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छत्तीसगढ़: अब तक नहीं बनी राज्य में फिल्म पॉलिसी, कलाकार जा रहे बाहर

3 वर्ष पहले
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रायपुर.  नया राज्य निर्माण के बाद से छत्तीसगढ़ फिल्म पॉलिसी बनने की मांग उठती रही है, लेकिन सिर्फ फिल्म विकास निगम का बॉयलॉज ही तैयार हो पाया है। इसे लेकर स्थानीय फिल्म के कलाकार और निर्देशक-निर्माता 18 साल से कोशिश करते रहे हैं। बॉयलॉज बनने के बाद भी अब इसकी सुझाव देने वाली समिति नियम-कायदे को लेकर अंतिम रूप नहीं दे पा रही है। जबकि हमारे प्रदेश के साथ ही बने उत्तराखंड और  झारखंड ने पहले ही अपने राज्यों की फिल्म पॉलिसी बना ली है। जबकि यहां इसे लेकर कोई भी नजीते वाले काम नहीं हो पाए हैं। इतना ही नहीं नया राज्य बनने के बाद बीते डेढ़ दशक में ऐसे कई मौके भी आए जब यहां की फिल्म इंडस्ट्री दम तोड़ती नजर आई, ऐसे मौके पर दूसरे राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं के कारण यहां के फिल्मकार भोजपुरी, मराठी और दूसरी भाषाओं की सिने इंडस्ट्री में पलायन भी करने लगे थे। अब इस देरी को लेकर प्रदेश के संस्कृति सचिव का कहना है कि फिल्म विकास निगम के गठन को लेकर जल्द ही ऐलान किया जाएगा। इसे लेकर काम चल रहा है।

 

 

- छत्तीसगढ़ी सिनेमा को उद्योग का दर्जा तो हासिल है, लेकिन सुविधाएं अब तक उस तरह की  नहीं मिल पाई हैं। हालांकि सोशल मीडिया छत्तीसगढ़ी सिनेमा के लिए नया बाजार बनकर उभरा है। यूृ- ट्यूब पर छत्तीसगढ़ी फिल्मों का बड़ा वर्ग तैयार हुआ है। हर राज्य में क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों को बढ़ावा देने की अपनी नीति है। जिसमें रीजनल फिल्मों के लिए सब्सिडी भी है। ऐसे में उस प्रदेश के सिनेमाघर में वहां की क्षेत्रीय फिल्में करीब 90 दिन दिखाना अनिवार्य भी की गईं हैं, लेकिन यहां इस तरह की नीतियों की कमी है। 

 

18 साल के दौरान फिल्म सिटी-  निगम की घोषणाएं, अमल नहीं   
- बीते 18 सालों में फिल्म विकास निगम, नया रायपुर में फिल्म सिटी बनाने को लेकर शासन की ओर से कई घोषणाएं हुई। लेकिन जमीनी स्तर पर कोई भी पहल अब तक नहीं हो पाई है। प्रदेश में करीब 35 स्क्रीन है। इसके मद्देनजर  इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने का भी ऐलान हुआ था, जिसके तहत तमाम कस्बों और छोटे शहरों में सिनेमाघर बनाए जाने थे। लेकिन ये काम भी अब तक शुरु नहीं हो पाया है। इस साल करीब 15 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण चल रहा है। यही नहीं 500 म्यूजिक एलबम यानी करीब 5 हजार गाने भी रिलीज हो रहे हैं।  

 

स्थानीय कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का सवाल  
- छग के अलावा ये फिल्में जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में भी लगती है। मल्टीप्लेक्स में छत्तीसगढ़ी फिल्में न के बराबर ही लगती है। केवल सिंगल स्क्रीन थिएटर के भरोसे ये पूरी इंडस्ट्री चल रही है। कुछ बड़े मेलों में घूमते- फिरते सिनेमाघरों के जरिए फिल्में दिखाई जा रही हैं।

- बताया जाता है कि इनसे भी फिल्मों को कमाई हो जाती है। मोटे तौर पर एक फिल्म जब बनती है तो करीब 200 से 250 लोग रोजगार पाते हैं। हालांकि असंगठित रूप से इस उद्योग में रोजी रोटी कमाते हैं। छत्तीसगढ़ में सिनेमाघरों की कमी के चलते भी यहां फिल्म उद्योग रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है। ऐसे में लंबे समय तक इस इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के सामने नियमित रूप से अपनी जीविका चलाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

