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फादर्स डे स्पेशल: मुझे दादाजी का पुनर्जन्म मानते थे पिताजी- अमिताभ बच्चन

अमिताभ बच्चन, मुकेश अंबानी और दीपिका पादुकोण जैसी 10 हस्तियों से जानिए ऐसे होते हैं पिता।

Danik Bhaskar | Jun 17, 2018, 08:33 AM IST
हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन के साथ अमिताभ। (फाइल) हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन के साथ अमिताभ। (फाइल)

नई दिल्ली. परिवार में पिता सर्वोच्च अनुशासन रखते हैं तो समाज में सर्वोच्च पहचान। जब भी सर्वोच्च की बात आती है तो उसे पिता से जोड़ दिया जाता है। वे कहीं फादर ऑफ... हैं, तो कहीं पितामह। वे फादर-पोप-पीर-बापू-बाबा-गॉडफादर और पितृपुरुष भी हैं। हमने ईश्वर को भी परम पिता कहा। यानी वो, जो सबसे ऊपर है वो पिता है। आज फादर्स डे के मौके पर अमिताभ बच्चन, रतन टाटा और दीपिका पादुकोण जैसी 10 हस्तियों से जानिए ऐसे होते है पिता...

वे मुझे दादाजी का पुनर्जन्म मानते थे- अमिताभ बच्चन

- अमिताभ ने बताया, "जीवन के अंतिम दिनों में जब वे निरंतर कमजोर होते जा रहे थे, उन्होंने कहा था कि जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष है।

- "मुझे लगता है कि मैं उनके साथ जितना भी समय बिता पाया वो काफी कम था, क्योंकि वे बहुत व्यस्त हुआ करते थे। काश मैं उनके साथ थोड़ा और वक्त बिता पाता और उनके विचारों को समझ पाता। वे काफी सख्त इंसान थे। हमारी बहुत ज्यादा बातचीत नहीं होती थी, लेकिन समय और उम्र के साथ रिश्ता और भी ज्यादा मजबूत होता गया। लेकिन अभिषेक के साथ मैंने हमेशा एक दोस्त का रिश्ता रखा है, जो आगे भी यूं ही बरकरार रहेगा। बाबूजी को न जाने क्यों लगता था कि उनके पिताजी का पुनर्जन्म मेरे रूप में हुआ है।"
- "एक बार मैंने गुस्से में पूछ लिया था कि उन्होंने मुझे पैदा ही क्यों किया? इसके जवाब में बाबूजी ने एक कविता लिखी थी।"
जिंदगी और जमाने की कशमकश से घबराकर, मेरे बेटे मुझसे पूछते हैं कि हमें पैदा क्यों किया था?
और मेरे पास इसके सिवाय कोई जवाब नहीं है कि, मेरे बाप ने मुझसे बिना पूछे मुझे क्यों पैदा किया था?
और मेरे बाप को उनके बाप ने बिना पूछे उन्हें और उनके बाबा को बिना पूछे, उनके बाप ने उन्हें क्यों पैदा किया था?
जिंदगी और जमाने की कशमकश पहले भी थी, आज भी है शायद ज्यादा कल भी होगी, शायद और ज्यादा…
तुम ही नई लीक रखना, अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें: अनिल अंबानी, रतन टाटा और दीपिका पादुकोण जैसी 9 हस्तियों से जानें, ऐसे होते हैं पिता...

