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डॉक्टरों की जिद: करोड़ों हर्जाना भर देंगे, नौकरी छोड़ देंगेे, लेकिन गांव नहीं जाएंगे

देश की 69 फीसदी आबादी गांवों में रहती है जबकि सिर्फ 20% डॉक्टर ही जाते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में

Danik Bhaskar | Sep 08, 2018, 10:46 PM IST

स्पेशल डेस्क. गांवों में डॉक्टर्स की कमी को पूरा करने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने कुछ साल पहले सख्त कानून बनाए। मेडिकल छात्रों से ये बॉन्ड भरवाना शुरू किया गया कि वे पढ़ाई के बाद अनिवार्य रूप से कुछ साल ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देंगे।

आश्चर्य की बात यह है कि डॉक्टर्स बड़ी संख्या में आज भी गांव जाने के लिए तैयार नहीं हैं। भास्कर ने विभिन्न राज्यों की स्थिति पता की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। यहां के डॉक्टर्स करोड़ों रुपए सरकार को बॉन्ड तोड़ने के बदले में दे रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जा रहे हैं। अकेले महाराष्ट्र और राजस्थान में ही बीते लगभग एक दशक में 10 हजार से अधिक डॉक्टरों ने ग्रामीण क्षेत्र में जाने मना कर दिया है। यही नहीं राजस्थान में तो नियुक्तियां निरस्त हुईं लेकिन वे गांव नहीं गए। यह इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि जनगणना 2011 के अनुसार आज भी देश में 69 फीसदी आबादी गांवों में ही रहती है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार देश के 20 फीसदी डॉक्टर ही ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। भास्कर से इस संबंध में बात करते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की प्रेसिडेंट डॉ. जयश्री मेहता कहती हैं कि गांवों में चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए हमारे पास कोई रोडमैप नहीं है। गांवों में डॉक्टर्स की तैनाती की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर होती है। वे कहती हैं कि यदि राज्य सरकार सही तरीके से गांव और शहरों में डॉक्टर्स की तैनाती करे तो रूरल इलाके में डॉक्टरों की समस्या नहीं होगी।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डॉ. आरएन टंडन कहते हैं कि डॉक्टर गांव में जाने से मना नहीं करते। डॉक्टर इसलिए नहीं जाना चाहते क्योंकि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और सीएचसी में सुविधा उपलब्ध नहीं है।

कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में तो विशेषज्ञ डॉक्टर इसलिए नहीं जाना चाहते क्योंकि वहां न तो ऑपरेशन थिएटर ढंग का है और न ही इक्यूपमेंट उपलब्ध हैं। यदि सर्जन हैं तो एनेस्थीसिया के डॉक्टर नहीं हैं, पैथोलॉजिस्ट और टेक्नीशियन्स का जबरदस्त अभाव है। ऐसे में डॉक्टर वहां जाकर क्या करेगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (पीएचसी) में बड़ी दिक्कत है। सरकार की ओर से कोई व्यवस्था वहां नहीं की गई है।
सिर्फ एक बिल्डिंग बना देने से कुछ नहीं होता। न तो डॉक्टर के रहने की व्यवस्था और न ही शाम के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था होती है। यही नहीं सरकार इन जगहों पर अनुबंध पर 50 से 60 हजार रुपए में डॉक्टर को तैनात करना चाहती है, जबकि शहरी इलाकों में जनरल ड्यूटी मेडिकल ऑफिसर (जीडीएमओ) को बहाल करती है तब भी एक लाख रुपए से ज्यादा की सैलरी होती है।
डॉक्टर्स के गांव न जाने के सवाल पर छत्तीसगढ़ के डीएमई डॉ. एके चंद्राकर कहते हैं कि हमारे यहां बॉन्ड भरने का नियम है, लेकिन इसके लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता। ज्यादातर लोग बॉन्ड भरकर ग्रामीण सेवा में जाने से बच जाते हैं। राज्य सरकार ने एमबीबीएस पास करने के बाद दो साल की ग्रामीण सेवा में नहीं जाने वाले डॉक्टरों की पेनाल्टी राशि पिछले साल ही बढ़ाई थी। अनारक्षित वर्ग के डॉक्टरों को पांच लाख व आरक्षित वर्ग के डॉक्टरों को तीन लाख रुपए जमा करना होगा। यही नहीं उन्हें इंटर्नशिप व एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान मिला स्टायपेंड भी जमा करना होगा। पेनाल्टी व स्टायपेंड मिलाकर अनारक्षित वर्ग के डॉक्टरों को छह लाख व आरक्षित वर्ग के डॉक्टरों को साढ़े चार लाख रुपए जमा करना होगा। यह राशि जमा करने के बाद ही मेडिकल कॉलेज से एनओसी जारी होगी और वे छग मेडिकल काउंसिल में पंजीयन करवा सकेंगे। राजस्थान में वर्ष 2014 में तत्कालीन चिकित्सा मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद 2 साल की सरकारी सेवा या 5 लाख रुपए का बॉन्ड भरने की घोषणा की थी। लेकिन चार साल बाद भी यह नियम लागू नहीं हुआ।
भास्कर ने अहमदाबाद के मेडिकल छात्रों से साथ भी बात की। वे गांव नहीं जाने की वजह बताते हुए कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में सुविधाएं, इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी के चलते वे वहां जाना पसंद नहीं करते हैं। उनका यह भी कहना है की ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर आंकडे जुटाने जैसे क्लरीकल काम ही करने पड़ते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए गुजरात सरकार ने इस साल से राज्य के ग्रामीण इलाकों में 'बाल डॉक्टर' योजना शुरू करने की तैयारी की है। जनवरी माह में राज्य के अरवल्ली जिले के नवागाम में इस योजना का पाइलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत छठवीं कक्षा की बच्ची को बाल डॉक्टर बनाया गया है। बाल डॉक्टर बच्ची को स्टेथेस्कोप और आयुर्वेदिक दवाइयां दी गई हैं। वह स्कूल में सामान्य बीमारी के दौरान बच्चों को जांचेगी और दवाइयां देगी। पाइलट प्रोजेक्ट सफल होने पर इसे पूरे राज्य में लागू करने की योजना है।

इधर ऐसी है गांवों की हालत

- गांवों में कुल 5624 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर हैं। यहां स्वीकृत पद 11,910 है, जिसमें से 8105 खाली पड़े हैं। जबकि जरूरत 22,496 की है।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टरों की स्वीकृत संख्या 34068 है। 26,464 तैनात हैं। 8,774 पद खाली पड़े हैं।
- कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में फिजिशियन की स्वीकृत संख्या 2,832 है, जिसमें 925 तैनात हैं जबकि 1989 पद रिक्त पड़े हैं।
- कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में स्पेशलिस्ट (सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और शिशु रोग विशेषज्ञों) डॉक्टरों की स्वीकृत संख्या 11,262 है, जिसमें 4,192 तैनात हैं। 7,359 पद रिक्त हैं।
- पीएचसी और सीएचसी में नर्सिंग स्टाफ के 78 हजार 530 पद स्वीकृत हैं जिसमें 69 हजार 22 तैनात हैं जबकि 12 हजार 265 पद रिक्त पड़े हैं।

  • अलग-अलग राज्यों में इस तरह मना कर रहे हैं डॉक्टर्स

छत्तीसगढ़ : हर साल 4 करोड़ देते हैं ताकि गांवों में न जाएं

छत्तीसगढ़ में हर साल मेडिकल कॉलेजों से 100 से ज्यादा डॉक्टर एमबीबीएस कर निकल रहे हैं। लेकिन करीब 15 डॉक्टर ही ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा के लिए जाते हैं। बाकी डॉक्टर बॉन्ड यानी पेनाल्टी भरकर बच जाते हैं। इससे सरकार को सालाना चार करोड़ रुपए मिल रहे हैं। कई रसूखदार डॉक्टर तो पेनाल्टी भरे बिना भी बचकर निकल जाते हैं। छग मेडिकल काउंसिल भी ग्रामीण सेवा में नहीं जाने वाले डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की चेतावनी भर देती है। लेकिन आज तक किसी डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन रद्द नहीं किया गया है। प्रदेश में एमबीबीएस के बाद दो साल की ग्रामीण सेवा अनिवार्य है।

