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भास्कर संपादकीय: संघ के मंच से राहुल गांधी के संवाद पर है देश की नजर

राहुल गांधी ने अपने यूरोपीय दौरे में आरएसएस की तुलना मिस्र के विवादित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से करके खलबली मचाई है।

Dainik Bhaskar

Aug 28, 2018, 11:33 PM IST
dainik bhaskar editorial on indian politics

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने यूरोपीय दौरे में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तुलना मिस्र के विवादित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से करके खलबली मचाई है। उसी का परिणाम है कि संघ उन्हें आगामी 17 सितंबर से 19 सितंबर के बीच भारत के भविष्य पर होने वाले सम्मेलन में आमंत्रित करना चाहता है। हालांकि, अभी तक आमंत्रित नहीं किया गया है। इसी के साथ संघ के पदाधिकारी अरुण कुमार के उस बयान पर भी बहस शुरू हो गई है कि जो भारत को नहीं जानते, वे संघ को क्या समझेंगे। राहुल गांधी ने संघ की तुलना जिस संगठन से की है, वह भी लगभग उसी समय गठित हुआ था जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बना था। भारतीय राजनीति मिस्र की राजनीति से अलग है। भारत की प्राचीन परंपरा मिस्र की प्राचीन परंपरा से भिन्न रही है। इसे समझने और समझाने का प्रयास न तो किसी एक व्याख्यान में हो सकता है और न ही फेसबुक और व्हाट्सएप की बहसों में संभव है। टीवी चैनलों और विभिन्न संगठनों के विचारकों की तीखी बहसों में भी वह संभव नहीं है।

भारत का विचार क्या है, इसका एक स्वीकार्य रूप स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में प्रकट हुआ था, जिसे विभाजन की त्रासदी और बाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विमर्श ने काफी कमजोर कर दिया। इसके बावजूद अगर राहुल गांधी महात्मा गांधी के हिंद स्वराज और नेहरू के डिस्कवरी ऑफ इंडिया के माध्यम से भारत के विचार की व्याख्या करना और उसे स्वीकार्य करवाना चाहते हैं तो उन्हें उसे लेकर संघ के कार्यक्रम में जाना चाहिए और अपनी बात रखनी चाहिए। ऐसा हुआ तो पूरा देश उन्हें देखेगा। संवाद और सतत संवाद भारतीय संस्कृति का प्रधान गुण रहा है। भारत का भविष्य संवाद करते रहने और उदारता विकसित करने में है। संघ के मंच से ही पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संवाद की नई शुरुआत की थी। संघ और राहुल गांधी को यह अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि एक-दो चुनावों और एक-दो भाषणों से भारत के विचार का निर्धारण नहीं होना है। भारत एक लघु विश्व है, जहां तमाम जातियां, संस्कृतियां और धर्म मिलकर रहने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। इसलिए भारत का विचार अगर डूबेगा तो दुनिया भी सभ्यताओं के संघर्ष में विनष्ट हो जाएगी।

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