(स्रोत: अलग-अलग समय पर दिए गए इंटरव्यू और कुछ सेलिब्रिटीज की भास्कर से ताजा बातचीत)

जेआरडी टाटा (बाएं) और रतन टाटा। जेआरडी टाटा (बाएं) और रतन टाटा।

ऑफिस में ही रहे पर काम में दखल नहीं दी

जेआरडी के सहयोग के बिना मैं कभी यह नहीं कर पाता। वे मेरे लिए पितृतुल्य थे। भाई की तरह थे। 

टाटा ग्रुप मैंने 1962 में जॉइन किया था। ऑस्ट्रेलिया में शॉप फ्लोर, टेक्सटाइल्स, स्टील, टाटा मोटर्स सहित कई जगह मैंने काम किया। जेआरडी टाटा के रूप में मुझे शानदार मेंटर मिले थे। मुझे याद है, 1991 में  मीटिंग में मुझे चेयरमैन अपॉइंट किया गया था। उसके बाद मैं उनके साथ उनके ऑफिस तक गया। वहां उन्होंने अपनी सेक्रेटरी से कहा था, अब हमें यहां से चलना चाहिए। लेकिन मैंने उनसे कहा था कि नहीं, आपको कहीं नहीं जाना है। यह आपका ही ऑफिस है, जब तक आप चाहें तब तक। उन्होंने कहा था- सच? फिर उन्होंने पूछा था- तुम कहां बैठोगे? मैंने कहा था- जहां मैं आज बैठता हूं। लेकिन मुझे एक डर भी महसूस हुआ था कि जेआरडी भूल जाएंगे कि वे स्टेप डाउन कर चुके हैं। तब वे टाटा स्टील और टेल्को के बोर्ड में तो मौजूद थे ही। मुझे लगा था कि वे पर्दे के पीछे से कंपनी चलाएंगे और अपना नजरिया लागू करेंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हमारे संबंध इतने अच्छे थे कि मैं उनके ऑफिस में जाता था और उनसे कहता था-जे, काश यह 10 साल पहले हो गया होता। वे जवाब देते- मैं भी यही सोचता हूं। वे मेरे ग्रेटेस्ट मेंटर थे। मैं किस्मतवाला था कि वे वहां थे। उनके सहयोग के बिना मैं कभी यह नहीं कर पाता। वे एक पिता की तरह थे, भाई की तरह थे।

धीरूभाई अंबानी (दाएं) और मुकेश अंबानी। (फाइल) धीरूभाई अंबानी (दाएं) और मुकेश अंबानी। (फाइल)

खुद ही समझो कि क्या करना चाहते हो

मैं सुन सकता हूं कि मेरे पिता  मुझसे कह रहे हैं- ‘अब तुम मेरी जगह हो। अब जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है।' 

जब मैं स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई खत्म कर लौटा, तो 25 साल का था। एक दिन बिजनेस सीखने के लिए पिता के पास बैठा हुआ था। मैंने उनसे पूछा- मुझे क्या काम करना चाहिए? तो मेरे पिता ने कहा- अगर तुम नौकरी करते हो तो मैनेजर हो, अगर आंत्रप्रेन्योर बनते हो, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि क्या करना है? मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। खुद ही समझो कि तुम क्या करना चाहते हो? मुझे लगता है कि मेरे पिता और रिलायंस समूह के संस्थापक धीरूभाई अंबानी आज भी हमारे साथ हैं। जैसा कि गीता में कहा गया है- ‘आत्मा न पैदा होती है और न मरती है।’ इसी तरह धीरूभाई हमारे दिलों में जिंदा हैं। हम आज भी उनकी मौजूदगी महसूस कर सकते हैं। मुझे आज भी लगता है कि वो यहीं कहीं बैठे हुए हैं और हमें देखकर मुस्कुरा रहे हैं। मेरे पिता कालजयी इतिहासपुरुष हैं और वह हर पीढ़ी के भारतीयों के लिए आदर्श व प्रेरणास्रोत हैं। हम उनके सपनों के प्रति समर्पित रहेंगे। यह धीरूभाई के कारण ही संभव हुआ कि रिलायंस इंडस्ट्रीज एक कर्मचारी से बढ़कर आज ढाई लाख से अधिक कर्मचारियों की, एक हजार रुपए से बढ़कर छह लाख करोड़ रुपए से अधिक की तथा एकमात्र शहर से बढ़कर 28 हजार शहरों और चार लाख से अधिक गांवों की कंपनी बन सकी है। 

