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​भास्कर संपादकीय : जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक राज्यपाल से अपेक्षाए / ​भास्कर संपादकीय : जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक राज्यपाल से अपेक्षाए

Bhaskar News

Aug 22, 2018, 11:13 PM IST

कश्मीर में लंबे समय बाद किसी पूर्व राजनेता को राज्यपाल के पद पर बिठाया गया है।

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विभिन्न दलों में लंबा राजनीतिक जीवन गुजार चुके सत्यपाल मलिक को जम्मू -कश्मीर का राज्यपाल बनाए जाने का निर्णय कुछ वैसा ही है जैसा 1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार द्वारा अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनाया जाना था। भले यह पूरे विश्वास से न कहा जा सके कि अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में मोदी सरकार कश्मीर में पंजाब के राजीव-लोंगोवाल जैसा कोई समझौता करने में कामयाब होगी लेकिन, उस दिशा में प्रयास होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता। कश्मीर में लंबे समय बाद किसी पूर्व राजनेता को राज्यपाल के पद पर बिठाया गया है।


समाजवादी पृष्ठभूमि से जुड़े सत्यपाल मलिक ने चौधरी चरण सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेताओं के साथ राजनीतिक सफर तय किया है और वे मूल रूप से आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले राजनेता नहीं है। भाजपा में उनका आगमन 2004 में हुआ और अभी वे बिहार के राज्यपाल का कार्यभार संभाल रहे थे। मलिक विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री थे और उसके नाते तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनके सहयोगियों से उनके अच्छे संबंध रहे हैं। उनकी इस राजनीतिक पूंजी का इस्तेमाल वार्ताएं करने और विभिन्न क्षेत्रों में विकास संबंधी असंतुलन को दूर करने की नीति बनाने में किया जा सकेगा। मौजूदा केंद्र सरकार की चिंता में जम्मू, घाटी और लद्‌दाख के बीच क्षेत्रीय असंतुलन प्रमुख मुद्‌दा है। सरकार अनुच्छेद 35 ए और 370 के बारे में भी कश्मकश में है।
एक तरफ घाटी में इसे खत्म किए जाने का जबर्दस्त विरोध है तो दूसरी ओर जम्मू और दूसरे इलाकों में इसके बारे में अलग राय है। पिछले राज्यपाल एनएन वोहरा ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर कहा भी था कि इस मसले पर कोई फैसला तभी लिया जा सकता है जब राज्य में चुनी हुई सरकार हो। पाकिस्तान में इमरान खान के नेतृत्व में सेना समर्थित नई सरकार के आने के बाद भारत सरकार में वार्ता की नई उम्मीदें जगी हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए भाषण में भी कश्मीर में गाली और गोली छोड़कर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत की नीतियां अपनाने की बात की थी। शायद यह भी एक वजह है कि कश्मीर में अलगाववादियों और विभिन्न राजनीतिक दलों से संवाद के लिए एक अनुभवी राजनीतिज्ञ को राज्यपाल बनाया गया है।

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