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​भास्कर संपादकीय: विचारों की लड़ाई में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं

महाराष्ट्र पुलिस ने मंगलवार को देशव्यापी छापे में जिन पांच वामपंथी बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार किया है।

Danik Bhaskar | Aug 29, 2018, 11:25 PM IST

महाराष्ट्र पुलिस ने मंगलवार को देशव्यापी छापे में जिन पांच वामपंथी बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार किया है अगर वे सचमुच प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश करने में शामिल थे तो उन्हें कठोरता पूर्वक दंडित किया जाना चाहिए। इसके विपरीत अगर यह कार्रवाई चुनाव से पहले किसी तरह की राजनीतिक सनसनी फैलाने और उसका लाभ लेने के लिए की गई है तो इसके विरुद्ध देश के विपक्षी दलों और संवैधानिक संस्थाओं को एकजुट होकर संविधान में प्रदत्त मानवाधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहिए।


लोकतंत्र में वैचारिक संघर्ष की असीमित संभावना है लेकिन, हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं है। लोकतंत्र नागरिकों को अभय बनाता है और अभय का अर्थ सिर्फ यही नहीं होता कि आप किसी से न डरें बल्कि यह भी होता है कि आपसे कोई न डरे। साल के पहले दिन पुणे के भीमा कोरेगांव में महार सैनिकों के बलिदान की स्मृति में दलित संगठनों द्वारा लंबे समय से कार्यक्रम आयोजित होता रहा है। इस साल उसके दो सौ साल होने पर येल्गार परिषद की ओर होने वाला वह आयोजन कुछ विशिष्ट हो गया था। उसके आयोजकों में देश के आंबेडकरवादी, गांधीवादी, समाजवादी और वामपंथी संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता शामिल थे और उनका घोषित उद्‌देश्य संविधान बचाना था। संभव है उसमें कुछ अतिवामपंथी लोग भी रहे हों।

ऐतिहासिक रूप से विवाद का विषय होने के बावजूद उस पूरे आयोजन को माओवादियों का आयोजन बता देना दलित अस्मिता या राष्ट्रवाद की राजनीति को एक ही रंग में रंग देने की ज्यादती है। दलित समाज जैसे-जैसे शिक्षित-संपन्न हो रहा है वैसे-वैसे वह अपना एक राष्ट्रीय आख्यान रच रहा है। उसमें शिवाजी का सम्मान भी है और कहीं अंग्रेजों के साथ मिलकर सवर्ण समाज को चुनौती देने की कथा भी। इसमें शामिल होने वाली उग्रता वैसी नहीं है जैसी महाराष्ट्र और कर्नाटक में सक्रिय दक्षिणपंथी संगठन की गतिविधियां, न ही दलित आंदोलन नक्सली आंदोलन है। दलित आंदोलन से भयभीत समाज को यह समझना होगा कि उनके सबसे बड़े नेता डॉ भीमराव आंबेडकर हैं और वे उनके संविधानवादी रास्ते से अलग नहीं हट सकते। आंबेडकरवादियों को देखना होगा कि बाबा साहेब ने आखिर में अहिंसा के प्रवर्तक भगवान बुध्द की शरण ली थी। इसलिए देश का लोकतंत्र न तो उग्र दक्षिणपंथ से चल सकता है और न ही उग्र वामपंथ से। उसके लिए बीच का रास्ता ही उपयुक्त है।