आदित्य बिड़ला (बाएं) और कुमार मंगलम। (फाइल) आदित्य बिड़ला (बाएं) और कुमार मंगलम। (फाइल)

मेरे भीतर से श्रेष्ठ कैसे निकलेगा, वे जानते थे

मैं सीए का कोर्स नहीं करना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा सका कि पिता को न कह दूं। वे जो कहते थे, मैं करता था।

पिता काफी व्यस्त रहा करते थे, लेकिन उन्होंने हमेशा मेरे लिए समय निकाला। मुझे याद है कि उन्होंने कभी मेरे स्कूल का कोई फंक्शन मिस नहीं किया। उन्हें पता रहता था कि मेरे दोस्त कौन हैं। इतना ही नहीं, वे यह भी जानते थे कि मैं क्या कर रहा हूं। मगर मैं उनसे डरता भी था। एक बार ऐसा कॉलेज के दिनों में हुआ। मैं बी. कॉम की पढ़ाई कर रहा था। पिता मुझे फोन करते हैं और कहते हैं ‘कुमार मुझे लगता है, इसके साथ-साथ तुम्हें सीए का कोर्स भी कर लेना चाहिए।’ हैरानी इस बात की थी कि तब परीक्षा में सिर्फ दो महीने का समय रह गया था। हकीकत तो यह है कि मैं तो सीए का कोर्स करना ही नहीं चाहता था, लेकिन इतनी हिम्मत नहीं जुटा सका कि पिता को ना कह दूं। अगर उन्होंने कहा कि यह काम सही है, तो मैं वह करता ही था। असल में वे जानते थे कि मेरे भीतर से सर्वश्रेष्ठ कैसे निकालना है। हालांकि मेरे दादाजी ने मेरे पिता से और पिता ने मुझसे साफ कह रखा था कि जब बात बिजनेस की हो तो फैसले खुद ही लेने है। फिर उन फैसलों की जिम्मेदारी भी खुद उठानी है। यही सीख पिता के जाने के बाद मेरे काम आ रही है। मुझे याद है कि ऐसी सीख मुझे 15 साल की उम्र से ही मिलने लगी थी। मैं कंपनी की मीटिंग्स में पिता के साथ जाने लगा था और मीटिंग के बाद अक्सर उनसे सवाल-जवाब करता था।

आरपी गोयनका (बाएं) और संजीव गोयनका। (फाइल) आरपी गोयनका (बाएं) और संजीव गोयनका। (फाइल)

लोग पीछे क्या कहते हैं, वह भी महत्वपूर्ण

इस संसार में एक सुप्रसिद्ध, लब्धप्रतिष्ठित और लक्ष्मीपुत्र की संतान होने से अच्छा सौभाग्य क्या हो सकता है।

मेरे पिताजी असाधारण व्यवसायी थे। उन्होंने अपनी प्रतिभा, दूरदर्शिता और ईश्वर प्रदत्त शक्ति के बल पर अपने सामान्य से व्यवसाय एवं परिवार की संपत्ति को एक साम्राज्य में बदल दिया। उनकी छोटी-सी आशा थी कि उनकी दोनों संतानें कार्यक्षमता के हिमालय के शीर्ष पर पहुंचें। दादाजी, पिताजी और पुत्र तीन पीढ़ियों ने प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की थी, लेकिन उन्होंने अपने पुत्रों को पार्क स्ट्रीट स्थित सेंट जेवियर्स कॉलेज भेेजने में जरा भी संकोच नहीं किया। वे एक बार किसी को ज़ुबान दे देते थे तो चाहे जितना व्यावसायिक नुकसान हो जाए, वो अपनी ज़ुबान से फिरते नहीं थे। कहा करते थे- इस मानसिकता से मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ है। मैंने सिर्फ ज़ुबान पर संपत्तियों को या कंपनियों को खरीदा है, यहां तक कि अनुभवी पिताजी के अनुरोध पर बड़ी कंपनी छोड़ भी दी है। अपने बेटों के लिए वह अधिक कठोर थे। उन्हें अपने बच्चों की फिक्र रहती थी। कुछ घंटों के अंतराल पर बेटों की खबर न मिलने पर वे व्याकुल हो जाते थे। वे कहते थे-पहले विश्वास न किया जाए, तो बदले में भरोसा नहीं मिलता है। लोग तुम्हारे पीछे क्या कहते हैं, वह भी मायने रखता है। इसलिए किसी के प्रश्न करने पर मैं कहता हूं, हम साधारण लाेग हैं, लेकिन असाधारण लोगों के बीच रहकर बिजनेस करना पसंद करते हैं।

