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डाउनलोड करेंसलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
दिल्ली में अब तक हुए विधान सभा के चुनाव में न तो इतना मतदान पहले देखा गया और ना ही इतनी कांटे की टक्कर.
जानकारों की मानें तो मतदाताओं में भी इस बार के चुनाव में जितना उत्साह नज़र आया उतना पहले कभी नहीं रहा.
इस बार 67.08 प्रतिशत मतदान हुए जो कि पिछले विधान सभा के लिए हुए मतदान से दो प्रतिशत ज़्यादा है.
हैरानी की बात यह भी है कि जिस चुनाव को भारतीय जनता पार्टी ने शुरू में आसान समझा वो उसके लिए हर दिन मुश्किलों भरा होता चला गया और ऐसा भी वक़्त आया जब \'एग्ज़िट पोल\' के नतीजे आम आदमी पार्टी को बढ़त मिलने की भविष्यवाणी करने लगे.
जवाबी टक्करहालांकि भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि \'एग्ज़िट पोल\' पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता है, लेकिन इतना तो दिख रहा है कि पिछले चुनाव के मुक़ाबले इस बार आम आदमी पार्टी का वोट प्रतिशत भी बढ़ता नज़र आ रहा है.
राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि इस बार का चुनाव इस लिए भी दिलचस्प रहा क्योंकि एक तरफ़ बड़े जनाधार वाली राष्ट्रीय पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी थी तो दूसरी तरफ़ एक बिल्कुल ही नई पार्टी यानी आम आदमी पार्टी थी.
वो कहते हैं, \"बहुत ही कड़ी प्रतिस्प्रधा देखने को मिली इस बार क्योंकि एक नई पार्टी ने चुनाव लड़ने के लिए ज़मीनी स्तर पर जिस तरह अपने आपको तैयार किया वो वाक़ई हैरान करने वाली बात थी. कमाल की बात यह भी रही कि भाजपा आम आदमी पार्टी को वैसी जवाबी टक्कर नहीं दे पा रही थी.\"
अभी तक आए \'एग्ज़िट पोल\' के नतीजों से यह संकेत मिल रहे हैं कि इस बार कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी काफ़ी घट रहा है.
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को मिलने वाले वोटों में कमी का फ़ायदा आम आदमी पार्टी को हुआ है जबकि भारतीय जनता पार्टी को मिलने वाले वोटों के प्रतिशत में कुछ ख़ास कमी नहीं नज़र आ रही है.
असंतोषवरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी को लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को अति आत्मविशवास की वजह से ही इतने कड़े मुक़ाबले का सामना करना पड़ा.
वो कहते हैं, \"कई राज्यों में हुए विधान सभा के चुनावों में एक के बाद एक मिली जीत से भारतीय जनता पार्टी पूरे आत्मविश्वास में थी. इन जीतों की वजह से संगठन में थोड़ा दंभ आ गया था और उन्होंने ज़मीनी सच्चाई को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जितना लेना चाहिए था. इसका उसे नुक़सान उठाना पड़ा.\'\'
इसके अलावा जानकारों को लगता है कि पुराने नेताओं की अनदेखी कर नए लोगों को महत्व देने की वजह से पैदा हुए असंतोष से भी भाजपा ठीक तरीक़े से निपट पाने में असफल रही.
बहरहाल दिल्ली विधान सभा की 70 सीटों पर चुनाव लड़ रहे विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों की क़िस्मत अब ईवीएम मशीन में बंद हो गई है. 10 फ़रवरी को मतगणना होनी है और यह तय हो जाएगा कि दिल्ली के भाग्य में एक स्थिर सरकार आती है या एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता का दौर.
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