पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर
डाउनलोड करेंडॉ. भीमराव आंबेडकर को हम संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं लेकिन, उन्होंने राष्ट्र निर्माण करने वाली कई संस्थाओं और कदमों को उठाने में भी महति भूमिका निभाई। फिर चाहे वह महिला का सामाजिक दर्जा उठाने की बात हो, काम के घंटे बारह से घटाकर आठ करने की पहल हो अथवा भारतीय रिजर्व बैंक की परिकल्पना और बिजली वितरण के लिए ग्रिड पद्धति अपनाने का सुझाव हो, आंबेडकर ने राष्ट्र निर्माण के हर पहलू पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संविधान तैयार करने की बहुत कठिन चुनौती में असाधारण परिपक्वता, बुद्धिमानी और उदारता दिखाई, जिससे अंतत: हम लोकतंत्र बने।
महिलाओं के हक की लड़ाई में इस्तीफा दे दिया
जब महिलाओं के हक के लिए उनके द्वारा लाया गया हिंदू कोड बिल संसद में पारित नहीं हुआ तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। बिल के दो उद्देश्य थे हिंदू महिलाओं को संपत्ति व अन्य अधिकार देकर उनका सामाजिक दर्जा उठाना व जातिगत असमानता दूर करना। बाबासाहेब ने कहा था, ‘मैं किसी समाज की प्रगति को उसकी महिलाओं की प्रगति से आंकता हूं।’ बाद में 1955-56 में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम आदि पास होने पर डॉ. आंबेडकर जो चाहते थे वह कुछ हद तक पूरा हुआ।
भारतीय रिजर्व बैंक की अवधारणा दी थी
डॉ. आंबेडकर ने हिल्टन कमीशन (जिसे रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस भी कहा जाता था) को दी गई गाइडलाइन के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक की कल्पना की गई। इस धारणा को उन्होंने अर्थशास्त्र पर अपनी पुस्तक ‘द प्रॉब्लेम ऑफ द रूपी- इट्स ओरिजीन एंड इट्स सोल्यूशन’ में भी रखा था।
काम के घंटे 12 से घटाकर 8 किए
1942 से 1946 के बीच वाइसराय काउंसिल में श्रमिकों संबंधी मामलों के सदस्य के रूप में डॉ. आंबेडकर कई श्रम सुधारों के माध्यम बने थे। उन्होंने नवंबर 1942 में नई दिल्ली में इंडियन लेबर कॉन्फ्रेंस के 7वें अधिवेशन में काम के घंटे 12 से घटाकर 8 घंटे प्रस्ताव रखा। उन्होंने महंगाई भत्ता, छुट्टियां, बीमा, मेडिकल लीव, समान काम के लिए समान वेतन, न्यूनतम वेतन और वेतनमानों की समय-समय पर समीक्षा जैसे कई कदम उठाएं। श्रम संगठनों को मजबूत बनाया और देशभर में रोजगार कार्यालय खोले।
‘मूकनायक’ का प्रकाशन
1920 में उन्होंने मुंबई में साप्ताहिक ‘मूकनायक’ का प्रकाशन शुरू किया। फिर दलितों को शिक्षित करने के पहले संगठित प्रयास में बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया। दलित अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने मूक नायक के अलावा ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘इक्वलिटी जनता’ का प्रकाशन भी शुरू किया।
बिहार व मध्य प्रदेश के विभाजन का सुझाव
अपनी पुस्तक ‘थाट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ में आंबेडकर ने मध्य प्रदेश और बिहार को विभाजित करने का सुझाव दिया था। उस किताब के प्रकाशन के 45 वर्षों बाद उनके सुझाव के मुताबिक दोनों राज्यों का विभाजन कर झारखंड और छत्तीसगढ़ का गठन हुआ। उन्होंने भाषा के आधार पर राज्य बनाने के बारे में चार बाते ध्यान में रखने को कहा था एक, कुशल प्रशासन की जरूरतें ध्यान में रखें। दो, विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएं। तीन, विभिन्न इलाकों के लोगों की भावनाएं और चार, बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों की आबादी का अनुपात।