सज्जन जिंदल (बाएं) और ओपी जिंदल। (फाइल) सज्जन जिंदल (बाएं) और ओपी जिंदल। (फाइल)

जब दूसरे दीवार देखते हैं, मैं दरवाजे देखता हूं

सभी मसले अपने हाथ में लेकर मुझे एंबिशन पूरा करने योग्य बनाया। वे मेरे लिए रोल मॉडल और रॉक ऑफ सपोर्ट थे।

मैं जब मुड़कर देखता हूं तो पिताजी के साथ बिताए प्यारभरे क्षण याद आते हैं। हम उन्हें बाऊजी कहते थे। वे अक्सर कहते थे, ‘जब दूसरे लोग दीवार देखते हैं, मैं दरवाजे देखता हूं।’ ठीक इसी तरह उन्होंने हमारी परवरिश की। उन्होंने मुझे जो अमूल्य शिक्षा दी वह बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। उनके जोश और लगन से तो सभी परिचित हैं, लेकिन उनका आभामंडल सादगीभरा रहा। उन्होंने 17 साल की किशोरवय में आंत्रप्रेन्योरशिप की यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में उन्होंने लाखों जिंदगियों को प्रेरणा दी, जिनमें समाज और बिजनेस से जुड़े लोग भी समान रूप से शामिल हैं। वे कहते थे, ‘ओम के पैर नहीं हैं, पहिए हैं।’ उन्होंने सच्चे तौर पर एक पीढ़ी को जीना सिखाया। मैं जब छोटा था, वे हमेशा कहते थे सपने देखो। उन्होंने मुझे कभी रोका या टोका नहीं। उन्होंने हमेशा हम भाइयों को फ्री हैंड दिया। उनका मेहनती व्यक्तित्व न केवल सीखने में जोश भरने की प्रेरणा देता था, बल्कि मुझे कड़े परिश्रम और प्रतिदिन बेहतर होते रहने के लिए प्रेरित भी करता था, मैंने ऐसा ही किया। मेरा लक्ष्य खुद को उनके सामने साबित करना नहीं था, बल्कि उनके विज़न के अनुरूप खुद को योग्य बनाना था। उनका नज़रिया उनके प्यारभरे और दूसरों का ध्यान रखने वाले व्यवहार से उजागर होता था।'

ऋषि कपूर की गोद में रणबीर। (फाइल) ऋषि कपूर की गोद में रणबीर। (फाइल)

मैं उनसे नजरें मिलाकर बात नहीं कर पाता हूं

 

वे जब काम में बहुत मसरूफ रहते थे, तब भी काम से लौटने के बाद सुनिश्चित करते थे कि हमारे साथ ही वक्त बिताएं ।