महाराष्ट्र : 10 साल में 4400 डॉक्टर ने गांव के लिए ना कहा

मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च डायरेक्टोरेट के संचालक डॉ. प्रवीण शिनगारे ने बताया कि पिछले 10 सालों में 4400 डॉक्टर्स ने गांव जाने से मना किया है। महाराष्ट्र में 18 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, यहां प्रतिवर्ष 2400 छात्र एमबीबीएस करके निकलते हैं। करीब 25% छात्र गांव नहीं जाते हैं। यहां 1983 में बॉन्ड तोड़ने पर 5000 रु. जुर्माना था, जो अब 10 लाख रु. हो गया है। यहां मास्टर्स करने के बाद जुर्माना 50 लाख और सुपर स्पेशलटी डिग्री के बाद 2 करोड़ है।

गुजरात : 9 साल में 6,448 डॉक्टर्स में से सिर्फ 877 गए गांव

गुजरात में 2009 से 2017 तक सरकारी मेडिकल कॉलेज से पास होने वाले 6,448 डॉक्टर्स में से सिर्फ 877 ने गांवों में सेवा दी। जबकि 5,571 डॉक्टर्स ने गांव जाने से मना कर दिया। वर्ष 2009 से 2014 तक ही बॉन्ड की रकम से सरकार को 15 करोड रु. मिले। राज्य के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने वाले छात्रों को बॉन्ड पर हस्ताक्षर करना पड़ता है। बॉन्ड के नियम के मुताबिक कोर्स पूरा होने के बाद गांव में तीन साल तक काम करना होता है। पालन नहीं करने वालों को पांच लाख रुपए का जुर्माना देना पड़ता है।

पंजाब : बॉन्ड भरवाने का भी नियम नहीं
पंजाब में हर साल लगभग 1200 छात्र एमबीबीएस पास करते हैं। लेकिन यहां ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देना अनिवार्य नहीं है। राज्य सरकार इसके लिए कोई बॉन्ड भी नहीं भरवाती है। यहां के गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल काॅलेज के प्रिंसिपल दीपक जॉन भट्टी बताते हैं कि यहां डॉक्टरों की मर्जी पर निर्भर है कि वे रूरल एरिया में सेवाएं देते हैं या नहीं। हालांकि, उन्हें पढ़ाई के दौरान ही 2 महीने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रेनिंग कैंप लगाया जाता है, जिसे करना अनिवार्य है।

बिहार : छात्रों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में काम करना अनिवार्य ही नहीं
बिहार में ऐसा कोई नियम या निर्देश नहीं है कि यहां के एमबीबीएस छात्रों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में काम करना अनिवार्य है। यहां के एमबीबीएस छात्र परीक्षा पास करने के बाद कहीं भी और सरकारी या निजी सेवा किसी क्षेत्र में काम करने को स्वतंत्र हैं। स्वास्थ्य विभाग के विशेष कार्य पदाधिकारी डॉ. अजय कुमार ने इस संदर्भ में बताया कि अब तक इस तरह का कोई निर्देश या नीति सरकारी स्तर पर नहीं बनी है। राज्य में डाॅक्टर गांवों में पदस्थ हैं। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों तक डाॅक्टर काम कर रहे हैं। वैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में डाॅक्टर्स लगातार काम करें इसके लिए ग्रामीण भत्ता अलग से देने यानी प्रोत्साहन राशि देने की योजना पर भी राज्य सरकार काम कर रही है।

