संपादकीय

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भास्कर संपादकीय: हिंदुत्व की मदद के लिए समाजवादी सेक्युलर मोर्चा

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के भीतर फिर कलह शुरू हो गई है और जाहिर है इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा।

Danik Bhaskar

Aug 30, 2018, 11:30 PM IST

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के भीतर फिर कलह शुरू हो गई है और जाहिर है इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा। अपने भतीजे अखिलेश यादव पर अपमान और उपेक्षा का आरोप लगाते हुए शिवपाल यादव ने अमर सिंह की सलाह पर जिस तरह से समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाया है और उसे समाजवादी पार्टी के भीतर ही सक्रिय रखने और उपेक्षित कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का संकल्प जताया है, उससे न तो समाजवाद को मदद मिलने वाली है और न ही सेक्युलर विचारों को। यह सेक्लूयर मोर्चा सपा और बसपा के बीच होने वाले गठबंधन को कमजोर करने और लोगों का ध्यान उसकी ताकत से हटाकर कमजोरी की ओर खींचने के लिए है। यही कारण है कि शिवपाल ने पहले अमर सिंह और फिर योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर व अन्य दो मंत्रियों से मिलकर इस संगठन का एलान किया है।

शिवपाल अच्छी सांगठनिक क्षमता के धनी हैं और उन्होंने मुलायम सिंह के बुरे दिनों में पार्टी को खड़ा करने और उसे 2012 में विजय दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन मुख्यमंत्री न बनाए जाने की टीस उनके भीतर आखिर तक रही और 2017 चुनाव से पहले उनके और अखिलेश के बीच इतनी बुरी लड़ाई छिड़ी कि पार्टी चुनाव ही हार गई। अब जब अखिलेश गोरखपुर, फूलपुर और कैराना उपचुनावों के सफल प्रयोग से उत्साहित होकर भाजपा को हराने के लिए गठबंधन बनाने और व्यापक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करने में लगे हैं तो शिवपाल का अलगाव उन्हें और गठबंधन को भारी पड़ सकता है। शिवपाल सिंह का मौजूदा मोर्चा कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की तर्ज पर जरूर बना है लेकिन, उसका विचारों से कोई लेना-देना नहीं है। वह शुद्ध सत्ता का खेल है और इसके पीछे अखिलेश से अपने अपमान का बदला लेने के साथ भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर मदद पहुंचाना है। भाजपा मुख्यमंत्रियों की दिल्ली में बैठक के तत्काल बाद यह एलान स्पष्ट करता है कि इसके पीछे सिर्फ शिवपाल सिंह यादव की नाराजगी ही नहीं है बल्कि भाजपा की चुनावी संभावनाओं को होने वाले नुकसान को कम करने की योजना भी है। 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश जहां से पिछली बार भाजपा को 71 सीटें मिली थीं, किसी भी पार्टी को केंद्र में सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए सपा के भीतर शुरू हुई यह संघर्ष यादवी युद्ध न होकर पानीपत की नई लड़ाई है जिसके परिणाम गहरे हैं।

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