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भास्कर संपादकीय: क्यों हमारे जनप्रतिनिधियों को चाहिए आचार संहिता?

उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के सुझावों को तभी लागू किया जा सकता है जब हम श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण करें।

Dainik Bhaskar

Sep 04, 2018, 12:05 AM IST
dainik bhaskar editorial on achar sanhita
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अपनी पुस्तक ‘मूविंग फारवर्डः ए ईयर इन ऑफिस’ के विमोचन के मौके पर सांसदों-विधायकों के लिए आचार संहिता बनाने का जो सुझाव दिया है वह सर्वथा उचित है लेकिन, सवाल यह उठता है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधी कैसे जाएगी। सांसद-विधायक अपने को ही कानून समझते हैं इसलिए अगर संसद या विधानसभा के भीतर उनका आचरण अपनी पार्टी के नेताओं के हितों से संचालित होता है तो बाहर वह निहित स्वार्थ से। इन दोनों स्वार्थों के बीच हमारे सांसद-विधायक आचरण में यह भूल जाते हैं कि उनका उद्‌देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून के राज के भीतर जनता की सेवा करना है। उनके सामने आचार्य नरेंद्र देव जैसे उन संत राजनेताओं के आदर्श नहीं होते, जिन्होंने चुनाव हारना कबूल किया लेकिन, उन्हें मंदिर के आगे माथा टेकना गंवारा नहीं था। उन्होंने जब पार्टी बदली तो तुंरत विधानसभा से भी इस्तीफा दिया। राज्यसभा के सभापति नायडू चाहते हैं कि पार्टी बदलने वाले सांसद पर तीन महीने के भीतर दल-बदल कानून के तहत फैसला हो और अदालतों में राजनेताओं पर चलने वाले आपराधिक मामलों पर समय सीमा के भीतर फैसला हो। ये सारी स्थितियां तभी पैदा हो सकती हैं जब हर पार्टी के शीर्षस्थ नेता और विशेषकर सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ठ नेता श्रेष्ठ नैतिक आचरण प्रस्तुत करें और यह कोशिश करें कि उनके किसी वक्तव्य और आचरण से संविधान और लोकतंत्र की गरिमा आहत न हो। अगर हमारे राजनेता चुनाव जीतने के लिए जाति और धर्म की भावनाएं अनुचित ढंग से न भड़काएं और जीतने के बाद किसी मतदाता का अनुचित काम करने से मना करें और उचित काम को किसी भी कीमत पर रुकने न दें तो लोकतंत्र बेहतर बन सकता है। उस मौके पर कही गई प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी भी मौजूं है कि आजकल लोगों में अनुशासन नहीं है और अनुशासन की बात को लोग अधिनायकवाद की संज्ञा देते हैं। निश्चित तौर पर स्वराज का मतलब हर नागरिक द्वारा अपने को अनुशासित करने से होता है। वह स्थिति नागरिकों को उसके अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने से आएगी और उसके लिए बल प्रयोग से ज्यादा अंतःकरण को जगाने की जरूरत है। उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के सुझावों को तभी लागू किया जा सकता है जब हम श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण करें।

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