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दिव्या काकरन: बेटी दंगल में लड़कों को हराती थी, उसे आगे बढ़ाने के लिए पिता बाहर लंगोट बेचते थे

दिव्या काकरन ने शुक्रवार को कॉमनवेल्थ गेम्स में विरोधी रेसलर को सिर्फ 36 सेकंड में हराकर ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Apr 13, 2018, 04:09 PM IST

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    पिता सूरज के मुताबिक, 15 साल की उम्र में दिव्या ने 2 महीनों के अंदर अलग-अलग दंगल जीतकर कुल 80 हजार रूपए कमाए थे। -फाइल

    - लड़कों को हारते नहीं देखना चाहते थे आयोजक, इसलिए दिव्या के जीते मुकाबलों को ड्रॉ करार देते थे
    - दिव्या इससे पहले कॉमनवेल्थ रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं

    गोल्ड कोस्ट. 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में दिल्ली की रहने वाली दिव्या काकरन ने शुक्रवार को 68 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती में देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीता। दिव्या ने बांग्लादेशी रेसलर शेरीन सुल्ताना को सिर्फ 36 सेकंड में हरा दिया। इस दौरान बांग्लादेशी खिलाड़ी एक भी बार खड़ी तक नहीं हो पाई। जीत के बाद इस 19 साल की रेसलर की ताकत और तकनीक की तारीफ हुई। हालांकि, दिव्या का कॉमनवेल्थ गेम्स तक का सफर आसान नहीं रहा। रेसलिंग में आने से पहले दिव्या को दंगल में लड़कों को हराने के लिए जाना जाता था। जब वे कुश्ती में दांव लगाकर इनाम जीत रही होती थीं, उस वक्त उनके पिता स्टेडियम और अखाड़ों के बाहर लंगोट बेच रहे होते थे ताकि बेटी की ट्रेनिंग के लिए पैसे जुटा सकें।


    पिता ने बेटे की जगह बेटी को रेसलर बनाया
    - कुश्ती में दिव्या की दिलचस्पी 5 साल की उम्र से ही थी। पिता सूरज खुद भी एक रेसलर बनना चाहते थे, लेकिन उन्हें कभी नामी दंगल या बड़े टूर्नामेंट में खेलने का मौका नहीं मिला। अपने सपने को पूरा करने के लिए वे अपने बेटे को भी रेसलर ही बनाना चाहते थे, लेकिन दिव्या की दिलचस्पी को देखते हुए उन्होंने बेटी को ही रेसलर बनाने की ठानी।
    - लड़कियों के लिए स्थानीय रेसलिंग मुकाबलों में कम ही मौके होते हैं। इसलिए सूरज ने दिव्या को लड़कों से ही भिड़ाने का फैसला किया।
    - शुरुआत में जब दिव्या ने लड़कों को हराना शुरू किया तो लोगों को ताज्जुब हुआ, लेकिन जैसे-जैसे वे लड़कों को हराकर मुकाबले जीतने लगीं, ऑर्गनाइजर उनके बाउट को ड्राॅ करार देने लगे। ज्यादातर लोग लड़कों को एक लड़की से हारता नहीं देखना चाहते थे।

    पिता नहीं देखते थे मुकाबले
    - जिस समय दिव्या लड़कों को हराकर मुकाबले जीत रही होती थीं, उसी दौरान बेटी को आगे बढ़ाने के लिए उनके पिता लंगोट बेच रहे होते थे। जब पहली बार 2017 में दिव्या ने अपना पहला सीनियर नेशनल गोल्ड मेडल जीता तब भी उनके पिता मुकाबला देखने के स्टेडियम के बाहर लंगोट बेचकर परिवार के लिए पैसे जुटाने में लगे थे।

    कॉमनवेल्थ रेसलिंग और एशियन चैंपियनशिप में भी जीत चुकीं मेडल
    - 2017 में एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन कर दिव्या ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया था। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक के बाद वे तीसरी खिलाड़ी थीं, जिन्होंने इस टूर्नामेंट में भारत के लिए मेडल हासिल किया था।
    - पथरी की वजह से दिव्या को कई महीनों तक रेसलिंग से दूर रहना पड़ा। यहां तक की पेरिस में होने वाले वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप से भी उन्हें नाम वापस लेना पड़ा। हालांकि, रेसलिंग मैट पर लौटते ही दिव्या ने साबित कर दिया कि छोटी-मोटी परेशानियां उनके कदम नहीं रोक पाएंगी। अंडर-23 वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में वो ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बेहद करीब थीं। कुछ पॉइंट्स के अंतर से हार मिलने के बावजूद उन्होंने हौसला नहीं खोया और जोहानिसबर्ग में आयोजित कॉमनवेल्थ रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया।

    फोगाट बहनों जैसी है कहानी
    - दिव्या की कहानी भी काफी हद तक फोगाट बहनों के जैसी ही है। फोगाट बहनों की तरह ही कई बार टूर्नामेंट के ऑर्गनाइजर्स उन्हें हिस्सा नहीं लेने देते थे, लेकिन जहां भी दिव्या को मौका मिलता वो विरोधी पहलवान को हराने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। लड़कों के खिलाफ उनकी जीत को कुश्ती देखने वाले भी काफी पसंद करते थे।
    - लगातार जीत हासिल करने के बाद प्राइज मनी के साथ दर्शक उन्हें अलग से भी पैसे और इनाम देते थे। एक मीडिया हाउस को दिए इंटरव्यू में सूरज बता चुके हैं कि 15 साल की उम्र में दिव्या ने सिर्फ दंगल जीतकर ही 80 हजार रुपए कमाए थे।

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    दिव्या ने कॉमनवेल्थ गेम्स में बांग्लादेश की शेरिन सुल्ताना को हराकर ब्रॉन्ज जीता।
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