मैं जब बड़ा होने लगा तो उन्हीं की तरह का एक्टर बनना चाहता था। एक्टिंग के प्रति उनमें कमाल का जुनून और उत्साह है। हम दोनों में टिपिकल पुराने जमाने के बाप-बेटे वाला संबंध है। मैं तो उनसे आज भी नजरें मिलाकर बातें नहीं कर पाता। वे मेरे साथ उसी तरह का रिश्ता रखना चाहते थे, जैसा मेरे दादाजी यानी उनके पिताजी के साथ उनका था। बचपन में उनके साथ डिनर टेबल तक पर मैं डरता था। तब मुझे सब्जी बहुत अच्छी नहीं लगती थी। चिकन खाया करता था। उस पर अगर वे मुझे नॉर्मल आवाज में भी सब्जी खाने को कहते तो मेरी रुलाई फूट पड़ती थी। वे स्टैंड लेने वालों में से एक हैं। आलोचनाओं की परवाह नहीं करते और अपनी बात रखकर ही मानते हैं। वे आसानी से मेरी तारीफ नहीं करते। मम्मी से कहलवा देते हैं। जब भी मैं कुछ अच्छा करता हूं, तो वे बहुत कम शब्दों में कहकर निकल जाते हैं। उनका यह तरीका भी मुझे अच्छा लगता है। इस बहाने मैं ज्यादा चार्ज्डअप रहता हूं। वे बड़े जुनूनी हैं। जो भी चीज या बात उन्हें अच्छी लग जाए, वे उसे शिद्दत से निभाते हैं। जैसे इस उम्र में भी अलग-अलग रोल करने की उनमें चाह है। रिश्तों के मामलों में वे बड़े कमिटेड इंसान हैं। जो इंसान उन्हें भा गया, वे उनका साथ मरते दम तक निभाने वालों में से एक हैं।

मेघना और गुलजार। (फाइल) मेघना और गुलजार। (फाइल)

पापा ने काम को ही मेरे इर्द-गिर्द बुन दिया

 

मुझे अपने पिता की बेटी होने पर हमेशा गर्व रहा है। यह गर्व का जीवनभर का अहसास है। मैं इसे हर पल महसूस करती हूं।

मैं बचपन से दो घरों में रही। एक पिताजी गुलज़ार और दूसरा मां राखी का घर। मुझे अपने पिता की सादगी बहुत पसंद है। उन्होंने हमेशा मुझे आज़ादी दी, बचपन में मेरी शैतानियों के बावजूद उन्होंने मुझसे कभी ऊंची आवाज में बात नहीं की। उन्हें कविताओं और लेखन पर लगातार मिलने वाली तारीफों पर मुझे हमेशा आश्चर्य होता था। लोग मुझसे पूछते हैं कि पिता की कोई खासियत जो आप जीवनसाथी में खोजती हों, मैं कहती हूं कि मैं इससे खुश हूं कि दोनों बिल्कुल अलग तरह की शख्सियत हैं। मेरा मानना है कि पिताजी से मुझे सादगी विरासत में मिली है। मैंने उन्हें जिंदगी में हमेशा सच्चा और ईमानदार ही देखा है। भले ही कितने भी विपरीत हालात हों, वे अपने लेन-देन में हमेशा ईमानदार रहे हैं और मैं वैसा ही बनने की कोशिश करती हूं। लोग मुझसे पूछते हैं कि अगर आपके पिता पब्लिक फिगर नहीं होते तो आपको उनके साथ ज्यादा समय बिताने को मिलता। लेकिन मैंने वैसा खालीपन कभी महसूस ही नहीं किया। उन्होंने अपने काम के जीवन को ही मेरे इर्द-गिर्द बुन दिया। वे मुझे स्कूल से लेने आते थे और हर खास मौके पर मेरे साथ होते थे। हमारे रिश्ते एक टिपिकल पिता-पुत्री के रिश्ते हैं। हम दोस्त नहीं हैं, क्योंकि बीच में सम्मान की एक रेखा हमेशा रही है, जिसे मैंने कभी लांघने की कोशिश नहीं की।

दीपिका और प्रकाश पादुकोण। (फाइल) दीपिका और प्रकाश पादुकोण। (फाइल)

उन्होंने कभी अपनी सलाह थोपी नहीं

उन्होंने मेरे प्रोफेशनल काम में कभी दखल देने की कोशिश नहीं की। उन्हें भरोसा है कि मेरी च्वाइस हमेशा सही ही होगी।

