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PHOTOS- क्यों नहीं होता पुरी रथयात्रा में राधा या रुक्मिणी का रथ? / PHOTOS- क्यों नहीं होता पुरी रथयात्रा में राधा या रुक्मिणी का रथ?

धर्म डेस्क. उज्जैन

Jun 14, 2012, 05:02 PM IST

जानिए जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा (इस वर्ष 21 जून से) से जुड़ी रोचक बात।

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भारत के पूर्व दिशा में उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र हिन्दू धर्म के पवित्र चार धामों में एक है। इस पावन धाम से भगवान जगन्नाथ की महिमा जु़ड़ी है, जिससे यह धाम जगन्नाथपुरी के नाम से भी प्रसिद्ध है।
यहां हर साल निकलने वाली विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथपुरी रथयात्रा (इस वर्ष 21 जून) में भगवान जगन्नाथ स्वरूप श्रीकृष्ण, भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा के रथ में विराजित होकर नगर भ्रमण की परंपरा है। धर्म जिज्ञासु लोगों के मन में यह प्रश्र रहता है कि आखिर भगवान जगन्नाथ के साथ उनकी पत्नी रुक्मिणी या प्रेयसी राधा रथ में क्यों शामिल नहीं होते हैं? इसका जवाब हिन्दू पौराणिक कथा में मिलता है। तस्वीरों के जरिए जानिए रथयात्रा से जुड़े ये रोचक पहलू -













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एक बार द्वारका में भगवान श्री कृष्ण रात्रि में शयन कर रहे थे। समीप ही रुक्मिणी भी सो रही थी। नींद के दौरान श्री कृष्ण ने राधा के नाम का उच्चारण किया। यह सुनकर रुक्मिणी अचंभित हुई। सुबह होने पर रुक्मिणी ने यह बात अन्य पटरानियों को बताई। सभी के मन में यह बात आई कि हमारी इतनी सेवा, प्रेम और समर्पण के बाद भी स्वामी राधा को याद करना नहीं भूलते हैं। तब सभी रानियां उलाहना लेकर माता रोहिणी के पास गई और उनसे राधा और श्रीकृष्ण की लीला के बारे में जानना चाहा। माता रोहिणी वृंदावन में राधा और श्रीकृष्ण की रास लीलाओं के बारे में बहुत कुछ जानती थीं। माता, श्रीकृष्ण और राधा के बारे में कुछ बताने को तैयार न थी, किंतु रानियों के जिद करने पर माता ने इस शर्त पर बताना स्वीकार किया कि मैं जब तक श्रीकृष्ण-राधा के प्रसंग को सुनाउं, तब तक कोई भी कक्ष के अंदर न आ पाए। यहां तक कि श्रीकृष्ण और बलराम भी नहीं। इसके लिए श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा को द्वार पर निगरानी के लिए रखा गया। इसके बाद माता रोहिणी ने श्रीकृष्ण-राधा लीला पर अपनी बात शुरू की। कुछ समय गुजरते ही सुभद्रा ने देखा कि उनके भाई बलराम और श्री कृष्ण माता के कक्ष की ओर चले आ रहे हैं। सुभद्रा ने उनको किसी बहाने माता के कक्ष में जाने से रोका, किंतु कक्ष के द्वार पर खड़े होने पर भी श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा को श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला के प्रसंग सुनाई दे रहा था। तीनों माता के मुंह से राधिका के नाम और कृष्ण के प्रति अद्भुत प्रेम व भक्ति भावना को सुनकर इतने भाव विभोर हो गए कि श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के शरीर गलने लगे, उनके हाथ-पैर आदि अदृश्य हो गए। यहां तक कि कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र भी गलकर लंबा आकार लेने लगा। इसी दौरान वहां से देवर्षि नारद का गुजरना हुआ। वह भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के अलौकिक स्वरूप के दर्शन कर अभिभूत हो गए। तभी तीनों नारद को देखकर अपने मूल स्वरूप में आ गए, यह सोचकर कि नारद ने संभवत: यह दृश्य न देखा हो। नारद मुनि ने तीनों से प्रार्थना की कि मैंने अभी आप के जिस अद्भुत स्वरूप के दर्शन किए उसी स्वरूप के दर्शन कलियुग में सभी भक्तों को भी हो। तब भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा ने श्री नारद की विनय को मानकर ऐसा करना स्वीकार किया। धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण और राधा का दिव्य युगल स्वरूप मानकर उनके साथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की अधूरी बनी काष्ठ यानी लकड़ी की प्रतिमाओं के साथ रथ यात्रा निकालने की परंपरा इसी प्रसंग से भी जुड़ी है।
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