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सात सौ वर्ष पहले अनंत महाराज की भक्ति से प्रसन्न हो अवतरित हुई थी दक्षिणेश्वरी भवानी

6 महीने पहले
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वसंतीय नवरात्र के तीसरे दिन कोरोना वायरस से बचाव के लिए लाॅक डाउन(एक तरह की कफ्र्यू) किया गया है। जिसमें अनुमंडल के सभी मंदिर को भी बंद किया गया है। मां की दर्शन में कोई परेशानी भक्तों को न हो इसलिए दैनिक भास्कर अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन एक प्रसिद्ध मां के मंदिर की दर्शन करा रहा है। जिसके तीसरे दिन अमसारी गांव में स्थित मां दक्षिणेश्वरी भवानी की तस्वीर व महिमा से रू-ब-रू करा रहा है। नवरात्र में शक्ति की देवी की अराधना हर कोई करता है। वैसे भी डुमरांव में कई ऐसे देवी मंदिर है जो मनोकामना पूर्ण करने के लिए विख्यात है। लेकिन अनुमंडल मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर डुमरांव बिक्रमगंज पथ के किनारे अमसारी गांव के पास स्थित दक्षिणेश्वरी भवानी की मान्यता काफी अनोखी है। मंदिर के पास से गुजरने वाले लोग भी यदि सच्चे मन से कोई प्रार्थना करें तो मां दक्षिणेश्वरी उसे सुन लेती है तथा जरूर पूरा करती है ऐसा विश्वास इलाके के लोगों को है। इस मंदिर के स्थापना की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है तथा मंदिर व मां काली के साथ उनके अनन्य भक्त अमसारी के अनंत पाठक उर्फ अनंत महाराज की भक्ति भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि करीब छह से सात सौ साल पहले अनंत महाराज की भक्ति से प्रसन्न होकर मां भवानी ने इस जगह पर नीम के पेड़ के रूप में अवतार लिया था तब से आज तक इनकी पूजा की जाती है तथा भवानी भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती है।

चमत्कार दिखाने पर राज परिवार द्वारा दान किया गया था जमीन


अमसारी के शिवजी पाठक, अरैला के घनश्याम पाठक आदि ने बताया कि राज परिवार में पूजा पाठ करने के दौरान एक बार अनंत महाराज ने भूलवश एकम तिथि को दूज बता दिया गया। तब पंडितों ने पत्रा के आधार पर उनकी बात को काट दिया था। पंडितों के तर्क सुन तत्कालीन महाराज द्वारा दूज होने का प्रमाण देने की बात अनंत जी से कही गई। कहा जाता है कि तब अनंत जी ने मां काली से प्रतिष्ठा बचाने की याचना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न हो मां ने देर शाम महाराज को आकाश में अपनी हसली की चमक से थोड़ी देर के लिए चांद का आभास कराया था। इसी से प्रसन्न होकर महाराजा द्वारा अनंत जी को 52 बीघा जमीन दान किया गया था। शिक्षक व शोध छात्र दुर्गेश कुमार सिंह ने भी इस बात की पुष्टि की है तथा बताया कि राज परिवार द्वारा दान किये गये जमीन के ठीक बीच मां दक्षिणेश्वरी का मंदिर है।


अगले दिन सुबह उग आया था नीम का पेड़


सुबह में जब अनंत महाराज उक्त जगह पर गये तो वहा नीम का पेड़ उग आया था। शाम होते होते गांव सहित आस पास के क्षेत्रों में यह बात फैल गई थी कि भलुनी भवानी मां ने नीम के पेड़ में अवतार लिया था। बस श्रद्धालुओं द्वारा पूजा अर्चना शुरू कर दी गई। कालांतर में नीम का पेड़ आंधी में टूट गया। तब ग्रामीणों के सहयोग से उस नीम के पेड़ के शेष बचे तने को सिमेंट का कवर चढ़ा सुरक्षित कर दिया गया तथा वहा भव्य मंदिर बना मां काली की मूर्ति की स्थापना की गई। आज उस मंदिर में मां काली के साथ सिद्धेश्वरी भवानी तथा सूर्यदेव की मूर्तियां स्थापित है। मंदिर के ठीक समाने एक तालाब भी है जो मंदिर की छंटा को कई गुना बढ़ा देता है। नवरात्र सहित पूरे साल वहा श्रद्धालुओं का तांता लगता है।


मां में है अटूट आस्था : मां दक्षिणेश्वरी भवानी मंदिर के प्रति अमसारी सहित आस पास के नोनियाडेरा, अरैला, मंुगाव, काेंपवा सहित दूर दराज के गांव के लोगों में आज भी अटूट आस्था है। मंदिर में हर दिन पूजा करने वालों की मानें तो इस मंदिर का निर्माण तथा हर दिन साफ सफाई भी भक्तों द्वारा अपनी इच्छा से किया जाता है। जिस भक्त की मनोकामना पूरी होती है वह या तो मंदिर निर्माण में स्वेच्छा से आर्थिक सहयोग करता है या फिर मंदिर की साफ सफाई में हाथ बंटाता है।

गंगा जब भोजपुर ताल में बहती थी तब बाबा राज परिवार के पुरोहित थे : अमसारी के बुजुर्ग व अनंत महाराज के वंशज विश्वामित्र पाठक की मानें तो करीब छह से सात सौ साल पहले गंगा नदी भोजपुर ताल में ही बहती थी। तब अनंत बाबा राज परिवार के पुरोहित हुआ करते थे तथा अहले सुबह गांव से पैदल गंगा स्नान कर वहा से गंगाजल लेकर रोहतास जिले में स्थित भलनी भवानी धाम जाते थे। वहां पूजा अर्चना करने के बाद ही राज परिवार के पुरोहिती का काम करते थे। जब वे वृद्ध हो गए तथा शरीर कमजोर होने लगा तब मां ने उन्हें स्वप्न दिखा अमसारी के पास राजपरिवार द्वारा उन्हें दान में दिए गए 52 बीघे के भूखंड के बीचोंबीच एक नीम के पेड़ के रूप में अवतरित होने की जानकारी दी और बताई कि अब वही पर उनकी पूजा करें।


भलनी भवानी धाम में रोज पूजा करने जाते थे पंडित अनंत पाठक

मंदिर में स्थापित मां काली की मूर्ति

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