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कर्नाटक चुनाव में कायम रहनी चाहिए निष्पक्षता

मतदाता परिचय पत्र असली हैं लेकिन, सवाल यह हैं कि झुग्गी वालों के परिचय पत्र किसी निजी फ्लैट में कैसे पहुंचे।

Bhaskar News | Last Modified - May 10, 2018, 01:03 AM IST

कर्नाटक चुनाव में कायम रहनी चाहिए निष्पक्षता
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर के बीच मतदान के तीन दिन पहले बेंगलुरू के राज राजेश्वरी नगर के एक फ्लैट से नौ हजार से ऊपर मतदाता परिचय पत्रों का मिलना चुनाव की सनसनीखेज कहानी कह रहा है। उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कांग्रेस के विधायक मुनिरत्न करते हैं, इसलिए भाजपा ने इसका सारा ठीकरा उन्हीं के सिर फोड़ने की तैयारी कर ली है और उस क्षेत्र में चुनाव रद्‌द करने की मांग की है। हालांकि, अभी इस मामले की जांच पूरी नहीं हुई है लेकिन, चुनाव आयोग ने कांग्रेस विधायक के व्यवहार पर संदेह जताया है। मतदाता परिचय पत्र असली हैं लेकिन, सवाल यह हैं कि झुग्गी वालों के परिचय पत्र किसी निजी फ्लैट में कैसे पहुंचे। या तो वे परिचय पत्र इसी शर्त पर उन्हें दिए जाने वाले थे कि वे किसी पार्टी विशेष को मतदान करेंगे या उनकी सहायता से किसी पार्टी के कार्यकर्ता मतदान करने वाले थे। फ्लैट पर छापा भाजपा के कार्यकर्ताओं ने डाला था और उन्होंने शुरू में बीस हजार मतदाता परिचय पत्र पाए जाने का दावा किया था। इस क्षेत्र की विशेष बात यह है कि यहां पंजीकृत होने वाले मतदाताओं की संख्या में दस प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि हुई है जबकि राज्य का औसत 6.04 प्रतिशत है। किसी एक क्षेत्र में इकट्‌ठे 44,837 मतदाताओं की बढ़ोतरी चौंकाने वाली है। कारण तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन, यह संख्या संदेह पैदा करती है। यह बेंगलुरू जैसे तेजी से आधुनिक हो रहे शहर का आकर्षण भी हो सकता है और मतदाताओं का फर्जी पंजीयन भी। विवाद फ्लैट के मालिक को लेकर भी है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह फ्लैट भाजपा की नेता मंजुला नंजमारी का है और उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले अपने बेटे को किराये पर दे रखा है। भाजपा कहती है कि मंजुला बहुत पहले भाजपा छोड़ चुकी हैं और अब वे कांग्रेस में हैं। इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच चुनाव आयोग की जांच से जो भी तस्वीर बनती है उसका असर पार्टियों की छवि पर जरूर पड़ेगा। जब चुनाव इतना कांटे का हो तो चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि उसे निष्पक्षता से संपन्न कराए। जनमत निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है और उसे अनुचित प्रभाव से बचाना लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है। वह तभी हो सकता है जब संस्थाएं रचनात्मक ढंग से काम करें और अपनी जिम्मेदारी सिर्फ औपचारिक दायरे तक सीमित न रखें।
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