मैं अपने डैडी की लिटिल गर्ल और सपोर्ट सिस्टम दोनों हूं। कभी हम हंसी-मजाक करते हैं तो कभी एक-दूसरे की टांग खिचाई करते हैं। बचपन में जब मैं कोई शरारत करती थी तो वे बहुत सख्ती से पेश आते थे। कभी-कभी तो स्टोर रूम में बंद कर देते थे। एक एथलीट होने के कारण वे अलग तरह के डीएनए से बने थे। उन्होंने हमेशा मुझे और मेरी बहन को गाइड किया, लेकिन अपनी सलाह हम पर थोपी नहीं। उन्होंने एक बार कहा था कि आप हर तरह के स्टार बन सकते हैं। दुनिया में भारी सफलता पा सकते हैं, लेकिन अगर आप अच्छे इंसान नहीं हैं तो आपको हमेशा याद नहीं रखा जाएगा। वे मुझे रिलेक्स देखकर बहुत खुश होते हैं। जब कभी भी मैं बेंगलुरू में होती हूं, तो वे सारे असाइनमेंट अलग रख देते हैं और मेरे साथ रहते हैं। वे बहुत छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखते हैं। मुझे एयरपोर्ट छोड़ने जाते हैं। घर से एयरपोर्ट तक जाने के 45 मिनट हमारे लिए बहुत कीमती होते हैं। वे मेरी सारी फिल्में देखते हैं और मैं जो कुछ भी करती हूं उसे पसंद करते हैं। वे मेरी फिल्मों में से हमेशा कुछ न कुछ अच्छा निकाल ही लेते हैं। मेरे आलोचकों में मेरी मां और बहन हैं। उन्होंने मुझे सलाह दी है, जो आपके कंट्रोल में न हो उस पर कभी झल्लाना नहीं। चीज अगर आपके कंट्रोल में न हों तो उस पर पसीना मत बहाओ।

जावेद अख्तर के साथ फरहान। जावेद अख्तर के साथ फरहान।

कहा था- पेड़ बनना है तो पेड़ से दूर रहो

पहली बार में अपनी लिखी हुईं पंक्तियों से खुश नहीं होते। वे बार-बार लिखते हैं। फिर सोचते हैं और फिर लिखते हैं।

मेरे लिए पिता जीवन का सबसे मजबूत और बड़ा सपोर्ट सिस्टम हैं। उनकी एक खास बात है कि अगर वे कोई गीत लिखते हैं और सभी इसकी तारीफ कर देंं, तब भी वे इसे तब तक नहीं छोड़ते, जब तक उसमें कुछ सुधार न कर लें। वे सिर्फ इस आधार पर काम पूरा नहीं मान लेते कि यह अप्रूव हो गया है। वे फिर सोचते हैं, फिर लिखते हैं। कोशिश करते रहने और जो भी बेस्ट संभव हो वो करने का यह तरीका मुझे पसंद है। जब तक अंत न आ जाए। उनकी तरह मुझे भी अटेंशन और अपने जोक बार-बार सुनाना पसंद है। जब मैं 17 साल का था तो मेरे पिता, मां और बहन सभी इस बात को लेकर परेशान थे कि मेरा क्या होगा। यह बोझ एक तरह से मुझ पर भी था। मैं अधिकतर समय घर से बाहर बिताना पसंद करता था और टीवी पर मूवी देखने के समय ही घर में रहता था। एक बात उन्होंने मुझसे कही थी, जो उनसे उनके पिता ने कही थी कि तुम्हारा जीवन एक्राॅन (शाहबलूत का फल) की तरह है। तुम शाहबलूत का पेड़ बन सको इसका एक ही तरीका है कि तुम इसकी छांव में मत रहो। इसलिए एक्रॉन को पेड़ से इतना दूर जाकर गिरना चाहिए कि वह खुद एक पेड़ बन सके। फिल्म "दिल चाहता है' उन्हें अच्छी लगी थी। इसने उन्हें चकित कर दिया था। "भाग मिल्खा भाग' देखकर तो वे रो ही पड़े थे।