राजस्थान : नियुक्तियां निरस्त हो गईं, लेकिन गांव नहीं गए
प्रदेश में सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेजों से हर साल 1750 छात्र एमबीबीएस करते हैं। तीन साल ग्रामीण क्षेत्र में सेवा जरूरी है। लेकिन सरकार की ओर से भर्ती में चयन के बाद 30-40% डॉक्टर गांव जाने से इंकार कर देते हैं। पिछले साल 1170 पदों पर भर्ती में चयन के बाद सिर्फ 668 डॉक्टरों ने ही ज्वाइन किया। शेष ने ग्रामीण क्षेत्र व अन्य कारणों से ज्वाइन नहीं किया। चिकित्सा विभाग के निदेशक (जन स्वास्थ्य) डॉ. वीके माथुर ने 502 डॉक्टरों की नियुक्तियां निरस्त करने का आदेश जारी किया।
उत्तर प्रदेश : यहां बॉन्ड तोड़ने पर देने पड़ते हैं 10 लाख
यहां 17 सरकारी मेडिकल कॉलेज में 1303 एमबीबीएस सीट हैं, जबकि 14 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में 1550 छात्र हर साल निकलते हैं। सरकार ने बीती 7 मार्च 2018 को एक आदेश जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि प्रदेश में चिकित्सकों की कमी को देखते हुए राजकीय मेडिकल कॉलेज, संस्थानों, चिकित्सा विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस, बीडीएस, स्नातकोत्तर, पीजी डिप्लोमा और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने वाले छात्राओं से अनिवार्य शासकीय सेवा से सम्बंधित बाॅन्ड भरवाया जाए। जिसके अनुसार
एमबीबीएस/बीडीएस किए हुए छात्रों को 2 साल तक महानगरों को छोड़कर अन्य जनपदों में स्थापित राजकीय मेडिकल कॉलेज में नॉन पीजी जे आर के रूप में और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अधीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में संविदा चिकित्सा अधिकारी के रूप में काम करना होगा। बॉन्ड की राशि 10 लाख रुपए होगी। पीजी के लिए 40 लाख का बॉन्ड होगा। सुपर स्पेशिएलिटी के लिए बॉन्ड की राशि 1 करोड़ रुपए है।

मध्यप्रदेश : एमबीबीएस डॉक्टर को 8 और एमडी, एमएस डॉक्टर को 10 लाख रुपए
मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल काॅलेज से एमबीबीएस करने वाले स्टूडेंट को डिग्री के बाद एक साल की नौकरी ग्रामीण क्षेत्र में करने का बॉन्ड एडमिशन के समय भरना होता है। एेसा नहीं करने पर 8 लाख रुपए जमा करना होते हैं। इसी तरह मेडिकल कॉलेज से पीजी (एमडी, एमएस) करने वाले डॉक्टर को बॉन्ड तोड़ने पर 10 लाख रुपए भरने होते हैं। गांधी मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. एमसी सोनगरा के मुताबिक राज्य के पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों से हर साल करीब 700 स्टूडेंट एमबीबीएस और 450 डॉक्टर एमडी, एमएस की डिग्री कंपलीट करते हैं। इनमें से करीब 25 प्रतिशत एमबीबीएस और पीजी डॉक्टर अपना बॉन्ड कंपलीट नहीं करते हैं। अतिरिक्त स्वास्थ्य संचालक (प्रशासन) विवेक श्रोत्रीय ने बताया कि वर्ष 2017 में राज्य के 5 सरकारी मेडिकल कॉलेजाें से करीब 450 डॉक्टर्स ने अपनी एमडी, एमएस की डिग्री कंपलीट की थी। पीजी बाॅन्ड के तहत इन डॉक्टर्स की पोस्टिंग ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में की गई थी। लेकिन 370 पीजी डॉक्टर्स बॉन्ड की शर्तों के तहत अस्पताल में ड्यूटी ज्वाइन नहीं की है। इन सभी को नोटिस जारी किए जाएंगे। साथ ही चिकित्सा शिक्षा विभाग से संबधित डॉक्टर्स के बॉन्ड कंपलीट करने की स्टेटस रिपोर्ट मांगी जाएगी। ताकि डॉक्टर्स पर कार्रवाई की जा सके।

इनपुट- पवन कुमार- नई दिल्ली, दिनेश जोषी- अहमदाबाद, पीलूराम साहू- रायपुर,

रोहित श्रीवास्तव- भोपाल, चंद्रकांत शिंदे- मुंबई, सुरेन्द्र स्वामी- जयपुर, रवि श्रीवास्तव- लखनऊ।