 

भोजपुरी फिल्मों की तरफ रुख कर रहे हैं अधिकतर
यूपी सरकार की फिल्म नीति के चलते छत्तीसगढ़ी फिल्मों के ज्यादातर निर्माता और कलाकार अब भोजपुरी फिल्मों का रुख कर रहे हैं। इसकी वजह है कि यहां फिल्में बनाने पर सब्सिडी भी मिल रही है। वहीं फिल्म के प्रदर्शन के लिए थिएटरों की तादाद भी ज्यादा है। कुछ कलाकार मराठी और हिंदी फिल्मों में भी काम कर रहे हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माता संतोष जैन ने भोजपुरी फिल्म भी बनाई जो रिलीज हो गई है। हालांकि यहां के निर्माता अब हिंदी सिनेमा के लिए फिल्में भी बना रहे हैं।

 

नई प्रतिभाओं को मौका मिले  
 प्रदेश में छोटे छोटे कस्बों में सिनेमाघर बनाए जाने चाहिए। इससे प्रदेश में हमारी फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग भी तैयार होगा। सिनेमाघर ज्यादा होंगे तो फिल्में भी ज्यादा बनेंगी। नए कलाकारों प्रतिभाओं को मौका मिलेगा।  
- मोहन सुंदरानी, छत्तीसगढ़ी अभिनेता व निर्माता-निर्देशक

 

एक से बढ़कर एक लोकेशन 

 हिंदी फिल्मों के कई निर्माता- निर्देशक छत्तीसगढ़ में फिल्मों की शूटिंग करना चाहते हैं। क्योंकि यहां एक से बढ़कर एक सुंदर लोकेशन है। अगर हमारा क्षेत्रीय सिनेमा मजबूत होता है तो इसके जरिए भी कई लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर मिल पाएंगे।   
- संतोष जैन, छत्तीसगढ़ी-भोजपुरी फिल्म निर्माता  

 

सोशल मीडिया से बढ़ी पहुंच  
 फिल्म निगम और पॉलिसी नहीं बनने की वजह से कलाकारों को बड़ा नुकसान हो रहा है। छॉलीवुड फिल्मों को सब्सिडी भी नहीं मिल रही है। पॉलिसी बनने से दूसरी फिल्म इंडस्ट्रीज को बड़ी टक्कर दे सकता है।   
योगेश अग्रवाल, अध्यक्ष छग सिने आर्टिस्ट

 

निगम बनने के बाद जल्द  ही दूर होगी शिकायत : जितेंद्र शुक्ला, संचालक, संस्कृति विभाग 

Q. फिल्म विकास निगम कब बनेगा?   
- हमने बॉयलॉज बनाकर राज्य शासन के पास भेज दिए हैं। कैबिनेट बैठक में इस पर जल्द ही कोई फैसला होने की उम्मीद है।  

 

Q. अन्य राज्यों की तरह हमारे यहां क्षेत्रीय सिनेमा को बढ़ावा नहीं मिल रहा है?  
- फिल्म विकास निगम बनने के बाद ये शिकायत भी दूर हो जाएगी। हमने व्यापक रूप से इसके नियम कायदे बनाए हैं।  

 

Q. छग में फिल्म विकास की संभावनाएं कैसे देखते हैं?  
- यहां एक से बढ़कर एक लोकेशन है। अब तो मेन स्ट्रीम फिल्मों जैसे न्यूटन की भी 
शूटिंग हमारे यहां हो रही है।  

 

Q. नए फिल्म निर्माताओं के प्रोत्साहन की क्या योजना है?  
- हमने सभी पहलुओं का ध्यान रखा है। कैबिनेट से मंजूर होने के बाद इसकी प्राथमिकताएं और ज्यादा स्पष्ट रूप से तय होंगी।  

 

Q. यहां के कलाकार पलायन कर रहे हैं?  
- ऐसा नहीं है, हमारे यहां क्षेत्रीय फिल्मों के निर्माण की भी अच्छी तादाद है।

 

 

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