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सबसे पहले खजूर के पत्ते, कपड़े और लकड़ी पर लिखी गई थीं कुरान की आयतें

क़ुरान का धरती पर आना रमज़ान के महीने में ही शुरू हुआ था।

Danik Bhaskar | Jun 15, 2018, 07:07 PM IST

रिलिजन डेस्क। रमजान का पाक महीना खत्म होने पर ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 16 जून, शनिवार को है। उज्जैन की कवियत्री शबनम अली शबनम के अनुसार, कुरान का धरती पर आना रमज़ान के महीने में ही शुरू हुआ था और थोड़ा-थोड़ा करके 23 साल में पूरा कुरान ख़ुदा के पैगंबर मोहम्मद साहब के माध्यम से धरती पर आया।


- एक रमज़ान से दूसरे रमज़ान आने तक जितनी भी आयतें मोहम्मद साहब को मिलती थीं। मोहम्मद साहब उन सारी आयतों को रमज़ान के महीने में ख़ुदा के फ़रिश्ते जिब्रील अलैय सलाम को दोबारा पढ़ कर सुनाते थे।
- जिब्रील एक देवदूत थे, जो देववाणी लाकर मोहम्मद साहब को सुनाते और कंठस्थ करवा पर जाते थे जिसे" वही नाज़िल" होना या " वही आना " कहा जाता है।
- मौके और हालात के साथ समय-समय पर आयतें आती रहीं, वही नाज़िल होने के बाद साहबी जो की नबी के साथ रहने वाले पढ़े-लिखे लोग थे आयतों को खजूर के पत्ते, कपड़े, चमड़े लकड़ी आदि पर लिख देते थे।
- मोहम्मद साहब उन आयतों को दोबारा पढ़कर सुनाने को कहते थे। फिर साहबी भी उसे कंठस्थ कर लेते थे। इस तरह कुरान की हर आयत रिटर्न वर्क के साथ मेमोराईज़ भी की जा रही थी।
- आयतों को 24 से ज़्यादा साहबी ने अलग-अलग चीज़ों पर लिखने का काम किया। मोहम्मद साहब की वफ़ात (मौत) के 9 दिन पहले तक उन पर देवदूत जिब्रील देववाणी लाते रहे।
- नबी की वफ़ात के बाद 3 चरणों में कुरान को किताबी शक्ल दी गई, लेकिन आयतों में कोई फ़ेरबदल नही किया गया और कुरान की यही ख़ासियत है की इसकी हर आयत हू-ब-हू आज भी वैसी है जैसी मोहम्मद साहब को प्राप्त हुई थी।
- मोहम्मद साहब रोज़े की हालत में कुरान पढ़ कर जिब्रील को सुनाते थे, यही कारण है कि रमज़ान का महीना बेहद पवित्र रोज़े नमाज़ और इबादतों का महीना है।