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संत कबीर के खरे बोल - न भरें दंभ, न उड़ाएं दूसरों की हंसी, वरना.. / संत कबीर के खरे बोल - न भरें दंभ, न उड़ाएं दूसरों की हंसी, वरना..

पढ़ें, पाखण्ड का विरोध व सुख-सफलता, शांति के सूत्र उजागर करते संत कबीर के खरे, सीधे व सटीक दोहे व उनका संदेश..

धर्म डेस्क. उज्जैन

Feb 03, 2012, 06:09 PM IST
dharm_precious words of sant kabir .. do not rejoice

पहले जानिए, कौन थे संत कबीर?
धर्म व साहित्य क्षेत्र में कबीरदास विलक्षण भक्तिकालिन कवि के रूप में जाने जाते हैं। संत कबीर ने तत्कालीन समाज में फैले धार्मिक पाखण्ड व आडंबरों का दोहों के जरिए सटीक, सरल, सीधी, खरी भाषा व बोलों के जरिए न केवल विरोध किया, बल्कि उनमें छुपे धर्म अध्यात्म, जीवन दर्शन, ज्ञान, भक्ति व कर्म के संदेशों से हर धर्म या जाति के इंसान को मानवीय धर्म, भावनाओं और संवेदनाओं के साथ जीवन जीने को भी प्रेरित किया।
खासतौर पर एक ही ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करने की उनकी सीख ने हिन्दू-मुस्लिम धर्म भेद को मिटाने में भी अहम भूमिका निभाई। यही नहीं, उनके सरल, सज्जन व सहज स्वभाव के कारण वह संत पुकारे गए। साथ ही समाज सुधारक व युगपुरुष के रूप में आज भी उनकी कहीं बातें प्रासंगिक हैं। संत कबीर का जन्म काशी में संवत 1455 व देहत्याग 119 साल की अवस्था में संवत 1575 में माना जाता है। कबीर के गुरु रामानन्द स्वामी थे।
संत कबीर की वाणी का संग्रह बीजक नाम से प्रसिद्ध है। जबकि उनसे जुड़ी एक विलक्षण बात यह भी है कि वह निरक्षर थे, इसके बावजूद उनके द्वारा उजागर अद्भुत जीवन दर्शन ने समाज को शांत और सुखी जीवन के सूत्र बताए।
जानिए, संत कबीर द्वारा दोहों के जरिए बताई धर्म, भक्ति, कर्म, ज्ञान व व्यवहार से जुड़ी ऐसी ही खरी-खरी बातों को -
संत कबीर ने जीवन में अहंकार व उससे मिलने वाले दु:खों से बचने के लिए बहुत ही बेहतर सीख दी। लिखा गया कि -
कबिरा गर्ब न कीजिये, और न हंसिये कोय।
अजहूं नाव समुद्र में, ना जाने का होय।।
भावार्थ है कि - हर इंसान समुद्र रूपी संसार में जीवन रूपी नाव में बैठा है, इसलिए वह किसी भी स्थिति में ताकत, बल, सुख, सफलता पाकर अहंकार न करें, न ही उसके मद में दूसरों की हंसी उडाए या उपेक्षा, अपमान करे। क्योंकि न जाने कब काल रूपी हवा के तेज झोंके के उतार-चढ़ाव जीवन रूपी नौका को डूबो दे।
संकेत यही है कि जब व्यक्ति के मन में स्वयं का महत्व सबसे ऊपर हो जाता है और अपनी बात, विचार और कामों के साथ ही वह स्वयं को ही बड़ा मानने लगता है। अहंकार की यह स्थिति ही अंतत: गहरे दु:ख-संताप का कारण बन सकती है।
सभी जानते हैं कि अहंकार करना एक बुराई है पर इसे पहचानना भी कठिन है। किंतु कबीर के इस दोहे को स्मरण कर अंहकार को जीवन में प्रवेश कर रोका व जीवन में अनचाहे दु:खों से बचा जा सकता है।
अब रोज़ इसी सेगमेंट में पढ़ें, संत कबीर के धार्मिक पाखण्ड व अंधविश्वास से पर्दे उठाकर मन-मस्तिष्क को इंसानी धर्म व कर्म के लिए झकझोरने वाले और व्यवहार, कर्म, ज्ञान, अध्यात्म के रहस्य उजागर करते रोचक दोहों से जुड़े आर्टिकल। आर्टिकल पर अपने विचार नीचे कमेंट बाक्स के जरिए हमें भेजें।






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