कश्मीर को विशेष दर्जा देने से साफ इनकार किया
आंबेडकर ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 का मसौदा लिखने से साफ मना कर दिया था। उन्होंने शेख अब्दुल्ला से साफ कहा, ‘आप चाहते हैं भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, आपके क्षेत्र में सड़कें बनाएं, आपको अनाज सप्लाई करे और कश्मीर को भारत में समान दर्जा मिले। लेकिन भारत के लोगों को कश्मीर में कोई अधिकार नहीं होगा। ऐसे प्रस्ताव को सहमति देना भारत के हितों के खिलाफ होगा और भारत के कानून मंत्री के रूप में मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।’
पानी व बिजली पर राष्ट्रीय नीति के पैरोकार
केंद्र और राज्यों में सिंचाई परियोजनाओं के विकास के लिए उन्होंने केंद्रीय जल आयोग की स्थापना की। इसी तरह विद्युत क्षेत्र के विकास के लए सेंट्रल टेक्नीकल पावर बोर्ड और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने बिजली वितरण के ग्रिड सिस्टम (जिस पर देश आज भी निर्भर है) और इंजीनियरिंग की शिक्षा पर जोर दिया।
वह गेंदे का हार
1942 में नागपुर की यात्रा में जर्जर साड़ियां पहनीं महिलाओं के एक समूह ने उन्हें रोका और गेंदे के हार से उनका स्वागत किया। यह तोहफा देने के लिए उन्होंने जलाऊ लकड़ी और घास का अतिरिक्त बंडल बेचा था। इससे अत्यंत भावुक हो उठे आंबेडकर ने वादा किया कि वे उनका जीवनस्तर ऊंचा उठाने का पूरा प्रयास करेंगे।
तीन किताबें, जिन्होंने आंखों में आंसू ला दिए
डॉक्टर साहेब आधा वेतन किताबों पर खर्च करने की सलाह दिया करते थे। अपने जीवन के अंतिम समय तक उनके पास इतनी किताबें इकट्ठी हो गई थीं कि वे उन्हें बेचकर लाखों रुपए इकट्ठा कर सकते थे। पर उन्होंने यह सारा संग्रह मुंबई के एक कॉलेज को दान कर दिया। बाबासाहेब ने अपने एक निकटवर्ती को बताया था कि तीन किताबों ने उनकी आंखों में आंसू ला दिए थे। लाइफ ऑफ टॉलस्टाय। विवाह के पहले मुलाकातों में उन्होंने शारदा कबीर को भी यह किताब दुखी वैवाहिक जीवन के वर्णन के उदाहरण स्वरूप पढ़ने को कहा था। विक्टर हूयूगो की ‘ले मिज़राब्ल’ और थॉमस हार्डी की ‘फार फ्राम द मेडिंग क्राउड’ दो अन्य किताबें थीं। अखबार पढ़ने का भी उन्हें शौक था और पढ़ने के बाद दशकों तक वे उनकी कतरनें अपने फोल्डर में एकत्रित करते रहे थे।
महाड से शुरू हुई हक की लड़ाई
1927 का महाड सत्याग्रह आंबेडकर के राजनीतिक विचार व कर्म में मील का पत्थर था। यह सत्याग्रह महाराष्ट्र के महाड कस्बे में गांधीजी के दांडी मार्च से तीन साल पहले 30 मार्च 1927 को हुआ था। उन्होंने वहां के एक तालाब से पानी लेने के दलितों के आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने ख्यात बयान में कहा था, ‘हम सिर्फ तालाब से पानी पीने नहीं जा रहे हैं बल्कि हम यह कहना चाह रहे हैं कि हम भी अन्य लोगों की तरह मानव हैं। सभा समानता स्थापित करने का मानदंड तय करने के लिए बुलाई गई है।’
पहले कानून मंत्री बने
15 अगस्त 1947 को जब ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण किया तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने डॉ. आंबेडकर को देश का पहला कानून मंत्री बनने का अनुरोध किया, जिसे डॉ. आम्बेडकर ने स्वीकार किया। 19 अगस्त को उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेअरमैन बनाकर भारतीय संविधान लिखने की प्रक्रिया का नेतृत्व सौंपा गया। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने उनके नेतृत्व में तैयार संविधान स्वीकार किया।
