनेगा खालिस्तान’। मुस्लिमों को शत्रु बताने वाला मूल फॉर्मूला घिस चुका है। यह तभी संभव होता है जब एक तो मुस्लिम यानी पाकिस्तानी यानी कश्मीरी पृथकतावादी यानी आतंकी यानी लश्कर/अल कायदा/आईएसआईएस वाला समीकरण टिकता, पर ऐसा लगता नहीं। आंशिक रूप से इसलिए कि भारतीय मुख्य भूमि के मुस्लिम शांत रहे हैं। दो, सारे हिंदू मुस्लिमों से इतने भयभीत नहीं हैं कि पहचान के अन्य कारकों खासतौर पर जाति की अनदेखी कर दें। तीन, तनाव बनाए रखने के लिए नियंत्रण-रेखा पर लगातार गोलीबारी जरूरी है, जिसमें मेगा सर्जिकल स्ट्राइक का ग्रैंड फाइनल हो। चीन ने जता दिया है कि वह अपने मित्र के खिलाफ किसी कार्रवाई की अनदेखी नहीं करेगा। ट्रम्प के अमेरिका पर तो कोई भरोसा नहीं कर सकता।
इसलिए भारत के वजूद के लिए खतरा बना कोई नया शत्रु खोजना होगा। वैश्विक व आंतरिक, सारी दुष्ट शक्तियां भारत को नष्ट करने की साजिश में लगी हैं और आपको नौकरियों की पड़ी है? आपकी देशभक्ति कहां गई? आप इसे किसी भी वाद का नाम दें लेकिन, जो हो रहा है वह विशुद्ध राजनीति है। क्या भाजपा/आरएसएस धर्म का इस्तेमाल उसे एकजुट करने में कर सकते हैं, जिसे जाति ने विभाजित किया है? आडवाणी ने अयोध्या से यह हासिल किया। लेकिन, 2004 में उसका असर खत्म हो गया। नरेन्द्र मोदी ने बेहतर किया। उनका व्यक्तिगत रिकॉर्ड हिंदू वोटर के लिए चुंबक साबित हुआ। इसमें मजबूत सरकार और आर्थिक वृद्धि के जुड़वां वादे जुड़ते ही विपक्ष का सफाया हो गया। अब वे बी प्लस रिपोर्ट कार्ड लेकर वोटर के पास जाने का जोखिम नहीं ले सकते। यदि मुस्लिम में माओवादी जोड़ दो तो टुकड़े-टुकड़े धागा बहुत अच्छी तरह बुना जा सकेगा। 2019 की गर्मियों के आने तक तो ‘राष्ट्र गंभीर खतरे में है’ जैसी कहानी सामने आ सकती है। सिर्फ माओवादी का भय पैदा करने की अपनी सीमा है। हमने कई माओवादी देखे हैं जो कॉलेजों में बिल्कुल निरापद लगते थे। नक्सली ज्यादा खतरनाक लगते हैं, क्योंकि उनके पास शस्त्र होते हैं। लेकिन वे नज़र और मन के दायरे के बाहर हैं। टीवी के परदे, ट्विटर पर भी नहीं हैं। उनके नाम से महाराष्ट्र या मध्यप्रदेश में आप एक वोटर को भी नहीं डरा सकते। यहीं पर शहरी नक्सली आते हैं।
इस फिल्म को पीछे चलाएं और यह टुकड़े-टुकड़े सामग्री सबसे पहले जेएनयू में उभरती है। कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता दिखाने का एक आयोजन था। पहले ऐसे पर्चे आए कि यह कश्मीर की आजादी पर बहस करने और उसे समर्थन देने का आयोजन है। फिर वीडियो आया ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह।’ दो वामपंथी और एक मुस्लिम छात्र को देशद्रोह के फर्जी मामलों में आरोपी बनाया गया। और वीडियो आए। जेएनयू चौक पर आजादी की कश्मीरी मांग के औचित्य को सिद्ध करती प्रोफेसर व तालियां बजाते छात्र। नई पटकथा तैयार थी। ‘शहरी नक्सली’ और पृथकतावादी मुस्लिम कश्मीर व बस्तर के दूर के खतरे को नई दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई और पुणे लाने के लिए हाथ मिला रहे हैं। जेएनयू तो ‘विलेन का अड्‌डा’ है। कश्मीरी पृथकतावादियों से सुर मिलाकर कट्टर वाम बुद्धिजीवियों ने आधा काम कर दिया और शेष मोदी और शाह ने मित्र टीवी चैनलों के साथ मिलकर कर दिया। राष्ट्र खतरे में है का नया मिथक उभर रहा है। भारत चीनी मिट्‌टी का नहीं बना है कि नारों, लेखों, कविता और भीतर के भागों व कश्मीर में बंदूक लिए मुट्‌ठीभर लोगों से टूट जाएगा। लेकिन, जो वोटर किसी पक्ष से जुड़े नहीं हैं, उन्हें इसमें रुचि हो सकती है। ध्रुवीकृत वातावरण में कुछ प्रतिशत मतों का झुकाव बहुत अहम होता है।
सशस्त्र नक्सलवाद और कश्मीर में जनमत संग्रह के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का बचाव करना एक बात है। आप जिसके लिए बोलने का दावा करते हैं वे बंदूकों का इस्तेमाल करते हैं, मारते और मरते हैं। फिर आप अमेरिका में दोषी सिद्ध पाकिस्तानी-कश्मीरी-आईएसआई के गुर्गे (गुलाम नबी फई) की मेजबानी स्वीकारते हैं और उसे कश्मीरी देशभक्त बताते हैं। इससे सरकार को हर कश्मीरी को देशद्रोही बताने की सहूलियत मिल जाती है। अथवा शायद आप सोचें की जिलेटिन की 20 छड़ों व पांच फ्यूज से क्रांति लाई जा सकती है।
वैश्विक वामपंथ को विश्वास है कि कट्‌टरपंथी इस्लाम अमेरिकी साम्राज्यवाद व अन्य ऐसी बुराइयों से लड़ेगा और उसे खत्म कर देगा जिसमें सोवियत रूस नाकाम रहा। रूमानी लोग इसे भारत में दोहरा रहे हैं। आपके हथियार उठाते ही सरकार को आपको मारने का औचित्य मिल जाता है। वह जीतेगी, क्योंकि जनमत उसके साथ होगा। आपको अदालतों से उचित ही राहत मिलेगी। मोदी सरकार निश्चित ही कानूनी और नैतिक रूप से यह दौर हार जाएगी। लेकिन, वह परवाह नहीं करेगी। आप ही सोचें कि आपकी 15 मिनट की ख्याति और क्रांति-रोमांस से किसे फायदा मिल रहा है। उनके लिए आप उपयोगी मूर्ख हैं, वामपंथ के लिए नहीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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