बौद्ध धर्म ग्रहण किया
1950 में डॉ. आंबेडकर श्रीलंका में बौद्ध सम्मेलन में गए। इसके बाद वे रंगून के बौद्ध सम्मेलन में भी गए। इसके पहले वे पूरी ज़िंदगी बौद्ध धर्म का अध्ययन करते रहे थे। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने पत्नी के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। फिर वहां एकत्रित उनके 5 लाख अनुयायियों ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
अमेरिका में 3 साल में 40 कोर्स, डबल डॉक्टरेट करने वाले दक्षिण एशिया के पहले व्यक्ति
- डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रांत (अब मध्यप्रदेश के महू) में हुआ। उनके पिता सेना में सुबेदार रामजी सकपाल और मां भीमाबाई सकपाल थे। 1897 में परिवार मुंबई चला गया और आंबेडकर ने एलफिंस्टन हाई स्कूल में प्रवेश लिया। मैट्रिक्यूलेशन के बाद उन्होंने 1907 में एलफिंस्टन कॉलेज में प्रवेश लिया। 1912 में बॉम्बे यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स और पॉलिटिकल साइंस में डिग्री ली। फिर 1913 में उन्हें तीन साल के लिए 11.50 पाउंड स्टर्लिंग प्रति माह की बड़ोदा स्टेट स्कॉलरशिप मिली थी, जिसकी मदद से वे न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्ययन करने गए।
- जून 1915 में उन्होंने मुख्य विषय अर्थशास्त्र के साथ समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शन और एंथ्रोपोलॉजी (मानव उत्पत्तिशास्त्र) के साथ एमए किया। उन्होंने प्राचीन भारतीय वाणिज्य पर अपनी थिसिस लिखी।
- 1916 में उन्होंने एक और एमए के लिए दूसरी थिसिस ‘नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया- ए हिस्टोरिक एंड एनालिटिकल स्टडी’ विषय
पर लिखी। आखिर में तीसरी थिसिस पर उन्हें 1927 में अर्थशास्त्र में पीएचडी डॉक्टोरल
उपाधि मिली। उसके बाद डॉ. आंबेडकर लंदन चले गए।
- मई 1916 में उन्होंने एंथ्रोपोलॉजिस्ट अलेक्जेंडर गोल्डनवाइजर द्वारा आयोजित सेमीनार में अपना पेपर ‘कास्ट्स इन इंडिया : देयर मेकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट।’
- अक्टूबर 1916 में उन्होंने ग्रेज-इन में बार कोर्स में नामांकन कराया और इसके साथ उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी प्रवेश लिया, जहां वे पीएचडी पर काम करने लगे। लेकिन, स्कॉलरशिप खत्म होने के कारण उन्हें जून 1917 में भारत लौटना पड़ा। फिर उन्हें चार साल के भीतर थिसिस पूरी करने के लिए लौटने की अनुमति मिल गई।
- लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उन्होंने 1921 में मास्टर डिग्री ली और 1923 में डीएसएसी की उपाधि ली। उनकी तीसरी (कोलंबिया, 1952) और चौथी (उस्मानिया, 1953) डॉक्टरेट उपाधि उन्हें सम्मान स्वरूप प्रदान की गई।
- न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी में तीन साल अध्ययन के दौरान उन्होंने अर्थशास्त्र में नौ कोर्स, इतिहास में ग्यारह, समाजशास्त्र में छह, दर्शनशास्त्र में पांच, एंथ्रोपोलॉजी में चार, राजनीति में तीन और फ्रेंच व जर्मन भाषा में एक-एक कोर्स पूरे किए। आंबेडकर न सिर्फ विदेश में इकोनॉमिक्स में पीएचडी करने वाले पहले भारतीय थे बल्कि वे इकोनॉमिक्स में डबल डॉक्टोरेट करने वाले पूरे दक्षिण एशिया में पहले व्यक्ति थे।
Copyright © 2021-22 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.